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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश २५
केन्द्र था। डूप्ले ने मद्रास अंगरेज़ों से छीन लेने का विचार किया।
दोस्तअली ख़ाँ का उत्तराधिकारी अनवरुद्दीन इस समय करनाटक
का नवाब था। डूप्ले ने अंगरेज़ों के विरुद्ध नवाब के ख़ूब कान भरे।
लाबूरदौने नामक एक फ्रांसीसी के अधीन उसने कुछ जल सेना मद्रास
विजय करने के लिये भेजी और नवाब से यह वादा किया कि अंग-
रेज़ों को मद्रास से निकाल कर मैं नगर आपके हवाले कर दूँगा।
लाबूरदौने ने मद्रास विजय कर लिया, किन्तु इसके साथ ही अंग-
रेज़ों से चालीस हज़ार पाउण्ड नक़द लेकर मद्रास फिर उनके
हवाले कर देने का वादा कर लिया। इसके बाद डूप्ले ने अपने वादे
के अनुसार मद्रास नवाब के हवाले कर देने की कोई कोशिश न की
और न लाबूरदौने के वादे के अनुसार उसे अंगरेज़ों ही को वापस
किया। नवाब को जब इस छल का पता चला, वह फ़ौरन सेना
लेकर मद्रास की ओर रवाना हुआ। डूप्ले भी अपनी सेना सहित
नवाब को रोकने के लिये बढ़ा। ४ नवम्बर सन् १७४६ को मद्रास
के निकट डूप्ले की सेना और नवाब करनाटक की सेना में संग्राम
हुआ। डूप्ले की सेना में भी अधिकतर भारतीय सिपाही ही थे। इस
भारतीय सेना और अपने तोपख़ाने के बल डूप्ले ने विजय प्राप्त की।
इतिहास में यह पहली विजय थी जो किसी यूरोपियन ने किसी
भारतीय शासक के विरुद्ध प्राप्त की। विदेशियों के हौसले और
अधिक बढ़ गये !
अंगरेज़ों और नवाब करनाटक दोनों को फ्रांसीसी धोखा दे
चुके थे, इसलिए ये दोनों अब फ्रांसीसियों के विरुद्ध मिल गए।