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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मानव धर्म ११६
दोनों भाई हाथ पग, दोनों भाई कान।
दोनों भाई नैन हैं, हिन्दू मूसलमान॥
ना हम हिन्दू होहिंगे, ना हम मूसलमान।
षट दरशन में हम नहीं, हम राते रहिमान॥
हिन्दू लागे देहुरे, मूसलमान मसीत।
हम लागे इक अलख सों, सदा निरन्तर प्रीत॥
ना तहं हिन्दू देहुरा, ना तहं तुरक मसीत।
दादू आपे आप है, नहीं तहां रह रीत॥
यहु मसीत यहु देहुरा, सतगुरु दिया दिखाय।
भीतर सेवा बन्दगी, बाहरि काहे जाय॥
दून्यू हाथी द्वै रहे, मिलि रस पिया न जाय।
दादू आपा मेटिकर, दून्यू रहे समाय॥
' यानी हिन्दू या मुसलमान सब के घट में एक ही आत्मा है।
अल्लाह और राम एक है मेरा भ्रम दूर होगया, हिन्दू और मुसलमान
में कोई भेद नहीं है। सब में मुझे तू ही तू दिखाई देता है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पन्थ क्या है, मोहम्मद का दीन क्या है,
जिबराईल का क्या मार्ग है, एक अल्लाह उन सब का पीर और मुर्शिद है।
दादू अपने दिल में जानता है कि वे सब किसके हैं, वही अलख इलाही
सारी दुनिया का गुरु है, उसके सिवा और कोई नहीं।

१२० पुस्तक प्रवेश
हिन्दू और मुसलमान दोनों भाई एक शरीर के हाथ और पैर हैं, दोनों
एक शरीर के दो कान हैं, दोनों भाई दो आँखें हैं ।
न हम हिन्दू होंगे और न मुसलमान, षट दरसन के मतभेद से हमें
कोई सम्बन्ध नहीं। हमें केवल रहमान से प्रेम है ।
हिन्दू देवालय में जाते हैं और मुसलमान मसजिद में । हमारा सम्बन्ध
केवल एक अलख से है। उसी से हमें सदा प्रीत है। हमारे धर्म में न हिन्दू
के देवालय की ज़रूरत है और न मुसलमान की मस्जिद की। न वहाँ
किसी कर्मकांड की ज़रूरत है। वहाँ सम्बन्ध केवल अपनी आत्मा से है ।
सतगुरू ने दिखला दिया है कि यह शरीर ही हमारी मसजिद है और
यही हमारा देवालय है। असली पूजा और नमाज़ अपने भीतर ही की जाती
है फिर लोग बाहर क्यों जाते हैं?
हिन्दू और मुसलमान अपने अपने झूठे अभिमान में दो हाथियों की
तरह एक दूसरे से लड़ रहे हैं। जब तक उनमें अपने अपने धर्म का यह झूठा
अभिमान है वे मिलकर सच्ची ईश्वर भक्ति का रस नहीं ले सकते । दादू ने
अपने इस आपे को मिटा दिया है। इसलिए दोनों मत उसके अन्दर
समा गए हैं ।
पण्डितों, मुल्लाओं, जातपाँत, मूर्तिपूजा, तीर्थस्थान, हज इत्यादि के
विषय में दादू के विचार ठीक वैसे ही थे जैसे कबीर के। पुनर्जन्म या आवा-
गमन के सिद्धान्त को दादू ने अलङ्कार की तरह माना है। गुरु को उसने
वेद और कुरान दोनों से बड़ा बताया है ।
मलूकदास
एक और प्रसिद्ध महात्मा मलूकदास अकबर के समय में सन् १५७४

मानव धर्म १२१
ईसवी में कड़ा, इलाहाबाद में पैदा हुआ और औरङ्गज़ेब के समय में सन्
१६८२ ईसवी में १०८ वर्ष की उम्र में मरा। उसके मठ नेपाल और काबुल
तक में मौजूद थे। उसके विचार मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा अन्य कर्मकाण्ड इत्यादि
के विषय में ठीक कबीर और दादू के से थे। परसेवा, सब धर्मों की एकता,
हिन्दू मुसलमानों के परस्पर प्रेम इत्यादि पर उसके बिचार हर तरह अपने
समय के अन्य महात्माओं के समान थे। वह लिखता है—
माला कहाँ औ कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकै।
काफ़िर कौन मलेच्छ कहावत,
सन्ध्या निवाज समै करि देखै।
है जमराज कहाँ जबरील है,
काजी है आप हिसाब के लेखै।
पाप औ पुण्य जमा कर बूझत,
देत हिसाब कहाँ धरि फेकै।
दास मलूक कहा भरमौ तुम,
राम रहीम कहावत एकै।
यानी—कहाँ माला और कहाँ तसबीह ! जागो और उनके भरोसे न
रहो, कौन काफ़िर और कौन म्लेच्छ ! वही सन्ध्या और वही नमाज़ । यम
कहाँ है और जिबराईल कहाँ पर है ! ख़ुदा ही आप क़ाज़ी है, और कोई
हिसाब नहीं रखता ।'वही सब के पाप पुण्य को समझता है और हिसाब
रखता है। मलूकदास ! तू कहाँ भूला है, राम और रहीम एक ही के नाम हैं।

