भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म १०१
उत्तर में लाकर उनके प्रचार करने का कार्य रामानन्द ने किया। रामानन्द
ने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति का उपदेश दिया और हर जाति
के लोगों को अपनी सम्प्रदाय में शामिल किया। मैकॉलिफ़ लिखता है
कि—"इसमें कोई सन्देह नहीं कि बनारस में विद्वान मुसलमानों
के साथ रामानन्द की भेंट हुई।" रामानन्द के शिष्यों और अनुयाइयों
में अनेक मुसलमान भी थे। दो नाम उसके शिष्यों में सबसे अधिक
प्रसिद्ध हैं, एक तुलसीदास और दूसरा कबीर। गोस्वामी तुलसीदास की
रामायन सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। तुलसीदास का मोहावरा अवधी है।
फिर भी संस्कृत, फ़ारसी, और अरबी तीनों के शब्द भण्डारों से अपनी
पुस्तक को अलंकृत कर एक ऐसी सरल और सर्वप्रिय हिन्दोस्तानी भाषा को
रचने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त है जिसमें ऊँचे से ऊँचा साहित्य
लिखा जा सका। हिन्दोस्तानी ज़बान के बनाने वालों में गोस्वामी तुलसी-
दास का नाम सदा के लिए स्मरणीय रहेगा।
कबीर
निस्सन्देह कबीर की शुमार भारत के महान से महान तत्वदर्शियों,
धर्माचार्यों और समाज सुधारकों में की जानी चाहिए। कबीर एक अत्यन्त
स्वतन्त्र विचार का महापुरुष था। वह मत मतान्तरों के भेद और हर तरह
के कर्मकाण्ड और रूढ़ियों का कट्टर विरोधी था। हिन्दुओं और मुसलमानों
की एकता का इस देश के अन्दर वह सब से पहला प्रचारक और सब से
महान समर्थक था। उसका जन्म सन् १३६८ ईसवी में हुआ और मृत्यु
सन् १४१८ ईसवी में। कहा जाता है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी के
गर्भ से उत्पन्न हुआ था। बनारस के एक मुसलमान जुलाहे नीरू और