भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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चाहते । किन्तु एक दो बातें स्पष्ट हैं । हर देश के लोगों के कला सम्बन्धी
आदर्शों पर बहुत बड़ा असर उस देश की भौगोलिक स्थिति का पड़ता है ।
भारत अभेद्य जङ्गलों, प्रचण्ड ऋतुओं, बड़ी बड़ी नदियों, पहाड़ों और
घनी वनस्पतियों का देश है । यही वजह है कि भारतीय शिल्पकला में
सदा से विशालता, स्थूलता और विस्तार पर अधिक ज़ोर दिया जाता
रहा है । भारत के बनों में बेशुमार तरह तरह की फूल पत्तियाँ इधर से
उधर तक गुथी हुई दिखाई देती हैं, नीचे की ओर या ऊपर की ओर कहीं
भी नज़र डाली जाय, एक गज़ भर ज़मीन सूनी दिखाई नहीं देती ।
यही वजह है कि प्राचीन भारतीय मन्दिरों और प्रासादों की दीवारों
के ऊपर, और कोनों में कहीं एक फुट ज़मीन भी ख़ाली दिखाई नहीं देती ।
पुराने समय के हिन्दू मन्दिरों में नींव के ऊपर नींव, मञ्जिल के ऊपर
मञ्जिल, कङ्गरे के ऊपर कङ्गरा और कलश के ऊपर कलश आकाश तक
पहुँचते हुए दिखाई देते हैं, और इसके साथ साथ कोई कोना या दीवार का
हिस्सा नहीं रहता जो मूर्तियों या चित्रों से न भरा हो । शिल्पकला
विशारदों की राय है कि संसार के किसी भी दूसरे देश की निर्माणकला
विस्तार बाहुल्य और अतिशोभा में हिन्दू निर्माणकला का मुकाबला नहीं
कर सकती ।
इसके ठीक विपरीत अरब एक विशाल रेगिस्तान है, जिसमें दूर दूर
और कहीं कहीं थोड़े से हरे भरे नख़लिस्तान दिखाई देते हैं । इसके ऊपर
अरब की तेज़ गरमी, भोजन और वस्त्र के लिए परिमित और इनी गिनी
सामग्री और रेत के पहाड़ । कुदरती तौर पर मुसलमानों की शुरू की
निर्माणकला में बड़े बड़े भवन, सादी साफ़ दीवारें और ऊँचे मीनार और