१२२ पुस्तक प्रवेश
सत्तनामियों के बारह हुकुम
सत्तनामी सम्प्रदाय का संस्थापक बीरभान दादू का समकालीन था ।
सत्तनामी अपने को साध भी कहते हैं । बीरभान ने केवल एक ईश्वर का
उपदेश दिया, जिसका नाम उसने सत्तनाम रक्खा । सत्तनामी जात पाँत
और छुआछूत के खिलाफ हैं। वे एक दूसरे के साथ खाते पीते हैं, और आपस
ही में विवाह करते हैं । सत्तनामियों में तलाक़ की इजाज़त है, वे मूर्तिपूजा
के विरुद्ध हैं, ध्यान और सदाचार और मनुष्य मात्र की समता पर ज़ोर देते
हैं, मांस मदिरा का निषेध करते हैं । औरङ्गज़ेब के समय में ईश्वरदास
नागर ने सम्राट से इस बात की शिकायत की थी कि सत्तनामी हिन्दू और
मुसलमानों में किसी तरह का भेद नहीं करते । सत्तनामियों के 'आदि
उपदेश' में 'बारह हुकुम' दिए हुए हैं, जिनका सार इस तरह है—
(१) केवल एक ही ईश्वर को मानो, मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या किसी
और बनी हुई चीज़ की पूजा न करो ।
(२) दीनता से रहो ।
(३) कभी झूठ मत बोलो, कभी किसी की निन्दा न करो, कभी चोरी
न करो, दूसरे की चीज़ को कभी लालच की निगाह से न देखो ।
(४) कभी बुरी बात न सुनो, सिवाय मालिक के भजनों के और कुछ
न गाओ ।
(५) ईश्वर पर विश्वास करो ।
(६) जात पाँत को मत मानो, किसी से बहस मत करो ।
(७) साफ़ कपड़े पहनो, किसी तरह का तिलक न लगाओ, और न
माला पहनो ।

मानव धर्म १२३
(८) तम्बाकू और मादक द्रव्यों से बचो । किसी मूर्ति के सामने सिर
मत झुकाओ ।
(६) किसी की जान मत लो, किसी को कष्ट मत पहुंचाओ ।
(१०) एक पुरुष के लिए केवल एक स्त्री और एक स्त्री के लिए केवल
एक पुरुष ।
(११) साधुओं की सङ्गत ही तीर्थ है । और
(१२) किसी तरह के अन्ध विश्वासों, नजूम, शकुन, इत्यादि को
न मानो ।
निस्सन्देह ये हुकुम उस समय के हिन्दू धर्म और इसलाम दोनों के
सर्वोच्च सिद्धान्तों को मिलाकर रचे गए थे ।
दाराशिकोह का गुरु बाबालाल
औरंगज़ेब के भाई दाराशिकोह का गुरु बाबालाल भी इसी तरह के
विचारों का मनुष्य था । दाराशिकोह और बाबालाल की बातचीत एक
फ़ारसी किताब 'नादिर-उन-निकात' में दर्ज है । बाबालाल ने अपने
सिद्धान्तों के समर्थन में जगह जगह फ़ारसी कवि हाफ़िज़ के हवाले दिए हैं ।
नारायनी सम्प्रदाय
इसी तरह उस समय की और भी अनेक सम्प्रदायों ने हिन्दुओं और
मुसलमानों को मिलाने की पूरी कोशिश की । नारायनी सम्प्रदाय में हिन्दू
और मुसलमान दोनों एक समान लिए जाते थे । ये लोग पूरब की तरफ़
मुँह करके दिन में पाँच बार ईश्वर प्रार्थना करते थे । उनके ईश्वर के नामों
में एक नाम अल्लाह भी था । वे अपने मुरदों को दफ़न करते थे, इत्यादि ।

