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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मानव धर्म १०१
उत्तर में लाकर उनके प्रचार करने का कार्य रामानन्द ने किया। रामानन्द
ने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति का उपदेश दिया और हर जाति
के लोगों को अपनी सम्प्रदाय में शामिल किया। मैकॉलिफ़ लिखता है
कि—"इसमें कोई सन्देह नहीं कि बनारस में विद्वान मुसलमानों
के साथ रामानन्द की भेंट हुई।" रामानन्द के शिष्यों और अनुयाइयों
में अनेक मुसलमान भी थे। दो नाम उसके शिष्यों में सबसे अधिक
प्रसिद्ध हैं, एक तुलसीदास और दूसरा कबीर। गोस्वामी तुलसीदास की
रामायन सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। तुलसीदास का मोहावरा अवधी है।
फिर भी संस्कृत, फ़ारसी, और अरबी तीनों के शब्द भण्डारों से अपनी
पुस्तक को अलंकृत कर एक ऐसी सरल और सर्वप्रिय हिन्दोस्तानी भाषा को
रचने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त है जिसमें ऊँचे से ऊँचा साहित्य
लिखा जा सका। हिन्दोस्तानी ज़बान के बनाने वालों में गोस्वामी तुलसी-
दास का नाम सदा के लिए स्मरणीय रहेगा।
कबीर
निस्सन्देह कबीर की शुमार भारत के महान से महान तत्वदर्शियों,
धर्माचार्यों और समाज सुधारकों में की जानी चाहिए। कबीर एक अत्यन्त
स्वतन्त्र विचार का महापुरुष था। वह मत मतान्तरों के भेद और हर तरह
के कर्मकाण्ड और रूढ़ियों का कट्टर विरोधी था। हिन्दुओं और मुसलमानों
की एकता का इस देश के अन्दर वह सब से पहला प्रचारक और सब से
महान समर्थक था। उसका जन्म सन् १३६८ ईसवी में हुआ और मृत्यु
सन् १४१८ ईसवी में। कहा जाता है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी के
गर्भ से उत्पन्न हुआ था। बनारस के एक मुसलमान जुलाहे नीरू और

१०२ पुस्तक प्रवेश
उसकी स्त्री ने कबीर का पालन पोषण किया। बनारस में रह कर कबीर
हिन्दू और मुसलमान दोनों मतों के सिद्धान्तों से पूरी तरह परिचित हो
गया। मोहसिन फ़ानी लिखता है कि कबीर ने लड़कपन ही में अनेक हिन्दू
और मुसलमान विद्वानों और सन्तों से भेंट की। बहुत दिनों वह जौनपुर,
झूँसी इत्यादि में शेख़ तक़ी और अन्य मुसलमान सूफ़ियों और पीरों के
के साथ रहा, जिनका ज़िक्र कबीर साहब ने अपनी 'रमैनी में किया है।
इसके बाद कबीर ने बनारस में अपना सत्सङ्ग शुरू कर दिया। कबीर के
विचार इतने स्वतन्त्र थे कि शुरू में मुसलमान मौलवी और हिन्दू पण्डित
दोनों उससे बेहद नाराज़ हुए। इन लोगों, ने हर तरह से कबीर को कष्ट
पहुँचाने और दिक़ करने की कोशिश की। अन्त में हिन्दू और मुसलमान
दोनों जातियों में से कबीर के हज़ारों अनुयायी हो गए। जीवन भर कबीर
ने अपने पिता का काम यानी कपड़े बुनने का धन्धा नहीं छोड़ा। हिन्दुओं
में यह एक बात सदा से प्रसिद्ध रही है कि काशी में मरने से मनुष्य को
मुक्ति प्राप्त होती है। इसके विपरीत कहा जाता है कि गोरखपुर से १५ मील
पच्छिम में मगहर में मरने वाले को गधे की योनि में जन्म लेना पड़ता है।
कबीर ने अन्त समय निकट आने पर जान बूझ कर इस प्राचीन अन्ध-
विश्वास की अवहेलना प्रकट करने के लिए काशी से मगहर के लिए प्रस्थान
किया और मगहर ही में अपने हज़ारों हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों
की मौजूदगी में चोला छोड़ा। कहा जाता है कि कबीर के मरने के बाद
उसके कुछ हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों में झगड़ा हुआ, हिन्दू उसे
हिन्दू कहते थे और उसके शरीर को जलाना चाहते थे, मुसलमान उसे
मुसलमान मान कर दफ़न करना चाहते थे।

