भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म १०३
कबीर हिन्दुओं के वर्णाश्रम धर्म या जातिभेद का कट्टर विरोधी था ।
वेदों, शास्त्रों या कुरान में से किसी को भी वह निर्भ्रान्त या हर बात में
प्रमाण न मानता था । सूफ़ियों के समान प्रेम, इश्क़ या भक्ति उसका
मुख्य धर्म था । अपनी रमैनी, शब्दों और साखियों के ज़रिए उसने हिन्दू
और मुसलमान दोनों को एक समान धर्म का उपदेश दिया, निर्भीकता
के साथ दोनों मतों की रूढ़ियों का एक समान खण्डन किया, और प्राणि-
मात्र के साथ प्रेम और एक ईश्वर की भक्ति का सबको एक समान उपदेश
दिया ।
कबीर ने हिन्दू मत और इस्लाम दोनों में से सामान्य सच्चाइयों को
एक समान ग्रहण किया । संस्कृत और फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी, चारों
भाषाओं के शब्दों का अपने पद्यों में उसने एक समान उपयोग किया ।
हिन्दू और मुसलमान धर्मों की झूठी पृथकता पर दुख प्रकट करते
हुए, दोनों को एक सार्वजनिक धर्म दर्शाते हुए और दोनों को प्राणिमात्र
पर दया का उपदेश देते हुए, कबीर कहता है—
भाई रे दुइ जगदीश कहाँ ते आया, कहु कौने बौराया ।
अल्लाह राम करीमा केशव, हरि हजरत नाम धराया ॥
गहना एक कनक ते गहना, यामैं भाव न दूजा ।
कहन सुनन को दुइ कर थापे, एक निमाज एक पूजा ॥
वही महादेब बही महम्मद, ब्रह्मा आदम कहिए ।
को हिन्दू को तुरक कहावै, एक जिमी पर रहिए ॥
वेद कितेब पढ़े वै कुतुबा, वै मुलना वै पांडे ।
बेगर बेगर नाम धराए, एक मिट्टी के भांडे ॥