१२४ पुस्तक प्रवेश
प्राणनाथ
औरंगज़ेब के अन्त के दिनों में प्राणनाथ और धरनीदास के नाम भी
मशहूर हैं। प्राणनाथ ने अपनी गुजराती पुस्तक 'कुलज़ुम सरूप' में वेदों
और क़ुरान दोनों से हवाले देकर दोनों के सिद्धान्तों की समानता दर्शाई
है। प्राणनाथ जाति भेद, मूर्तिपूजा और ब्राह्मणों के प्रभुत्व के विरुद्ध था ।
उसके अनुयाइयों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। और हर नए दीक्षा
लेने वाले को हिन्दू और मुसलमान दोनों के साथ बैठ कर भोजन करना
पड़ता था। यही उनकी दीक्षा थी। प्राणनाथ की एक ख़ास पुस्तक 'क़यामत
नामा' है, जिसमें उसने साफ़ लिखा है कि—"तुम सब का, चाहे हिन्दू
हो या मुसलमान, एक ईमान होना चाहिए।" इस पुस्तक में उसने यहूदी,
ईसाई, मुसलमान और हिन्दू सब के पीर, पैग़म्बरों और महात्माओं की
जीवनियाँ दी हैं और सब में मौलिक समानता दर्शाई है। ईश्वर के लिए
उसने अल्लाह और खुदा दोनों नामों का उपयोग किया है ।
अन्य प्रयत्न
जगजीवनदास, बुल्ला साहब, केशव, चरनदास, सहजोबाई, दयाबाई,
ग़रीबदास, शिवनारायन, रामसनेही इत्यादि के उपदेशों का भी ठीक यही
सार था । जगजीवन के शिष्यों में ब्राह्मण, ठाकुर, चमार और मुसलमान,
सब जातियों के लोग शामिल थे । बुल्ला साहब के उपदेशों में फ़ारसी के
शब्द और सूफ़ी परिभाषाएँ भरी हुई हैं । बुल्ला साहब और केशव दोनों,
दिल्ली के एक मुसलमान फ़क़ीर यारी साहब के शिष्य थे । मुसलमान
फ़क़ीरों के हिन्दू शिष्य और हिन्दू फ़क़ीरों के मुसलमान शिष्य उन दिनों
लाखों की तादाद में पाए जाते थे । सहजो और दयाबाई दोनों स्त्रियाँ थीं

मानव धर्म १२५
और चरनदास की शिष्य थीं। चरनदास ने मूर्तिपूजा का विरोध किया, गुरु
की महिमा और भक्ति का उपदेश दिया। ग़रीबदास कबीर का अनुयायी था,
उसके पद्यों में भी फ़ारसी के शब्द और सूफ़ी परिभाषाएं भरी हुई हैं।
रामसनेही सम्प्रदाय का संस्थापक रामचरन भी मूर्तिपूजा का कट्टर
विरोधी था। ये लोग भी दिन में पाँच मरतबा प्रार्थना करते थे और हर
जाति और हर मज़हब के लोगों को अपने में ले लेते थे। स्वामी नारायन
सिंह की क़ायम की हुई शिवनारायनी सम्प्रदाय में भी सब जाति और सब
मज़हबों के लोग लिए जाते थे। जब कोई शिवनारायनी मरता था तो
उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार उसके शरीर को दफ़न कर दिया जाता था,
या फूँक दिया जाता था और या दरिया में बहा दिया जाता था। मुग़ल
सम्राट मोहम्मदशाह स्वामी नारायनसिंह का शिष्य था। मोहम्मदशाह की
सहायता से यह सम्प्रदाय कुछ दिनों खूब फैली।
पिछले दो तीन सौ साल के अन्दर इनमें से अनेक सम्प्रदायों के रूप
में आकाश पाताल का अन्तर पड़ गया और कहीं कहीं उनके अनुयाइयों का
रहन सहन सम्प्रदाय के क़ायम करने वालों की इच्छा और उनके उपदेशों के
ठीक विपरीत साँचे में ढल गया, फिर भी सम्राट मोहम्मदशाह का दस्तख़ती
परवाना अभी तक शिवनारायनियों के मुख्य मठ बलिया ज़िले में मौजूद है।
अठारवीं सदी में सहजानन्द, दुलनदास, गुलाल, भीका और पल्टूदास
के नाम काफ़ी मशहूर हैं।
जगजीवन के शिष्य दुलनदास ने अपने पद्यों में मुसलमान सूफ़ियों
मनसूर, शम्स तबरेज़, निज़ामुद्दीन, हाफ़िज़, बूअली क़लन्दर और फ़रीद