मानव धर्म १०३
कबीर हिन्दुओं के वर्णाश्रम धर्म या जातिभेद का कट्टर विरोधी था ।
वेदों, शास्त्रों या कुरान में से किसी को भी वह निर्भ्रान्त या हर बात में
प्रमाण न मानता था । सूफ़ियों के समान प्रेम, इश्क़ या भक्ति उसका
मुख्य धर्म था । अपनी रमैनी, शब्दों और साखियों के ज़रिए उसने हिन्दू
और मुसलमान दोनों को एक समान धर्म का उपदेश दिया, निर्भीकता
के साथ दोनों मतों की रूढ़ियों का एक समान खण्डन किया, और प्राणि-
मात्र के साथ प्रेम और एक ईश्वर की भक्ति का सबको एक समान उपदेश
दिया ।
कबीर ने हिन्दू मत और इस्लाम दोनों में से सामान्य सच्चाइयों को
एक समान ग्रहण किया । संस्कृत और फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी, चारों
भाषाओं के शब्दों का अपने पद्यों में उसने एक समान उपयोग किया ।
हिन्दू और मुसलमान धर्मों की झूठी पृथकता पर दुख प्रकट करते
हुए, दोनों को एक सार्वजनिक धर्म दर्शाते हुए और दोनों को प्राणिमात्र
पर दया का उपदेश देते हुए, कबीर कहता है—
भाई रे दुइ जगदीश कहाँ ते आया, कहु कौने बौराया ।
अल्लाह राम करीमा केशव, हरि हजरत नाम धराया ॥
गहना एक कनक ते गहना, यामैं भाव न दूजा ।
कहन सुनन को दुइ कर थापे, एक निमाज एक पूजा ॥
वही महादेब बही महम्मद, ब्रह्मा आदम कहिए ।
को हिन्दू को तुरक कहावै, एक जिमी पर रहिए ॥
वेद कितेब पढ़े वै कुतुबा, वै मुलना वै पांडे ।
बेगर बेगर नाम धराए, एक मिट्टी के भांडे ॥

१०४ पुस्तक प्रवेश
कहहिं कबीर वै दूनों भूले, रामहिं किनहु न पाया।
वै खस्सी वै गाय कटावें, बादिहि जन्म गमाया॥
अर्थ—हे भाई दो ईश्वर कहाँ से आगए ! तुम्हें किसने बहका दिया ?
अल्लाह और राम, करीम और केशव, हरि और हज़रत, एक ही स्वर्ण के
बने आभूषणों के अलग अलग नाम हैं। इनमें दुई का भाव नहीं है।
कहने सुनने को तुमने दो दो नाम रख लिए हैं—एक नमाज़ और एक
पूजा। वही महादेव है और वही मोहम्मद, वही ब्रह्मा है और वही आदम ।
हिन्दू और मुसलमान में कोई भेद नहीं, दोनों एक ज़मीन पर रहते हैं।
एक वेद पढ़ते हैं और दूसरे कुरान पढ़ते हैं। एक मौलाना कहलाते हैं और
दूसरे पण्डित। ये सब अलग अलग नाम धर लिए हैं वास्तव में सब एक ही
मिट्टी के बरतन हैं। कबीर कहता है, ये दोनों भूले हुए हैं। इनमें से किसी
ने राम को नहीं पाया। एक बकरा काटते हैं और दूसरे गाय काटते हैं—
दोनों वृथा जन्म खोते हैं।
कबीर कहता है—
हिन्दू कहूँ तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।
पाँच तत्त का पूतला, गैबी खेले माहिं ॥
अर्थ—मैं न हिन्दू हूँ और न मुसलमान, मैं पञ्च तत्त्वों का बना हुआ
पुतला हूँ जिसके अन्दर ग़ैबी (आत्मा) क्रीड़ा करता है।
कबीर के उपदेशों पर मुसलमान सूफ़ी फ़क़ीरों के उपदेशों का प्रभाव
बिलकुल साफ़ दिखाई देता है। हिन्दुओं में कबीर से पहले का कोई ऐसा
महात्मा न था जिसका वह अनुसरण करता; इसलिए उसके लिए मुसलमानों
का अनुसरण स्वाभाविक और अनिवार्य था। फ़रीदुद्दीन अत्तार के पन्दनामे

