भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १५
ईसवी में भारत पहुँचा और अपनी नम्रता और सौजन्य द्वारा उसने
अंगरेज़ी तिजारत के लिये सम्राट से अनेक नई रियायतें हासिल
कर लीं ।
मिसाल के तौर पर सन् १६१६ में अंगरेज़ों को कालीकट और
मछलीपट्टन में कोठियाँ बनाने की इजाज़त मिल गई । उस समय
भारत में रहने वाले अंगरेज़ चूंकि भारत सम्राट की प्रजा थे, इसलिये
यदि उनमें कोई झगड़ा होता था तो देशी अदालतों में ही उसकी
सुनाई होती थी और वहीं से उन्हें दंड आदि दिये जाते थे। सन्
१६२४ ईसवी में अंगरेज़ों की प्रार्थना पर जहाँगीर ने एक शाही
फ़रमान इस मज़मून का जारी कर दिया कि आइन्दा अपनी कोठी
के अंदर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाज़िम के क़सूर करने पर
अंगरेज़ उसे स्वयं दंड दे सकते हैं। इस घटना की आलोचना करते
हुए एक विद्वान अंगरेज़ इतिहास लेखक टोरेन्स लिखता है :—
“बादशाह न्यायशील और बुद्धिमान था । वह उनकी आवश्यकताओं को
समझता था। जो उन्होंने माँगा उसने मंज़ूर कर लिया। उसे यह स्वप्न में भी
नज़र न आ सकता था कि एक दिन अंगरेज़ इसी छोटी सी जड़ से बढ़ते बढ़ते
बादशाह की प्रजा और उसके उत्तराधिकारियों तक को दंड देने का दावा करने
लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जायगा तो प्रजा का संहार कर डालेंगे
और बादशाह के उत्तराधिकारी को बाग़ी कह कर आजीवन क़ैद कर लेंगे* ।”
- "The Padishah, being a just man and wise, understood their needs, and
yielded what they asked, little dreaming that the time would come, when, from
such root of title, they would claim jurisdiction over his subjects and succes-