१२६ पुस्तक प्रवेश
की खूब तारीफ़ें की हैं और ईश्वर को "अल्लाह ला मकाँ" बताया है । गुलाल,
भीका और पल्टूदास के कोई कोई पद्य कविता, भाव और भक्तिरस, तीनों
की दृष्टि से अत्यन्त उच्च कोटि के हैं। इन सब में सूफ़ी परिभाषाएँ भरी
हुई हैं। ख़ुदा को उन्होंने प्रायः 'हक़' (सत्य) कह कर पुकारा है।
पल्टूदास का एक पद है—
पूरब में राम है पच्छिम खुदाय है,
उत्तर औ दक्खिन कहो कौन रहता ।
साहिब वह कहाँ है, कहाँ फिर नहीं है,
हिन्दू औ तुरुक तोफ़ान करता ॥
हिन्दू औ तुरुक मिलि परे हैं खँचि में,
अपनी बर्ग दोउ दोन बहता ।
दास पलटू कहै साहिब सब में रहै,
जुदा ना तनिक मैं सांच कहता ॥
यानी—यदि राम पूरब में है और ख़ुदा पच्छिम में है, तब फिर उत्तर
और दक्खिन में कौन रहता है ? ख़ुदा कहाँ है और कहाँ नहीं है ? हिन्दू
और मुसलमान व्यर्थ तूफ़ान खड़ा करते हैं । हिन्दू और मुसलमान लड़ते'हैं
और दोनों मज़हबों को एक दूसरे के विरुद्ध खँचते हैं । दास पलटू सच
कहता है, ख़ुदा सब में है, वह हरगिज़ बटा हुआ नहीं है । यही सच है।
सत्यपीर की पूजा
जिस तरह उत्तर भारत में हिन्दू और मुसलमानों के धार्मिक मेल की
लहरें चल रही थीं, उसी तरह बङ्गाल और महाराष्ट्र में भी उनके अक्स
दिखाई देने लगे। बारहवीं सदी के बङ्गाल में हिन्दुओं का मुसलमानों की

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मानव धर्म १२७

दरगाहों में मिठाई चढ़ाना, कुरान पढ़ना, और मुसल्मानों के त्योहार
मनाना और इसी तरह मुसल्मानों का हिन्दुओं के धार्मिक रिवाजों की ओर
क्रियात्मक आदर दिखलाना एक आम बात थी। इसी मेल जोल में से
बङ्गाल के अन्दर एक नए देवता की पूजा शुरू हुई, जिसे 'सत्यपीर' कहते
थे। हिन्दू और मुसल्मान दोनों सत्यपीर की पूजा करते थे। कहा जाता है
कि गौड़ का बादशाह हुसेनशाह इस नई सम्प्रदाय का संस्थापक था।
निस्सन्देह सत्यपीर की पूजा सम्राट् अकबर के 'दीने इलाही' का एक
प्रारम्भिक रूप थी।
चैतन्य
पन्द्रवीं सदी के अन्त में बङ्गाल के अन्दर महाप्रभु चैतन्य का जन्म
हुआ। दिनेशचन्द्र सेन ने बङ्गला भाषा और बङ्गला साहित्य के इतिहास
पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। उसमें वह लिखता है कि
चैतन्य के जन्म से पहले—
“ब्राह्मणों का प्रभुत्व बहुत कष्टकर हो गया था। कुलीनता
के पक्का होने के साथ साथ जाति भेद अधिकाधिक कड़ा होता
चला गया। ब्राह्मण लोग कहने के लिए अपने धर्म में ऊँचे आदर्शों
का प्रतिपादन करते थे, किन्तु जाति बन्धन के सबब मनुष्य
मनुष्य में अन्तर बढ़ता जा रहा था। नीची जातियों के लोग
ऊँची जातियों के लोगों के स्वेच्छाचार के नीचे आहें भर रहे थे।
इन ऊँची जाति के लोगों ने नीची जाति वालों के लिए विद्या के
दरवाज़े बन्द कर रक्खे थे। इन लोगों के लिए अधिक ऊँचे
जीवन में प्रवेश करने की मनाही थी और नए पौराणिक धर्म

