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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 130

१०२ पुस्तक प्रवेश
उसकी स्त्री ने कबीर का पालन पोषण किया। बनारस में रह कर कबीर
हिन्दू और मुसलमान दोनों मतों के सिद्धान्तों से पूरी तरह परिचित हो
गया। मोहसिन फ़ानी लिखता है कि कबीर ने लड़कपन ही में अनेक हिन्दू
और मुसलमान विद्वानों और सन्तों से भेंट की। बहुत दिनों वह जौनपुर,
झूँसी इत्यादि में शेख़ तक़ी और अन्य मुसलमान सूफ़ियों और पीरों के
के साथ रहा, जिनका ज़िक्र कबीर साहब ने अपनी 'रमैनी में किया है।
इसके बाद कबीर ने बनारस में अपना सत्सङ्ग शुरू कर दिया। कबीर के
विचार इतने स्वतन्त्र थे कि शुरू में मुसलमान मौलवी और हिन्दू पण्डित
दोनों उससे बेहद नाराज़ हुए। इन लोगों, ने हर तरह से कबीर को कष्ट
पहुँचाने और दिक़ करने की कोशिश की। अन्त में हिन्दू और मुसलमान
दोनों जातियों में से कबीर के हज़ारों अनुयायी हो गए। जीवन भर कबीर
ने अपने पिता का काम यानी कपड़े बुनने का धन्धा नहीं छोड़ा। हिन्दुओं
में यह एक बात सदा से प्रसिद्ध रही है कि काशी में मरने से मनुष्य को
मुक्ति प्राप्त होती है। इसके विपरीत कहा जाता है कि गोरखपुर से १५ मील
पच्छिम में मगहर में मरने वाले को गधे की योनि में जन्म लेना पड़ता है।
कबीर ने अन्त समय निकट आने पर जान बूझ कर इस प्राचीन अन्ध-
विश्वास की अवहेलना प्रकट करने के लिए काशी से मगहर के लिए प्रस्थान
किया और मगहर ही में अपने हज़ारों हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों
की मौजूदगी में चोला छोड़ा। कहा जाता है कि कबीर के मरने के बाद
उसके कुछ हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों में झगड़ा हुआ, हिन्दू उसे
हिन्दू कहते थे और उसके शरीर को जलाना चाहते थे, मुसलमान उसे
मुसलमान मान कर दफ़न करना चाहते थे।