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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

११६ पुस्तक प्रवेश
महापुरुषों के सिद्धान्तों की उनके अनुयाइयों द्वारा उनके बाद इसी तरह
अवहेलना होती रही है ।
अन्य हिन्दू सन्त
कबीर और नानक के अलावा धन्ना जाट, पीपा, सेना नाई और रैदास
चमार इत्यादि महात्माओं के उपदेश भी ठीक इसी ढङ्ग के हैं। इन सबके
पद्यों और उपदेशों में सूफ़ी विचार, सूफ़ी शब्द और हिन्दू और इसलाम
धर्मों की एकता का ज़िक्र है । रैदास ने एक स्थान पर राम के अवतार से
साफ़ इनकार किया, उसके कोई कोई पद्य फ़ारसी भाषा में भी हैं। रैदास
ने ईश्वर को “सुलतानों का सुलतान” और अपने को उसका “शिकस्ता
बन्दा” बताया है, मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, जात पाँत इत्यादि का इन सब ने
विरोध किया है ।
दादू
कबीर के अन्य अनेक शिष्य देश के अनेक भागों में प्रसिद्ध हैं, जिनमें
एक मशहूर नाम अकबर के समय में दादू का था। कहते हैं कि सम्वत्
१६४२ में दादू की मुलाक़ात फ़तेहपुर सीकरी में सम्राट अकबर के साथ
हुई जिसमें अकबर ने सवाल किया कि ख़ुदा की ज़ात, अंग, वजूद और रंग
क्या है । दादू ने जवाब दिया—
इसक अलह की जाति है, इसक अलह का अंग ।
इसक अलह औजूद है, इसक अलह का रंग ॥
यानी—प्रेम (इश्क़) अल्लाह की जाति है, प्रेम ही उसका शरीर है,
प्रेम ही उसका अस्तित्व है, और प्रेम ही उसका रंग है ।