१२८ पुस्तक प्रवेश
पर ब्राह्मणों का ठेका हो गया था, मानो वह कोई बाज़ारी
चीज़ हो ।"*
इसलाम के सरल धार्मिक सिद्धान्तों और मनुष्य मात्र की समता के
आदर्श ने उस समय के बङ्गाली समाज में तहलका मचा दिया । चैतन्य ने
इस स्थिति पर गम्भीरता के साथ विचार किया । वह घर बार छोड़ कर
देशाटन करने लगा । अनेक साधुओं और फ़क़ीरों से उसकी भेंट हुई ।
चैतन्य के जीवन चरित्र का रचयिता कृष्णदास लिखता है कि बृन्दावन में
एक मुसलमान पीर के साथ चैतन्य की भेंट हुई और पीर ने अपनी धार्मिक
पुस्तक के आधार पर चैतन्य को एक ख़ुदा की पूजा का उपदेश दिया । जदु
भट्टाचार्य लिखता है—"चैतन्य के जीवन की अनेक घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे
पूरी तरह साबित है कि वह मुसलमानों से बड़ा प्रेम करता था ।"† इसमें
सन्देह नहीं कि मुसलमानों के विचारों का चैतन्य के उपदेशों पर बहुत
बड़ा असर पड़ा ।
चैतन्य ने गुरु की सेवा और भक्ति का उपदेश दिया । जाति भेद का
उसने कड़ा विरोध किया । ब्राह्मणों के तमाम कर्मकाण्ड को उसने त्याज्य
बताया । चैतन्य के शिष्यों में हिन्दू और मुसलमान, उच्च जाति के लोग
और नीच जाति के लोग, सब शामिल थे । उसके मुख्य शिष्यों में से तीन
रूप, सनातन और हरिदास, मुसलमान थे । अपने तमाम शिष्यों में वह
हरिदास से सब से अधिक प्रेम रखता था ।
कर्ताबाबा
चैतन्य की सम्प्रदाय की एक शाखा का नाम कर्ताभज था । उसका

  • History of Bengali Language and Literature, by Dinesh Chandra Sen.
    † Jadu Bhattacharya: Hindoo Castes and Sects. p. 464.

मानव धर्म १२६
संस्थापक कर्ताबाबा एक मुसलमान फ़क़ीर की दुआ से पैदा हुआ था और
उस फ़क़ीर ने ही उसे पाला था । कर्ताबाबा के बाईस मुख्य शिष्य 'बाईस
फ़क़ीर' के नाम से मशहूर हुए । इनमें से एक रामदुलाल की बाबत, जो
कर्ताबाबा का उत्तराधिकारी हुआ, कहा जाता है कि उसके अन्दर उसी
मुसलमान फ़क़ीर की रूह आ गई थी । इस सम्प्रदाय के आचार्यों में से
अनेक हिन्दू हुए और अनेक मुसलमान । ये लोग केवल एक ईश्वर को
मानते थे, गुरु को ईश्वर का अवतार मानते थे, दिन में पाँच बार गुरुमन्त्र
का जाप करते थे, मांस मदिरा से परहेज़ करते थे, शुक्रवार को पवित्र दिन
मानते थे और उसे धर्म चर्चा में व्यतीत करते थे, जात पाँत, ऊँचनीच,
हिन्दू, मुसलमान, ईसाई का उनमें कोई भेद न था, साल में कम से कम
एक दो बार सम्प्रदाय के सब लोग एक साथ मिल कर भोजन करते थे,
इत्यादि ।
बौद्ध ग्रन्थों में मुसलमान
बङ्गाल में जिन दिनों बौद्धों के ऊपर शैवों के अत्याचार जारी थे,
मालूम होता है, एक दरजे तक बौद्धों को मुसलमानों से सहायता, दिलासा
और आश्रय मिला । बङ्गाल के उस समय के बौद्ध ग्रन्थों, 'शून्य पुराण',
'धर्म पूजा पद्धति', 'धर्म गजन', 'बाद जननी', इत्यादि में और बौद्ध गीतों
में ब्राह्मणों के प्रति कोष और बदले का भाव और मुसलमानों, मुसलिम
विचारों और मुसलमान ग्रन्थों के प्रति प्रेम भरा हुआ है । उस समय के
इन बौद्ध काव्यों से कुछ विचित्र बातों का पता चलता है । मसलन यह कि
उस समय बङ्गाल जाने वाले बहुत से मुसलमान मांस से परहेज़ करते थे,
एक जगह लिखा है—
ह

