भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १७४८ ईस्वी में अंगरेज़ी सेना ने पुदुदुच्चरी पर हमला किया,
किन्तु दूपले की सेना ने इस बार भी अंगरेज़ों को हरा दिया। इसी
समय यूरोप के अन्दर फ्रांस और इंगलिस्तान के बीच संधि हो
गई, जिसमें एक शर्त यह तय हुई कि मद्रास फिर से अंगरेज़ों के
सुपुर्द कर दिया जाय। इस प्रकार करनाटक से अंगरेज़ों को निकाल
देने के विषय में दूपले की आशा को एक ज़बरदस्त धक्का पहुंचा
और फ्रांसीसियों की बरसों की मेहनत पर पानी फिर गया।
किन्तु दूपले का हौसला इतनी जल्दी टूटने वाला न था।
फ्रांसीसी और अंगरेज़ी कंपनियों में प्रतिस्पर्द्धा बराबर जारी रही।
ये दोनों कंपनियां इस देश में अपनी अपनी सेनाएं रखती थीं और
जहाँ कहीं किसी दो भारतीय नरेशों में लड़ाई होती थी तो एक
एक का और दूसरी दूसरे का पक्ष लेकर लड़ाई में शामिल हो
जाती थी। भारतीय नरेशों की सहायता के बहाने इनका उद्देश
अपने यूरोपियन दुशमन को समाप्त करना होता था।
दक्खिन भारत की राजनैतिक अवस्था इस समय बहुत
[हाशिया: दक्खिन भारत में मोरचे] बिगड़ी हुई थी। मुग़ल सम्राट की ओर से
नाज़िरजंग वहां का सूबेदार था। नाज़िरजंग
का एक भतीजा मुज़फ़्फ़रजंग अपने चचा
को मसनद से उतारकर खुद सूबेदार बनना चाहता था।
इसीलिये नाज़िरजंग ने मुज़फ़्फ़रजंग को क़ैद कर रक्खा था।
उधर अनवरुद्दीन करनाटक का नवाब था। किन्तु उससे पहले
नवाब दोस्तअली ख़ाँ का दामाद चंदासाहब अनवरुद्दीन को गद्दी