मानव धर्म १०५
और जलालुद्दीन रूमी और शेख़सादी शीराज़ी की कविताओं से कबीर
निस्सन्देह भली भाँति परिचित था । कबीर के पद्यों में इन महापुरुषों और
दूसरे सूफ़ीयों के उपदेशों की बार बार झलक आती है । कबीर का नीचे
लिखा पद्य —
जब तू आयो जगत में, जगत हँसे तू रोय ।
अब तो ऐसी कर चलो, तू हाँसे जग रोय ॥
शेख़सादी के इस मशहूर पद्य का साफ़ भाषान्तर है—
याद दारी के वक़्ते ज़ादने तो,
हमा ख़न्दाँ बुवन्दो तू गिरियाँ ।
आँचुनाज़ी के बाद मुर्दने तो,
हमा गिरियाँ शवन्दो तू ख़न्दाँ ॥
इसी तरह की और भी अनेक मिसालें कबीर के पद्यों से दी जा
सकती हैं । कबीर के पद्यों में फ़ारसी और अरबी के शब्द और सूफ़ीयों की
उपमाएँ और उनके अलङ्कार इधर से उधर तक भरे पड़े हैं । अहमदशाह
ने कबीर के बीजक में हबीब, महबूब, आशिक़, माशूक़, मुसाफ़िर, मुक़ाम,
हाल, जमाल, जलाल, साक़ी, शराब, क़हर, मेहर, ग़ैबत, हुज़ूर, हैरत,
नासूत, मलकूत, जबरूत, लाहूत, हाहूत, हक़ इत्यादि, इस तरह के दो सौ
से ऊपर अरबी और फ़ारसी के शब्द चुने हैं, जिन्हें कबीर ने ठीक उन्हीं
माइनों में उपयोग किया है जिनमें सूफ़ियों ने, और जिनसे साफ़ मालूम
होता है कि कबीर अपने विचारों और उपदेशों के लिए मुसलमान
सूफ़ीयों का किस दरजे आभारी था ।
कबीर ने संस्कृत की निस्बत भाषा में अपने पद्यों को लिखना पसन्द

१०६ पुस्तक प्रवेश
किया। उसका उद्देश आम जनता तक अपने विचारों को फैलाना था।
कबीर ने अपनी साखी में एक जगह पर लिखा है—
संसकिरत है कूप जल, भाषा बहता नीर।
अर्थ—संस्कृत कुएँ का पानी है, किन्तु भाषा (हिन्दी) बहती हुई नदी
के समान है।
कबीर के पद्यों में कहीं संस्कृत भरी हिन्दी और कहीं फ़ारसी भरी उर्दू,
दोनों मिलती हैं। कबीर ने ईश्वर के लिए जगह जगह—राम, हरी, गोविन्द,
ब्रह्म, समरथ, साईं, सत्पुरुष, रँगरेजवा, बेचूँ (अनिर्वचनीय), अल्लाह और
ख़ुदा—सब शब्दों का उपयोग किया है; किन्तु ईश्वर के लिए उसका सब
से प्यारा नाम “साहेब” है। कबीर को इस बात का दावा है कि उसने
“तुममें और मुझमें” प्राणिमात्र में, और सब पदार्थों में व्यापक “ज़ाते
पाक” का साक्षात दर्शन किया था। सूफ़ीयों के समान ही कबीर ने स्थान
स्थान पर ख़ुदा को ‘नूर’ बतलाया है और हर चीज़ को ख़ुदा माना है।
रमैनी में बद्रुद्दीन शहीद, इब्न सीना और जिली के अनेक पद्यों का बिल-
कुल तरजुमा सा दिखाई देता है। सूफ़ीयों ही के समान कबीर ने गुरु को
गोविन्द बतलाया है और अपनी साखी में लिखा है—
हरि के रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर।
अर्थ—यदि हरि नाराज़ हो जाय तब भी कुछ बचत हो सकती है,
किन्तु यदि गुरु नाराज़ हो जाय तब फिर कोई बचत नहीं। कबीर का यह
पद्य मौलाना रूम के एक पद्य का तरजुमा मालूम होता है।
कबीर ने गुरु को ‘सिकलीगर’ लिखा है। कबीर प्रेम का परम विश्वासी

