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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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२८ भारत में अंगरेज़ी राज
गए। देवीकोट का नगर और क़िला प्रतापसिंह ने इस कृपा के
बदले में अंगरेज़ों को दे दिया। साहूजी को सदा के लिये पेन्शन
देकर अलग कर दिया गया और प्रतापसिंह तंजोर का राजा
बना रहा। करनाटक में नवाब अनवरुद्दीन अंगरेज़ों पर मेहरबान
था ही, इसीलिये फ्रांसीसी अनवरुद्दीन की जगह चंदासाहब
को नवाब बनाना चाहते थे। डूप्ले ने मराठों को नक़द धन देकर
चंदासाहब को क़ैद से छुड़वा लिया और फिर उसे करनाटक की
गद्दी पर बैठाने का प्रयत्न किया। ३ अगस्त सन् १७४९ को
आम्बूर की लड़ाई में फ्रांसीसियों की सहायता से अनवरुद्दीन
का काम तमाम कर चंदासाहब करनाटक का नवाब बन गया।
यहाँ तक डूप्ले को ख़ासी सफलता हुई।
किन्तु तंजोर अभी तक प्रतापसिंह के अधिकार में था और
प्रतापसिंह अंगरेज़ों के पक्ष में था। डूप्ले ने इसके लिए दक्खिन के
सूबेदार ही को बदलना चाहा। उसने नाज़िरजंग के विरुद्ध मुज़फ़्फ़र-
जंग के साथ साज़िश की। चाचा की क़ैद से भागकर मुज़फ़्फ़रजंग
ने फ्रांसीसियों की सहायता से अपने तईं दक्खिन का सूबेदार एलान
कर दिया और चंदासाहब के साथ मिलकर सबसे पहले तंजोर
पर चढ़ाई की। सूबेदार नाज़िरजंग ने तंजोर के राजा प्रतापसिंह की
सहायता के लिए सेना भेजी। दोनों पक्षों के बीच एक गहरा संग्राम
हुआ जिसमें मुज़फ़्फ़रजंग फिर से क़ैद कर लिया गया। चंदा-
साहब की जगह अनवरुद्दीन का बेटा मोहम्मद अली करनाटक का
नवाब बना दिया गया और नाज़िरजंग सूबेदारी की मसनद पर