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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

१०६ पुस्तक प्रवेश
किया। उसका उद्देश आम जनता तक अपने विचारों को फैलाना था।
कबीर ने अपनी साखी में एक जगह पर लिखा है—
संसकिरत है कूप जल, भाषा बहता नीर।
अर्थ—संस्कृत कुएँ का पानी है, किन्तु भाषा (हिन्दी) बहती हुई नदी
के समान है।
कबीर के पद्यों में कहीं संस्कृत भरी हिन्दी और कहीं फ़ारसी भरी उर्दू,
दोनों मिलती हैं। कबीर ने ईश्वर के लिए जगह जगह—राम, हरी, गोविन्द,
ब्रह्म, समरथ, साईं, सत्पुरुष, रँगरेजवा, बेचूँ (अनिर्वचनीय), अल्लाह और
ख़ुदा—सब शब्दों का उपयोग किया है; किन्तु ईश्वर के लिए उसका सब
से प्यारा नाम “साहेब” है। कबीर को इस बात का दावा है कि उसने
“तुममें और मुझमें” प्राणिमात्र में, और सब पदार्थों में व्यापक “ज़ाते
पाक” का साक्षात दर्शन किया था। सूफ़ीयों के समान ही कबीर ने स्थान
स्थान पर ख़ुदा को ‘नूर’ बतलाया है और हर चीज़ को ख़ुदा माना है।
रमैनी में बद्रुद्दीन शहीद, इब्न सीना और जिली के अनेक पद्यों का बिल-
कुल तरजुमा सा दिखाई देता है। सूफ़ीयों ही के समान कबीर ने गुरु को
गोविन्द बतलाया है और अपनी साखी में लिखा है—
हरि के रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर।
अर्थ—यदि हरि नाराज़ हो जाय तब भी कुछ बचत हो सकती है,
किन्तु यदि गुरु नाराज़ हो जाय तब फिर कोई बचत नहीं। कबीर का यह
पद्य मौलाना रूम के एक पद्य का तरजुमा मालूम होता है।
कबीर ने गुरु को ‘सिकलीगर’ लिखा है। कबीर प्रेम का परम विश्वासी