मानव धर्म १०७
था । वह लिखता है कि—एक प्रेम समस्त संसार में व्यापक है । ईश्वर की
खोज के विषय में वह लिखता है—
मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास में ।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में ॥
खोजी होय तो तुरते मिलिहौं, पल भर की तालास में ।
कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में ॥
अर्थ—ऐ बन्दे ! तू मुझे कहाँ ढूँढ़ता है ? मैं तेरे पास हूं । मैं न मन्दिर
में हूँ न मसजिद में, न काबे में हूँ न कैलाश में । यदि तू सच्चा खोजी है
तो मैं तुरन्त एक पल भर की खोज में तुझे मिल जाऊँगा । कबीर कहता
है—हे साधो ! सुनो, साहेब सब के प्राणों का प्राण है ।
सूफ़ियों की तरह कबीर ने लोगों को इश्क़ की शराब पीने की दावत
दी है । अभ्यास द्वारा ब्रह्मत्व की ओर रूह की यात्रा को कबीर ने ठीक
उन्हीं शब्दों में बयान किया है जिन शब्दों में कबीर से पाँच सौ साल पहले
मनसूर ने बयान किया था । अपनी पुस्तक 'दस मुक़ामी रेख्ता' में कबीर ने
हज़रत मोहम्मद के मेराज के क़िस्से को अपने ढङ्ग से बयान किया है ।
वास्तव में कबीर ने भारत का ध्यान एक ऐसे सार्वजनिक धर्म की ओर
दिलाया जो न हिन्दू था, न मुसलमान । इसीलिए उसने हिन्दू और
मुसलमान दोनों के अलग अलग कर्मकाण्डों, दोनों के मतभेदों, दोनों के
धार्मिक ग्रन्थों की निष्भ्रान्तता इत्यादि की अत्यन्त कड़े से कड़े शब्दों में
निर्भीकता के साथ आलोचना की है । ब्राह्मणों के प्रभुत्व, जात पाँत और
छुआछूत का वह कट्टर विरोधी था ही । राम शब्द को उसने ईश्वर के अर्थों

१०८ पुस्तक प्रवेश
में उपयोग किया है, किन्तु उसने साफ़ लिखा है कि उसका राम दशरथ का
पुत्र राम नहीं है । वह लिखता है—
सिरजनहार न ब्याही सीता, जल पषाण नहिं बन्धा ।
यानी—सिरजनहार ने सीता से विवाह नहीं किया था और न उसने
समुद्र के ऊपर पत्थरों का पुल बाँधा ।
कबीर ने अनेक स्थान पर दसों अवतारों का खण्डन किया है । वह
ईश्वर के विषय में कहता है —
दशरथ कुल अवतरि नहिं आया, नहिं लङ्का के राव सताया ।
नहीं देवकी गर्भहि आया, नहीं यशोदा गोद खेलाया ।
पृथ्वी रवन धवन नहिं करिया, पैठि पताल नाहिं बलि छलिया ।
नहिं बलिराज सो माँडल रारी, नहिं हरनाकुश वधल पछारी ।
बगह रूप धरणि नहिं धरिया, छत्री मारि निछत्री नहिं करिया ।
नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया, नहिं ग्वालन सँग बन बन फिरिया ।
गण्डकि शालिग्राम नहिं कूला, मच्छ कच्छ होय नहिं जल डोला ।
द्वारावती शरीर नहिं छाँड़ा, ले जगन्नाथ पिण्ड नहिं गाड़ा ।
जात पाँत और छुयाछूत के विषय में कबीर ने कहा है—
गुप्त प्रकट है एकै दूधा, का को कहिए ब्राह्मण शूद्रा ।
झूठे गर्भ भूलो मति कोई, हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ।
और के छिये लेत हो छींछा, तुमसों कहहु कौन है नीचा ।
कबीर ने आवागमन के मोटे रूप का जिस तरह आम हिन्दू
मानते हैं खण्डन किया है; इस विषय में उसके विचार काफ़ी गूढ़ और
गहरे हैं ।