१३० पुस्तक प्रवेश
“खोंकड़ ( ? ) पच्छिम की तरफ को मुँह किए ईश्वर से
प्रार्थना कर रहा है ।
“कोई अल्लाह की पूजा करता है, कोई अली की और कोई
महमूद साईं की ।
“मियाँ किसी जीव की हत्या नहीं करता और न मुरदार
खाता है ।
“धीमी आँच के ऊपर वह अपना भोजन पका रहा है ।
“जात पाँत के भेद अब धीरे धीरे टूट जायेंगे, क्योंकि देखो
हिन्दू कुटुम्ब के अन्दर एक मुसलमान है ।
✕ ✕ ✕
“ऐ खुदा-! मैं जानता हूँ तू और सब से बड़ा है । मैं बहुत
चाहता हूँ कि तेरे मुँह से कुरान सुनूँ ।”
महाराष्ट्र सन्त
उत्तर भारत की तरह महाराष्ट्र के हिन्दू महात्माओं ने भी हिन्दू और
मुसलमान धर्मों को मिलाने का प्रयत्न किया । प्रसिद्ध महाराष्ट्र विद्वान
महादेव गोविन्द रनाडे लिखता है—
“इसलाम का कठोर एक ईश्वरवाद कबीर, नानक इत्यादि
सन्तों के चित्तों में साफ़ घर कर गया था । हिन्दू त्रिमूर्ति दत्तात्रेय
के उपासक अक्सर अपने देवता को मुसलमान फ़क़ीर के से कपड़े
पहनाते थे । यही प्रभाव महाराष्ट्र जनता के चित्तों पर और भी
ज़ोरों के साथ काम कर रहा था । ब्राह्मण और अब्राह्मण दोनों
तरह के प्रचारक वहाँ लोगों को उपदेश दे रहे थे कि राम और

मानव धर्म १३१
रहीम को एक समझो, कर्मकाण्ड और जातिभेद के बन्धनों को
तोड़ दो और ईश्वर में विश्वास और मनुष्य मात्र के साथ प्रेम
को सब मिलकर अपना एक समान धर्म बनाओ ।" ✤
नामदेव
महाराष्ट्र का पहला सन्त, जिसने लोगों को जातिभेद, कर्मकाण्ड
और धार्मिक सङ्कीर्णता के बन्धन से हटा कर स्वतन्त्रता, प्रेम और भक्ति
का उपदेश दिया, नामदेव था। रनाडे लिखता है कि नामदेव और दूसरे
सन्तों के उपदेशों का नतीजा यह हुआ कि—मराठी भाषा के साहित्य की
उन्नति हुई, जातिभेद ढीला हुआ, स्त्रियों का पद ऊँचा हुआ, उदारता और
दयालुता फैली, इसलाम के साथ हिन्दू मत का एक दरजे तक मेल हो
गया, कर्मकाण्ड, तीर्थयात्रा इत्यादि का महत्व घटा, प्रेम का महत्व बढ़ा,
अनेक देवी देवताओं की पूजा कम हुई, और विचारों और क्रियाओं दोनों
के क्षेत्रों में राष्ट्र की ताक़त बढ़ी। †
खेचर
नामदेव के गुरु खेचर ने नामदेव को जो उपदेश दिया उससे ज़ाहिर है
कि खेचर मूर्तिपूजा का कट्टर विरोधी था। उसने कहा कि—
“पत्थर का देवता कभी नहीं बोलता, तो फिर वह हमारे
इस जीवन के दुःखों को कैसे दूर कर सकता है ? पत्थर की मूर्ति
को लोग ईश्वर समझ बैठते हैं, किन्तु सच्चा ईश्वर बिलकुल दूसरा
ही है। यदि पत्थर का देवता हमारी इच्छाएँ पूरी कर सकता तो

  • Ranade : Rise of the Maratha Power, pp. 50, 51.
    † Ibid.

५३२ पुस्तक प्रवेश
गिराने पर वह टूट क्यों जाता ? जो लोग पत्थर के बने हुए
देवता की पूजा करते हैं वे अपनी मूर्खता से सब कुछ खो बैठते
हैं। जो लोग ये कहते हैं और जो ये सुनते हैं कि पत्थर का
देवता अपने भक्तों से बातचीत करता है, वे दोनों मूर्ख हैं।
× × ×।"*
नामदेव के अनेक शिष्यों और अनुयाइयों में पुरुष और स्त्री, हिन्दू
और मुसलमान, ब्राह्मण और मराठा, कुनबी, दरज़ी और कुम्हार यहाँ तक
कि अन्त्यज, महार और धर्मनिष्ठ वेश्याएँ तक शामिल थीं।†
चोखमेला और बहिराम
नामदेव का एक महार शिष्य चोखमेला जिस समय पण्डरपुर के मशहूर
मन्दिर में जाने लगा और ब्राह्मण पुरोहित ने उसे मना किया तो चोख-
मेला ने उत्तर दिया—
“उच्च जाति में पैदा होने से क्या लाभ × × × चाहे मनुष्य
नीच जाति का भी हो, किन्तु यदि वह दिल का सच्चा है, ईश्वर से
प्रेम करता है, सब प्राणियों को अपने समान समझता है, अपने
और दूसरों के बच्चों में कोई भेद भाव नहीं रखता, और सच बोलत .
है, तो उसकी जाति पवित्र है और ईश्वर उससे प्रसन्न है। जिस
मनुष्य के हृदय में ईश्वर पर विश्वास है और मनुष्य के साथ प्रेम
है, उससे जाति कभी न पूछो। ईश्वर अपने बच्चों से प्रेम और
भक्ति चाहता है, वह उनकी जाति की परवा नहीं करता।।”‡

