भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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हिन्दू और मुसलमान दोनों भाई एक शरीर के हाथ और पैर हैं, दोनों
एक शरीर के दो कान हैं, दोनों भाई दो आँखें हैं ।
न हम हिन्दू होंगे और न मुसलमान, षट दरसन के मतभेद से हमें
कोई सम्बन्ध नहीं। हमें केवल रहमान से प्रेम है ।
हिन्दू देवालय में जाते हैं और मुसलमान मसजिद में । हमारा सम्बन्ध
केवल एक अलख से है। उसी से हमें सदा प्रीत है। हमारे धर्म में न हिन्दू
के देवालय की ज़रूरत है और न मुसलमान की मस्जिद की। न वहाँ
किसी कर्मकांड की ज़रूरत है। वहाँ सम्बन्ध केवल अपनी आत्मा से है ।
सतगुरू ने दिखला दिया है कि यह शरीर ही हमारी मसजिद है और
यही हमारा देवालय है। असली पूजा और नमाज़ अपने भीतर ही की जाती
है फिर लोग बाहर क्यों जाते हैं?
हिन्दू और मुसलमान अपने अपने झूठे अभिमान में दो हाथियों की
तरह एक दूसरे से लड़ रहे हैं। जब तक उनमें अपने अपने धर्म का यह झूठा
अभिमान है वे मिलकर सच्ची ईश्वर भक्ति का रस नहीं ले सकते । दादू ने
अपने इस आपे को मिटा दिया है। इसलिए दोनों मत उसके अन्दर
समा गए हैं ।
पण्डितों, मुल्लाओं, जातपाँत, मूर्तिपूजा, तीर्थस्थान, हज इत्यादि के
विषय में दादू के विचार ठीक वैसे ही थे जैसे कबीर के। पुनर्जन्म या आवा-
गमन के सिद्धान्त को दादू ने अलङ्कार की तरह माना है। गुरु को उसने
वेद और कुरान दोनों से बड़ा बताया है ।
मलूकदास
एक और प्रसिद्ध महात्मा मलूकदास अकबर के समय में सन् १५७४