भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म १२५
और चरनदास की शिष्य थीं। चरनदास ने मूर्तिपूजा का विरोध किया, गुरु
की महिमा और भक्ति का उपदेश दिया। ग़रीबदास कबीर का अनुयायी था,
उसके पद्यों में भी फ़ारसी के शब्द और सूफ़ी परिभाषाएं भरी हुई हैं।
रामसनेही सम्प्रदाय का संस्थापक रामचरन भी मूर्तिपूजा का कट्टर
विरोधी था। ये लोग भी दिन में पाँच मरतबा प्रार्थना करते थे और हर
जाति और हर मज़हब के लोगों को अपने में ले लेते थे। स्वामी नारायन
सिंह की क़ायम की हुई शिवनारायनी सम्प्रदाय में भी सब जाति और सब
मज़हबों के लोग लिए जाते थे। जब कोई शिवनारायनी मरता था तो
उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार उसके शरीर को दफ़न कर दिया जाता था,
या फूँक दिया जाता था और या दरिया में बहा दिया जाता था। मुग़ल
सम्राट मोहम्मदशाह स्वामी नारायनसिंह का शिष्य था। मोहम्मदशाह की
सहायता से यह सम्प्रदाय कुछ दिनों खूब फैली।
पिछले दो तीन सौ साल के अन्दर इनमें से अनेक सम्प्रदायों के रूप
में आकाश पाताल का अन्तर पड़ गया और कहीं कहीं उनके अनुयाइयों का
रहन सहन सम्प्रदाय के क़ायम करने वालों की इच्छा और उनके उपदेशों के
ठीक विपरीत साँचे में ढल गया, फिर भी सम्राट मोहम्मदशाह का दस्तख़ती
परवाना अभी तक शिवनारायनियों के मुख्य मठ बलिया ज़िले में मौजूद है।
अठारवीं सदी में सहजानन्द, दुलनदास, गुलाल, भीका और पल्टूदास
के नाम काफ़ी मशहूर हैं।
जगजीवन के शिष्य दुलनदास ने अपने पद्यों में मुसलमान सूफ़ियों
मनसूर, शम्स तबरेज़, निज़ामुद्दीन, हाफ़िज़, बूअली क़लन्दर और फ़रीद