भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म ११७
दादू के पाँच हज़ार पद्यों में से अनेक उर्दू में और कोई कोई अशुद्ध
फ़ारसी में हैं, मसलन्—
बे मेहर गुमराह ग़ाफ़िल गोश्त ख़ुरदनी,
बे दिल बदकार आलम हयात मुरदनी।
या—
कुल आलम यके दीदम अरवाहे इख्लास,
बद अमल बदकार दुई पाक याराँ पास।
दादू ने भी शरीयत और मारिफ़त इत्यादि पर दरजे बदरजे ज़ोर दिया
है। दादू लिखता है—
हौद हजूरो दिल ही भीतर, गुस्ल हमारा सारं ।
उजू साजि अलह के आगे, तहाँ निमाज गुजारं ॥
काया मसीत करि पञ्चजमाती, मन ही मुला इमामं ।
आप अलेख इलाही आगे, तहँ सिजदा करै सलामं ॥
सब तन तसबी कहै करीमं, ऐसा करले जापं ।
रोज़ा एक दूर करि दूजा, कलमा आपै आपं ॥
अठे पहर अलह के आगे, इकटग रहिवा ध्यानं ।
आपै आप अरस के ऊपर, जहाँ रहै रहमानं ॥
यानी—ऐ दादू, मालिक की मौजूदगी का तालाब दिल के अन्दर है,
उसी तालाब में मैं स्नान करता हूँ, अल्लाह के सामने वज़ू करके वहीं पर मैं
नमाज़ पढ़ता हूँ ।
दादू का शरीर उसकी मसजिद है, जमात के पञ्च उसके मन के अन्दर