मानव धर्म १०६
सारांश यह कि कबीर ने क़ुरान और मोहम्मद साहब में अन्धविश्वास,
हज़, रोज़े और नमाज़ इत्यादि का मज़ाक़ उड़ाते हुए मुसलमानों को
समस्त रूढ़ियाँ छोड़ देने का उपदेश दिया है, हिन्दुओं को उसने उतने ही
ज़ोर के साथ जात पाँत, मूर्तिपूजा, अवतार, और छुआछूत और वेद और
शास्त्रों में अन्धविश्वास छोड़ देने की सलाह दी है, दोनों को उसने प्राणि-
मात्र पर दया रखने, सबको एक ख़ुदा की औलाद और भाई भाई समझने,
अहङ्कार त्यागने और सब की सेवा करने का उपदेश दिया । कबीर के नीचे
लिखे पद्य इस विषय में याद रखने योग्य हैं—
पूरब दिशा हरो को बासा, पच्छिम अलह मुकामा ।
दिल में खोजि दिलहि माँ खोजो, इहै करीमा रामा ॥
जेते औरत मर्द उपानी, सो सब रूप तुम्हारा ।
कबीर पोंगरा अलह राम का, सो गुरु पीर हमारा ॥
हिन्दू तुरुक की एक राह है, सतगुरु सोइ लखाई ।
'कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, राम न कहूँ खुदाई ॥
हिन्दू कहें राम मोंहि प्यारा, तुरुक कहें रहिमाना ।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना ॥
यानी— लोग कहते हैं हरि पूरब में रहता है और अल्लाह पच्छिम में,
लेकिन कबीर कहता है अपने दिल के अन्दर खोजो, वहीं करीम हैं और
वहीं राम हैं ।

११० पुस्तक प्रवेश
जितने पुरुष और स्त्री रचे गए हैं सब तुम्हारा ही रूप हैं, कबीर अल्लाह
का और राम का बेटा है, वही कबीर का गुरु और पीर है ।
हिन्दू और तुरुक की एक ही राह है, जो सत्गुरु ने बताई है, कबीर
कहता है, सुनो भाई सन्तो ! राम और ख़ुदा में कोई भेद नहीं है ।
हिन्दू राम कहते हैं, मुसलमान रहीम कहते हैं । आपस में दोनों लड़
लड़ कर मरते हैं, मर्म को कोई नहीं जानता ।
कबीर पहला भारतवासी था, जिसने हिन्दू और मुसलमान दोनों के
लिए बल्कि समस्त मानव जाति के लिए एक सामान्य धर्म का निर्भीकता
के साथ प्रतिपादन किया । उसके अनुयाइयों में हज़ारों हिन्दू और मुसल-
मान शामिल थे । अभी तक कबीरचौरा (काशी) में कबीर के हिन्दू
अनुयायी और मगहर में कबीर के मुसलमान अनुयायी हर साल जमा होकर
कबीर की याद में अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हैं । कबीरपन्थियों की
संख्या इस समय शायद् दस लाख से अधिक नहीं है, किन्तु कबीर का
प्रभाव इससे कहीं अधिक है, और पञ्जाब, गुजरात, बङ्गाल और दक्खिन
तक फैला हुआ है। मुग़ल साम्राज्य के दिनों कबीर के विचार बराबर
फैलते गए, यहाँ तक कि दूरदर्शी सम्राट अकबर ने 'दीने इलाही' के रूप में
उन्हें सर्वस्वीकृत कराने की कोशिश की । वास्तव में कबीर ही अकबर का
मानसिक पिता था । विधि ने या देश के भीतर तथा बाहर की परिस्थिति
ने कबीर और अकबर को पूरी तरह सफल न होने दिया, किन्तु भारत की
अन्तरात्मा भीतर से पुकार रही है—यदि सत्य है तो यही है, और यदि
भविष्य के लिए कोई मार्ग है तो केवल यही है ।
कबीर के विचारों की मौलिकता और महानता के कारण कबीर के

समय से फिर एक बार उत्तर ने धार्मिक विचारों के क्षेत्र में शेष भारत का
नेतृत्व हाथ में लिया और कबीर ही के विचार अनेक सन्तों और महात्माओं
द्वारा एक बार उत्तर से दक्खिन तक समस्त भारत में फैलने लगे।
पञ्जाब के मुसलमान फ़क़ीर
जिस तरह शुरू की सदियों में दक्खिन भारत, उसी तरह पन्द्रवीं सदी
में समस्त पञ्जाब के नगर और गाँव मुसलमान सूफ़ियों और फ़क़ीरों से
भरे हुए थे। पानीपत, सरहिन्द, पाकपट्टन, मुलतान और उच्च में
अनेक प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ों ने अपनी ज़िन्दगियाँ गुज़ारीं, जिनमें बाबा फ़रीद,
अला उलहक़, जलालुद्दीन बुख़ारी, मख़दूम जहानियाँ, शेख़ इस्माइल
बुख़ारी, दाता गञ्जबख़्श इत्यादि के नाम अपनी सच्चाई और ईश्वरभक्ति के
लिए देश भर में प्रसिद्ध थे। जो ज़बरदस्त क्रान्ति इन महात्माओं ने देश-
वासियों के विचारों में उत्पन्न की, उसी का फल या फूल गुरु नानक का वह
सुन्दर प्रयत्न था जो उस महापुरुष ने ठीक कबीर ही के समान और उसी
की सरणी पर हिन्दू और मुसलमान धर्मों को मिलाने के लिए किया।
नानक
' गुरु नानक का जन्म सन् १४६६ ईसवी में वैशाख शुक्ला तृतीया को
हुआ था। उसने फ़ारसी और संस्कृत दोनों की शिक्षा पाई थी। नानक
नाम उन दिनों हिन्दू और मुसलमान दोनों का नाम होता था। कुछ
दिनों उसने नबाब दौलत ख़ाँ लोधी के यहाँ नौकरी की। तीस साल की
आयु में उसने फ़क़ीरी ली। अपने मुसलमान शिष्य मरदाना के साथ
उसने भारत, लङ्का, ईरान, अरब इत्यादि की यात्रा की। लिखा है कि
पानीपत के शेख़ शरफ़, मुलतान के पीरों, बाबा फ़रीद के उत्तराधिकारी