  • Bhandarkar : Vaishnavism
    † Ranade : Rise of the Maratha Power, p. 146
    ‡ Ibid p. 154

बहिर्राम भट्ट सत्य की खोज में दो दफ़े हिन्दू से मुसलमान और
मुसलमान से हिन्दू हुआ । अन्त में उसने कहा—"न मैं हिन्दू हूँ और न
मुसलमान ।”
शेख मोहम्मद
दक्खिन के अन्दर शेख मोहम्मद एक बहुत बड़ा भक्त हुआ है। उसके
अनुयायी रमज़ान के रोज़े भी रखते हैं और एकादशी का व्रत भी, मक्के की
भी यात्रा करते हैं और पण्डरपुर के मन्दिर की भी ।
तुकाराम
सन्त तुकाराम दक्खिन का शायद सब से अधिक सर्वमान्य भक्त था ।
कबीर इत्यादि के समान तुकाराम जात पाँत, मूर्तिपूजा, यज्ञ, हवन और
अन्य कर्मकाण्ड का कट्टर विरोधी और एक हरि की भक्ति का प्रचारक था ।
प्रत्येक प्राणी के रूप में उसे हरि ही दिखाई देता था । इस्लाम और हिन्दू
धर्म को मिलाने का तुकाराम का प्रयत्न उसके एक पद्य से ज़ाहिर है जिसका
भाषान्तर यह है—
जो 'अल्लाह' चाहता है, ऐ मेरे बाबा ! वही होता है ।
सब का बनाने वाला सब का बादशाह है। पशु और मित्र, बग़ीचे
और माल, सब जाते रहेंगे । ऐ बाबा ! मेरा चित्त मेरे 'साहेब'
पर लगा है। वही मेरा बनाने वाला है । मैं मन के घोड़े पर
सवार हूं और आत्मा सवारी करती है। ऐ बाबा ! अल्लाह का
ज़िक्र करो, सब उसी के रूप हैं । तुका कहता है, जो मनुष्य इस
बात को समझे, वही दरवेश है ।
बड़े नामों में सब से पहला नाम 'अल्लाह' है । उसे सदा

१३४ पुस्तक प्रवेश
दोहराते रहो, भूलो नहीं। सचमुच अल्लाह एक है, सचमुच नबी
एक है, वहाँ तू भी एक है, वहाँ तू भी एक है, वहाँ तू भी एक
है ! वहाँ न मैं हूँ और न तू है ! ❀
निस्सन्देह हिन्दूमत, बौद्धमत और इसलाम के मेल से उस समय
भारत के अन्दर उत्तर से दक्खिन तक और पूर्व से पच्छिम तक एक सुन्दर
सार्वजनिक मानव धर्म की नींव रक्खी जा रही थी, जिसका मूल मन्त्र
एकता, प्रेम और सब की सेवा था।
भारतीय कला और मुसलमान
निर्माणकला
जिस तरह धार्मिक विचारों पर उसी तरह भारतीय निर्माणकला
और भारत की चित्रकारी पर भी मुसलमानों के आने का बहुत गहरा और
हितकर प्रभाव पड़ा। प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार लिखता है कि मुसलमानों
के समय में भारत की निर्माणकला ने साफ़ उन्नति की।
ईसा की आठवीं सदी तक भारतीय शिल्पकला पर बौद्धमत का ख़ास
असर था। आठवीं से तेरहवीं सदी तक इस कला में हिन्दू आदर्शों की
प्रधानता रही, किन्तु फिर भी बौद्धमत का प्रभाव उस पर साफ़
दिखाई देता रहा। हम इस विषय की वैज्ञानिक बारीकियों में पड़ना नहीं

  • Tukaram's Abhanga, p. 85, 86, Godbole's edition.

