भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 137, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म १०६
सारांश यह कि कबीर ने क़ुरान और मोहम्मद साहब में अन्धविश्वास,
हज़, रोज़े और नमाज़ इत्यादि का मज़ाक़ उड़ाते हुए मुसलमानों को
समस्त रूढ़ियाँ छोड़ देने का उपदेश दिया है, हिन्दुओं को उसने उतने ही
ज़ोर के साथ जात पाँत, मूर्तिपूजा, अवतार, और छुआछूत और वेद और
शास्त्रों में अन्धविश्वास छोड़ देने की सलाह दी है, दोनों को उसने प्राणि-
मात्र पर दया रखने, सबको एक ख़ुदा की औलाद और भाई भाई समझने,
अहङ्कार त्यागने और सब की सेवा करने का उपदेश दिया । कबीर के नीचे
लिखे पद्य इस विषय में याद रखने योग्य हैं—
पूरब दिशा हरो को बासा, पच्छिम अलह मुकामा ।
दिल में खोजि दिलहि माँ खोजो, इहै करीमा रामा ॥
जेते औरत मर्द उपानी, सो सब रूप तुम्हारा ।
कबीर पोंगरा अलह राम का, सो गुरु पीर हमारा ॥
हिन्दू तुरुक की एक राह है, सतगुरु सोइ लखाई ।
'कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, राम न कहूँ खुदाई ॥
हिन्दू कहें राम मोंहि प्यारा, तुरुक कहें रहिमाना ।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना ॥
यानी— लोग कहते हैं हरि पूरब में रहता है और अल्लाह पच्छिम में,
लेकिन कबीर कहता है अपने दिल के अन्दर खोजो, वहीं करीम हैं और
वहीं राम हैं ।