११२ पुस्तक प्रवेश
शेख़ बह्म ( इब्राहीम ) इत्यादि सूफ़ियों के साथ उसने बहुत दिनों तक
धर्म चर्चा किया । कबीर के समान नानक के मरने पर भी उसके हिन्दू
और मुसलमान शिष्यों में झगड़ा हुआ । अन्त में हिन्दुओं ने उसकी स्मृति
में एक समाधि बनाईं और मुसलमानों ने एक अलग क़ब्र, किन्तु दोनों
इमारतें रावी की बाढ़ में आकर बह गईं ।
नानक का धर्म भी एकता और प्रेम का धर्म था, उसकी सम्प्रदाय में
भी हिन्दु और मुसलमान दोनों शामिल हुए । नानक मक्के पहुँचा । वहाँ
पर मोहम्मद साहय के समान उसने एक .ख़ुदा का प्रतिपादन किया और
अपने को उसका 'ख़लीफ़ा' बताया—
ला इलाह इल्लल्लाह, गोविन्द नानक ख़लफ़ल्लाह ।*
यानी अल्लाह केवल एक है,वही गोविन्द है,नानक उसका ख़लीफ़ा है ।
नानक के पदों में भी संस्कृत, फ़ारसी और अरबी तीनों भाषाओं के
पदों की भरमार है। दोनों धर्मों की पृथकता को मिथ्या बताते हुए उसने
लिखा—
बन्दे इक .ख़ुदाय दे, हिन्दू मूसलमान,
दावा राम रसूल कर, लड़दे बेईमान ।
ना हम हिन्दू ना मूसलमान,
दोनों बिच्च बसे शैतान ।
एकै, एकी, एक सुभान,

  • गुरु नानक की जन्मसाखी, न० ३६, पाकनामा ।

बंगाल में कम्पनी का छल-प्रपंच, प्लासी, बक्सर एवं द्वैध शासन की लूट

मानव धर्म ११३
गुरु जी कहिया सुन अब्दुर्रहमान ।
दावा भूलो ताँ इक्क पिछान ।
हिन्दू जपते राम राम, मूसलमान खुदाय,
इको राम रहीम है, मन में देखो लाय ।
यानी—हिन्दू मुसलमान दोनों एक ख़ुदा के बन्दे हैं, किन्तु दोनों
बेईमान, एक राम का और दूसरा रसूल का, झूठा दावा करके लड़ते हैं ।
हम न हिन्दू हैं और न मुसलमान, इन दोनों के दिलों में शैतान
बसा है। गुरु नानक कहते हैं, ऐ अब्दुर्रहमान ! सुनो, ईश्वर एक ही है,
मत मतान्तरों की हठ छोड़ दो, तब उस एक ईश्वर को पहचान सकोगे ।
हिन्दू राम राम जपते हैं, मुसलमान ख़ुदा कहते हैं, किन्तु यदि अपनी
आत्मा के अन्दर ध्यान से देखोगे तो मालूम होगा कि राम और रहीम
एक ही हैं।
एक दूसरे स्थान पर—
तग्ग न हिन्दू पाइया, तग्ग न मूसलमान ।
दोए भूले राह ते, ग़ालिब भया शतान ॥
जित दर लख्ख मोहम्मदाँ, लख ब्रह्मा बिश्न महेश ।
लख लख राम वडीरिएँ, लख राहें लख वैश ।
यानी— मार्ग न हिन्दू को मिला और न मुसलमान को—दोनों मार्ग
से भटक गए, दोनों पर शैतान ग़ालिब हो गया ।

