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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

१०४ पुस्तक प्रवेश
कहहिं कबीर वै दूनों भूले, रामहिं किनहु न पाया।
वै खस्सी वै गाय कटावें, बादिहि जन्म गमाया॥
अर्थ—हे भाई दो ईश्वर कहाँ से आगए ! तुम्हें किसने बहका दिया ?
अल्लाह और राम, करीम और केशव, हरि और हज़रत, एक ही स्वर्ण के
बने आभूषणों के अलग अलग नाम हैं। इनमें दुई का भाव नहीं है।
कहने सुनने को तुमने दो दो नाम रख लिए हैं—एक नमाज़ और एक
पूजा। वही महादेव है और वही मोहम्मद, वही ब्रह्मा है और वही आदम ।
हिन्दू और मुसलमान में कोई भेद नहीं, दोनों एक ज़मीन पर रहते हैं।
एक वेद पढ़ते हैं और दूसरे कुरान पढ़ते हैं। एक मौलाना कहलाते हैं और
दूसरे पण्डित। ये सब अलग अलग नाम धर लिए हैं वास्तव में सब एक ही
मिट्टी के बरतन हैं। कबीर कहता है, ये दोनों भूले हुए हैं। इनमें से किसी
ने राम को नहीं पाया। एक बकरा काटते हैं और दूसरे गाय काटते हैं—
दोनों वृथा जन्म खोते हैं।
कबीर कहता है—
हिन्दू कहूँ तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।
पाँच तत्त का पूतला, गैबी खेले माहिं ॥
अर्थ—मैं न हिन्दू हूँ और न मुसलमान, मैं पञ्च तत्त्वों का बना हुआ
पुतला हूँ जिसके अन्दर ग़ैबी (आत्मा) क्रीड़ा करता है।
कबीर के उपदेशों पर मुसलमान सूफ़ी फ़क़ीरों के उपदेशों का प्रभाव
बिलकुल साफ़ दिखाई देता है। हिन्दुओं में कबीर से पहले का कोई ऐसा
महात्मा न था जिसका वह अनुसरण करता; इसलिए उसके लिए मुसलमानों
का अनुसरण स्वाभाविक और अनिवार्य था। फ़रीदुद्दीन अत्तार के पन्दनामे