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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मानव धर्म १२१
ईसवी में कड़ा, इलाहाबाद में पैदा हुआ और औरङ्गज़ेब के समय में सन्
१६८२ ईसवी में १०८ वर्ष की उम्र में मरा। उसके मठ नेपाल और काबुल
तक में मौजूद थे। उसके विचार मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा अन्य कर्मकाण्ड इत्यादि
के विषय में ठीक कबीर और दादू के से थे। परसेवा, सब धर्मों की एकता,
हिन्दू मुसलमानों के परस्पर प्रेम इत्यादि पर उसके बिचार हर तरह अपने
समय के अन्य महात्माओं के समान थे। वह लिखता है—
माला कहाँ औ कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकै।
काफ़िर कौन मलेच्छ कहावत,
सन्ध्या निवाज समै करि देखै।
है जमराज कहाँ जबरील है,
काजी है आप हिसाब के लेखै।
पाप औ पुण्य जमा कर बूझत,
देत हिसाब कहाँ धरि फेकै।
दास मलूक कहा भरमौ तुम,
राम रहीम कहावत एकै।
यानी—कहाँ माला और कहाँ तसबीह ! जागो और उनके भरोसे न
रहो, कौन काफ़िर और कौन म्लेच्छ ! वही सन्ध्या और वही नमाज़ । यम
कहाँ है और जिबराईल कहाँ पर है ! ख़ुदा ही आप क़ाज़ी है, और कोई
हिसाब नहीं रखता ।'वही सब के पाप पुण्य को समझता है और हिसाब
रखता है। मलूकदास ! तू कहाँ भूला है, राम और रहीम एक ही के नाम हैं।