सन्त तुकाराम
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा

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भारतीय कला और मुसलमान १३५

चाहते । किन्तु एक दो बातें स्पष्ट हैं । हर देश के लोगों के कला सम्बन्धी
आदर्शों पर बहुत बड़ा असर उस देश की भौगोलिक स्थिति का पड़ता है ।
भारत अभेद्य जङ्गलों, प्रचण्ड ऋतुओं, बड़ी बड़ी नदियों, पहाड़ों और
घनी वनस्पतियों का देश है । यही वजह है कि भारतीय शिल्पकला में
सदा से विशालता, स्थूलता और विस्तार पर अधिक ज़ोर दिया जाता
रहा है । भारत के बनों में बेशुमार तरह तरह की फूल पत्तियाँ इधर से
उधर तक गुथी हुई दिखाई देती हैं, नीचे की ओर या ऊपर की ओर कहीं
भी नज़र डाली जाय, एक गज़ भर ज़मीन सूनी दिखाई नहीं देती ।
यही वजह है कि प्राचीन भारतीय मन्दिरों और प्रासादों की दीवारों
के ऊपर, और कोनों में कहीं एक फुट ज़मीन भी ख़ाली दिखाई नहीं देती ।
पुराने समय के हिन्दू मन्दिरों में नींव के ऊपर नींव, मञ्जिल के ऊपर
मञ्जिल, कङ्गरे के ऊपर कङ्गरा और कलश के ऊपर कलश आकाश तक
पहुँचते हुए दिखाई देते हैं, और इसके साथ साथ कोई कोना या दीवार का
हिस्सा नहीं रहता जो मूर्तियों या चित्रों से न भरा हो । शिल्पकला
विशारदों की राय है कि संसार के किसी भी दूसरे देश की निर्माणकला
विस्तार बाहुल्य और अतिशोभा में हिन्दू निर्माणकला का मुकाबला नहीं
कर सकती ।
इसके ठीक विपरीत अरब एक विशाल रेगिस्तान है, जिसमें दूर दूर
और कहीं कहीं थोड़े से हरे भरे नख़लिस्तान दिखाई देते हैं । इसके ऊपर
अरब की तेज़ गरमी, भोजन और वस्त्र के लिए परिमित और इनी गिनी
सामग्री और रेत के पहाड़ । कुदरती तौर पर मुसलमानों की शुरू की
निर्माणकला में बड़े बड़े भवन, सादी साफ़ दीवारें और ऊँचे मीनार और

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गुम्बद् अधिक देखने में आते हैं। इसलाम के एक ईश्वरवाद और मूर्तिभञ्ज-
कता ने भी पुराने मूर्तिपूजक धर्मों के मुक़ाबले में मुसलिम कला के इस आदर्श
को अपना एक ख़ास रूप दिया और उसे और अधिक पक्का कर दिया ।
जिस मनुष्य की आँखें प्राचीन हिन्दू मन्दिरों के विस्तार प्रपञ्च से उकता
गई हों उसे एक सीधी सादी मुसलिम मसजिद की साफ़ दीवारों में विश्राम
मिलना क़ुदरती है । इसी तरह जो मनुष्य पुरानी मुसलिम मसजिदों या
प्रासादों की अमिश्रता से ऊब गया हो, उसके लिए हिन्दू निर्माणकला का
बाहुल्य एक दरजे तक अवश्य आकर्षक होगा ।
दो कलाओं का आलिंगन
यह भी स्पष्ट ज़ाहिर है कि इन दोनों आदर्शों के मेल जोल से एक इस
तरह की निर्माणकला को जन्म दिया जा सकता था, जो दोनों की अपेक्षा
सुन्दर और अधिक आकर्षक हो । धार्मिक और जातीय पक्षपात इस तरह
के सम्मिश्रण के रास्ते में बाधक होते हैं, किन्तु फिर भी दो अलग अलग
आदर्शों के मिलने से जाने या अनजाने इस तरह का सम्मिश्रण हुए बिना
नहीं रह सकता । इसके अलावा हम ऊपर दिखला चुके हैं कि मुसलमानों
के भारत आने के समय से ही इस धार्मिक या जातीय पक्षपात के मिटाने
के लिए भी अनेक कोशिशें जारी थीं। जिस तरह धार्मिक विचारों में उसी
तरह निर्माणकला और चित्रकारी के मैदान में भी भारत ने नए आदर्शों को
जन्म देना शुरू किया, जो हिन्दू और मुसलिम दोनों अलग अलग आदर्शों से
उच्चतर थे और जिनके नतीजे भी उन दोनों के नतीजों से अधिक सुन्दर
थे । इन तीनों तरह के आदर्शों को साक्षात करने के लिए हमें एक ओर
दक्खिन के प्राचीन मन्दिरों या जगन्नाथपुरी के मन्दिर, दूसरी ओर अजमेर