भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म १०५
और जलालुद्दीन रूमी और शेख़सादी शीराज़ी की कविताओं से कबीर
निस्सन्देह भली भाँति परिचित था । कबीर के पद्यों में इन महापुरुषों और
दूसरे सूफ़ीयों के उपदेशों की बार बार झलक आती है । कबीर का नीचे
लिखा पद्य —
जब तू आयो जगत में, जगत हँसे तू रोय ।
अब तो ऐसी कर चलो, तू हाँसे जग रोय ॥
शेख़सादी के इस मशहूर पद्य का साफ़ भाषान्तर है—
याद दारी के वक़्ते ज़ादने तो,
हमा ख़न्दाँ बुवन्दो तू गिरियाँ ।
आँचुनाज़ी के बाद मुर्दने तो,
हमा गिरियाँ शवन्दो तू ख़न्दाँ ॥
इसी तरह की और भी अनेक मिसालें कबीर के पद्यों से दी जा
सकती हैं । कबीर के पद्यों में फ़ारसी और अरबी के शब्द और सूफ़ीयों की
उपमाएँ और उनके अलङ्कार इधर से उधर तक भरे पड़े हैं । अहमदशाह
ने कबीर के बीजक में हबीब, महबूब, आशिक़, माशूक़, मुसाफ़िर, मुक़ाम,
हाल, जमाल, जलाल, साक़ी, शराब, क़हर, मेहर, ग़ैबत, हुज़ूर, हैरत,
नासूत, मलकूत, जबरूत, लाहूत, हाहूत, हक़ इत्यादि, इस तरह के दो सौ
से ऊपर अरबी और फ़ारसी के शब्द चुने हैं, जिन्हें कबीर ने ठीक उन्हीं
माइनों में उपयोग किया है जिनमें सूफ़ियों ने, और जिनसे साफ़ मालूम
होता है कि कबीर अपने विचारों और उपदेशों के लिए मुसलमान
सूफ़ीयों का किस दरजे आभारी था ।
कबीर ने संस्कृत की निस्बत भाषा में अपने पद्यों को लिखना पसन्द