भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ भारत में अंगरेज़ी राज
में भारत के अंदर यूरोपियन साम्राज्य क़ायम करने की आकांक्षा
उत्पन्न हुई । डूपले को भारतवासियों में दो ख़ास कमज़ोरियां नज़र
आईं, जिनसे उसने पूरा पूरा फ़ायदा उठाया । एक यह कि भारत के
विविध नरेशों की उस समय की आपस की ईर्षा और प्रतिस्पर्धा के
दिनों में विदेशियों के लिये कभी एक और कभी दूसरे का पक्ष लेकर
धीरे धीरे अपना बल बढ़ा लेना कुछ कठिन न था, और दूसरे यह
कि इस कार्य के लिये यूरोप से सेनाएं लाने की आवश्यकता न थी।
बल, वीरता अथवा सहनशक्ति में भारतवासी यूरोपनिवासियों
से कहीं बढ़ कर थे । अपने सामयिक अफ़सरों की वफ़ादारी का
भाव भी भारतीय सिपाहियों में ज़बरदस्त था । किन्तु राष्ट्रीयता
के भाव या 'स्वदेश' के विचार तक का उनमें अभाव था ।
उन्हें बहुत आसानी से यूरोपियन ढंग की सैनिक शिक्षा दी जा
सकती थी और यूरोपियन अफ़सरों के अधीन रक्खा जा सकता
था । इसलिये विदेशियों का यह सारा कार्य बड़ी सुन्दरता के साथ
हिन्दोस्तानी सिपाहियों से चल सकता था । डूपले को अपनी इस
महत्वाकांक्षा की पूर्ति में केवल एक बाधा नज़र आती थी, और
वह थी अंगरेज़ों की प्रतिस्पर्धा ।
यूरोप के अंदर भी उन दिनों फ़्रांस और इंगलिस्तान एक दूसरे
के शत्रु थे। थोड़े दिनों के बाद वहाँ फ़्रांस और
[हाशिया: फ़्रांसीसी और] इंगलिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया । कर्नाटक
[हाशिया: अंगरेज़] में क़रीब सौ साल से मद्रास की बस्ती अंगरेज़ों के
अधिकार में थी और यही उस समय उनके भारतीय व्यापार का मुख्य