भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० भारत में अंगरेज़ी राज
निष्फल प्रयत्न किये । अन्त में सन् १५६८ ईसवी तक इनके जहाज़
अफ़रीका के नीचे से जावा होकर भारत पहुंचने लगे ।
डच जाति के लिखे हुए इतिहास से मालूम होता है कि भारत
के नरेशों ने इनका वैसा ही अच्छा स्वागत किया, जैसा शुरू में
पुर्तगालियों का किया था। पुर्तगालियों से इनकी लाग डाट थी ।
जिस तरह पुर्तगालियों ने अरब सौदागरों की रोज़ी छीनी थी,
उसी तरह डच अब पुर्तगालियों की रोज़ी छीनने या कम से कम
उसमें हिस्सा बटाने के लिये उत्सुक थे। इन लोगों ने भारतवासियों
से पुर्तगालियों की ख़ूब बुराइयाँ कीं । मुग़ल सम्राट ने इन्हें अब
व्यापार के लिये कोठियाँ बनाने और अपनी रक्षा के लिये क़िले-
बंदी करने की इजाज़त दे दी ।
सब से पहले पुलीकट और सद्रास नामक स्थानों पर इन्होंने
अपनी कोठियाँ बनाईं और क़िले खड़े किये । पुलीकट मौजूदा
मद्रास के उत्तर में और सद्रास मद्रास के दक्खिन में है । बढ़ते बढ़ते
सन् १६६३ ईसवी में उनकी एक कोठी आगरे में थी, जिसमें जौ
सड़ाकर उससे शराब तैयार की जाती थी। इसी तरह की उनकी
कोठियाँ सूरत, अहमदाबाद और पटने में मौजूद थीं। धीरे धीरे
बंगाल में भी उनका व्यापार बढ़ने लगा और सन् १६७५ में
उन्होंने चुंचड़ा (चिनसुरा) में एक कोठी क़ायम की ।
जब तक डच लोगों की निगाह केवल व्यापार पर रही, उन्होंने
भारत से ख़ूब धन कमाया, किन्तु इसके बाद उनमें भारत के अंदर
अपना राज क़ायम करने की इच्छा उत्पन्न हुई । इसी बीच अंगरेज़