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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 727 में से

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पृष्ठ 152

१२२ पुस्तक प्रवेश
सत्तनामियों के बारह हुकुम
सत्तनामी सम्प्रदाय का संस्थापक बीरभान दादू का समकालीन था ।
सत्तनामी अपने को साध भी कहते हैं । बीरभान ने केवल एक ईश्वर का
उपदेश दिया, जिसका नाम उसने सत्तनाम रक्खा । सत्तनामी जात पाँत
और छुआछूत के खिलाफ हैं। वे एक दूसरे के साथ खाते पीते हैं, और आपस
ही में विवाह करते हैं । सत्तनामियों में तलाक़ की इजाज़त है, वे मूर्तिपूजा
के विरुद्ध हैं, ध्यान और सदाचार और मनुष्य मात्र की समता पर ज़ोर देते
हैं, मांस मदिरा का निषेध करते हैं । औरङ्गज़ेब के समय में ईश्वरदास
नागर ने सम्राट से इस बात की शिकायत की थी कि सत्तनामी हिन्दू और
मुसलमानों में किसी तरह का भेद नहीं करते । सत्तनामियों के 'आदि
उपदेश' में 'बारह हुकुम' दिए हुए हैं, जिनका सार इस तरह है—
(१) केवल एक ही ईश्वर को मानो, मिट्टी, पत्थर, लकड़ी या किसी
और बनी हुई चीज़ की पूजा न करो ।
(२) दीनता से रहो ।
(३) कभी झूठ मत बोलो, कभी किसी की निन्दा न करो, कभी चोरी
न करो, दूसरे की चीज़ को कभी लालच की निगाह से न देखो ।
(४) कभी बुरी बात न सुनो, सिवाय मालिक के भजनों के और कुछ
न गाओ ।
(५) ईश्वर पर विश्वास करो ।
(६) जात पाँत को मत मानो, किसी से बहस मत करो ।
(७) साफ़ कपड़े पहनो, किसी तरह का तिलक न लगाओ, और न
माला पहनो ।