११४ पुस्तक प्रवेश
मालिक के दर पर लाखों मोहम्मद, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और राम खड़े
लाखों तरीक़े से स्तुति करते रहते हैं ।
मोहम्मद साहब की तरह नानक ने भी ईश्वर की इच्छा पर अपने
आपको पूरी तरह छोड़ देने का उपदेश दिया ।
गङ्गास्नान, तीर्थयात्रा, जप, पूजा पाठ इत्यादि को नानक ने फ़जूल
बताया, अठारह पुराण और चारों वेदों को निरर्थक बतलाया, प्रतिमा पूजा
का विरोध किया, कबीर के समान राम के अवतार का खण्डन किया, और
जाति भेद को मिथ्या और हानिकर बताया ।
ऊँच नीच के विचार के विरुद्ध नानक ने कहा है—
ज़ोर न कीजे किसी पर, उत्तम मधम न कोय,
हिन्दू मुसलमान नूं, दोहाँ नसीहत होय ।
नीचाँ अन्दर नीच ज़ात, नीचे हाँ अत नीच,
जित्थे नीच सम्हालिए, उत्थे नज़र तेरी बख़्शीश ।
नीचाँ अन्दर नीच ज़ात, सतगुरु रहे बोलाय ।
यानी—किसी पर ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए, कोई ऊँच नीच नहीं
है । हिन्दू और मुसलमान दोनों को यही नसीहत है ।
ईश्वर की बख़्शीश उन्हीं को मिलेगी जो नीचों से भी नीच को, और
सब से अति नीच को अपनाते हैं ।
सद्गुरु उन्हें बुलाते हैं, जो नीच से भी नीच जाति के समझे जाते हैं ।
मुसलमानों को उपदेश देते हुए नानक ने कहा—

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गुरु नानक

[Header]
मानव धर्म ११५

मेहर मसीत, सिद्क़ मुसल्ला, हक़ हलाल कुरआन,
शर्म सुन्नत, सील रोज़ा, होय मुसलमान ।
करनी काबा, सच पीर कलमा करम नेवाज़,
तसबीह सातिश भावसी नानक रक्खे लाज ।
यानी—दया को अपनी मसजिद बना, सच्चाई का मुसल्ला बना,
इन्साफ़ को अपनी कुरान बना, विनय को ख़तना समझ, सुजनता का रोज़ा
रख, तब तू सच्चा मुसलमान होगा । नेक कामों को अपना काबा बना,
सच्चाई को अपना पीर बना, परोपकार को कलमा समझ, ख़ुदा की मरज़ी
को अपनी तसबीह, तब ऐ नानक ! ख़ुदा तेरी लाज रक्खेगा ।
ठीक इसी तरह का उपदेश नानक ने हिन्दुओं को भी दिया ।
संयम और सदाचार पर नानक ने बहुत अधिक ज़ोर दिया है । अन्य
सूफ़ियों के समान नानक ने आत्मा की उन्नति के लिए गुरु को परमावश्यक
बताया है । सूफ़ियों की शरीयत, मारफ़त, उफ़्रवा और लाहूत के मुक़ाबले
में नानक ने धर्मखण्ड, ज्ञानखण्ड, कर्मखण्ड और सचखण्ड का उपदेश
दिया । इसमें कोई भी सन्देह नहीं कि नानक सूफ़ी साहित्य से पूरी तरह
परिचित था । उस साहित्य का उसने अपने पद्यों में भरपूर उपयोग किया
और उसी के आधार पर हिन्दू और मुसलमान दोनों को एक मालिक और
एक मार्ग का उपदेश दिया ।
मुग़ल साम्राज्य के अन्त के दिनों में, उस समय की शोकजनक परि-
स्थिति में नानक के अनुयाइयों ने बेहद पलटा खाया । वे नानक के
सार्वभौम सिद्धान्तों के अनुरूप न चल सके । किन्तु संसार के अधिकांश

