भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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गुम्बद् अधिक देखने में आते हैं। इसलाम के एक ईश्वरवाद और मूर्तिभञ्ज-
कता ने भी पुराने मूर्तिपूजक धर्मों के मुक़ाबले में मुसलिम कला के इस आदर्श
को अपना एक ख़ास रूप दिया और उसे और अधिक पक्का कर दिया ।
जिस मनुष्य की आँखें प्राचीन हिन्दू मन्दिरों के विस्तार प्रपञ्च से उकता
गई हों उसे एक सीधी सादी मुसलिम मसजिद की साफ़ दीवारों में विश्राम
मिलना क़ुदरती है । इसी तरह जो मनुष्य पुरानी मुसलिम मसजिदों या
प्रासादों की अमिश्रता से ऊब गया हो, उसके लिए हिन्दू निर्माणकला का
बाहुल्य एक दरजे तक अवश्य आकर्षक होगा ।
दो कलाओं का आलिंगन
यह भी स्पष्ट ज़ाहिर है कि इन दोनों आदर्शों के मेल जोल से एक इस
तरह की निर्माणकला को जन्म दिया जा सकता था, जो दोनों की अपेक्षा
सुन्दर और अधिक आकर्षक हो । धार्मिक और जातीय पक्षपात इस तरह
के सम्मिश्रण के रास्ते में बाधक होते हैं, किन्तु फिर भी दो अलग अलग
आदर्शों के मिलने से जाने या अनजाने इस तरह का सम्मिश्रण हुए बिना
नहीं रह सकता । इसके अलावा हम ऊपर दिखला चुके हैं कि मुसलमानों
के भारत आने के समय से ही इस धार्मिक या जातीय पक्षपात के मिटाने
के लिए भी अनेक कोशिशें जारी थीं। जिस तरह धार्मिक विचारों में उसी
तरह निर्माणकला और चित्रकारी के मैदान में भी भारत ने नए आदर्शों को
जन्म देना शुरू किया, जो हिन्दू और मुसलिम दोनों अलग अलग आदर्शों से
उच्चतर थे और जिनके नतीजे भी उन दोनों के नतीजों से अधिक सुन्दर
थे । इन तीनों तरह के आदर्शों को साक्षात करने के लिए हमें एक ओर
दक्खिन के प्राचीन मन्दिरों या जगन्नाथपुरी के मन्दिर, दूसरी ओर अजमेर