भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १६
गिरी हुई चीज़ ख़याल करते थे। सूरत में लोगों के मुँह से इस प्रकार के
वाक्य प्रायः सुनने में आते थे—'ईसाई मज़हब शैतान का मज़हब है, ईसाई
बहुत शराब पीते हैं, ईसाई बहुत बदमाशी करते हैं, और बहुत मार पीट करते
हैं, दूसरों को बहुत गालियाँ देते हैं।' टेरी ने इस बात को स्वीकार किया है
कि भारतवासी स्वयं बड़े सच्चे और ईमानदार थे और अपने तमाम वादों को
पूरा करने में पक्के थे, किन्तु यदि कोई हिन्दोस्तानी सौदागर अपने माल की
कुछ क़ीमत बताता था और उस क़ीमत से बहुत कम ले लेने के लिए उससे
कहा जाता था तो वह प्रायः जवाब में कह पड़ता था—'क्या तुम मुझे
ईसाई समझे हो, जो मैं तुम्हें धोखा देता फिरूँगा ?'*
अंगरेज़ सब से पहले सूरत में पहुँचे और सब से अंत में
बंगाल पहुँचे, किन्तु वहाँ भी उनका व्यवहार वैसा ही रहा।
इतिहास लेखक सी० आर० विल्सन लिखता है :—
"बंगाल में भी अंगरेज़ अपने झगड़ालूपन के लिये उतने ही बदनाम
थे x x x वहाँ का बूढ़ा सूबेदार नवाब शाइस्ता ख़ाँ उन्हें 'नीच, झगड़ालू
लोगों और जुआचोरों की कम्पनी' कहा करता था और आजकल का कोई ज़बर-
दस्त प्रामाणिक इतिहासज्ञ इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि नवाब के
- " But, according to Terry, the natives had formed a mean estimate of
Christianity. It was not uncommon to hear them at Surat giving utterance to
such remarks as—Christian religion, devil religion, Christian much drunk,
Christian much do wrong, much beat, much abuse others. Terry admitted
that the natives themselves were 'very square' and exact to make good all
their engagements ; but if a dealer was offered much less for his articles than
the price which he had named, he would be apt to say, 'What ! dost thou
think me a Christian, that I would go about to deceive thee ? ' "—Ibid, p. 32