११६ पुस्तक प्रवेश
महापुरुषों के सिद्धान्तों की उनके अनुयाइयों द्वारा उनके बाद इसी तरह
अवहेलना होती रही है ।
अन्य हिन्दू सन्त
कबीर और नानक के अलावा धन्ना जाट, पीपा, सेना नाई और रैदास
चमार इत्यादि महात्माओं के उपदेश भी ठीक इसी ढङ्ग के हैं। इन सबके
पद्यों और उपदेशों में सूफ़ी विचार, सूफ़ी शब्द और हिन्दू और इसलाम
धर्मों की एकता का ज़िक्र है । रैदास ने एक स्थान पर राम के अवतार से
साफ़ इनकार किया, उसके कोई कोई पद्य फ़ारसी भाषा में भी हैं। रैदास
ने ईश्वर को “सुलतानों का सुलतान” और अपने को उसका “शिकस्ता
बन्दा” बताया है, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, जात पाँत इत्यादि का इन सब ने
विरोध किया है ।
दादू
कबीर के अन्य अनेक शिष्य देश के अनेक भागों में प्रसिद्ध हैं, जिनमें
एक मशहूर नाम अकबर के समय में दादू का था। कहते हैं कि सम्वत्
१६४२ में दादू की मुलाक़ात फ़तेहपुर सीकरी में सम्राट अकबर के साथ
हुई जिसमें अकबर ने सवाल किया कि ख़ुदा की ज़ात, अंग, वजूद और रंग
क्या है । दादू ने जवाब दिया—
इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग ।
इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग ॥
यानी—प्रेम (इश्क़) अल्लाह की जाति है, प्रेम ही उसका शरीर है,
प्रेम ही उसका अस्तित्व है, और प्रेम ही उसका रंग है ।

मानव धर्म ११७
दादू के पाँच हज़ार पद्यों में से अनेक उर्दू में और कोई कोई अशुद्ध
फ़ारसी में हैं, मसलन्—
बे मेहर गुमराह ग़ाफ़िल गोश्त ख़ुरदनी,
बे दिल बदकार आलम हयात मुरदनी।
या—
कुल आलम यके दीदम अरवाहे इख्लास,
बद अमल बदकार दुई पाक याराँ पास।
दादू ने भी शरीयत और मारिफ़त इत्यादि पर दरजे बदरजे ज़ोर दिया
है। दादू लिखता है—
हौद हजूरो दिल ही भीतर, गुस्ल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ निमाज गुजारं ॥
काया मसीत करि पञ्चजमाती, मन ही मुला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करै सलामं ॥
सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोज़ा एक दूर करि दूजा, कलमा आपै आपं ॥
अठे पहर अलह के आगे, इकटग रहिवा ध्यानं ।
आपै आप अरस के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥
यानी—ऐ दादू, मालिक की मौजूदगी का तालाब दिल के अन्दर है,
उसी तालाब में मैं स्नान करता हूँ, अल्लाह के सामने वज़ू करके वहीं पर मैं
नमाज़ पढ़ता हूँ ।
दादू का शरीर उसकी मसजिद है, जमात के पञ्च उसके मन के अन्दर

११८ पुस्तक प्रवेश
हैं, वहीं पर उसका मुल्ला इमाम है, अलख ईश्वर को सामने खड़ा करके
वहीं पर वह सिजदा करता है और सलाम करता है ।
दादू अपने समस्त शरीर को तसबीह (माला) बना कर उस पर
‘करीम’ का नाम जपता है, उसका केवल एक रोज़ा है और वह स्वयं
अपना ‘कलमा’ है ।
इस तरह दादू अल्लाह के सामने एकाग्र होकर आठ पहर खड़ा रहता
है और अर्श के ऊपर ‘रहमान’ के रहने की जगह पहुंच जाता है ।
नीचे के पद्यों में दादू ने धार्मिक सङ्कीर्णता का विरोध, हिन्दू मुस्लिम
एकता का प्रतिपादन और एक सच्चे सार्वभौम धर्म का उपदेश दिया है ।
ज़ाहिर है कि सूफ़ियों से उसने भरपूर शिक्षा ग्रहण की थी । वह लिखता है—
सब घट एकै आतमा, क्या हिन्दू मूसलमान ।
अलह राम छूटा भ्रम मोरा ।
हिन्दू तुरक भेद कछु नाहीं, देखौं दरसन तोरा ॥
ब्रह्मा विस्नु महेस को कौन पन्थ गुरुदेव ।
महम्मद किसके दीन में, जबराइल किस राह ।
इनके मुर्शिद पीर को, कहिए एक अल्लाह ॥
ये सब किसके ह्वै रहे, यह मेरे मन माँहि ।
अलख इलाही जगत गुरू, दूजा कोई नाँहि ॥