भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमानव धर्म १०७
था । वह लिखता है कि—एक प्रेम समस्त संसार में व्यापक है । ईश्वर की
खोज के विषय में वह लिखता है—
मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास में ।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में ॥
खोजी होय तो तुरते मिलिहौं, पल भर की तालास में ।
कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में ॥
अर्थ—ऐ बन्दे ! तू मुझे कहाँ ढूँढ़ता है ? मैं तेरे पास हूं । मैं न मन्दिर
में हूँ न मसजिद में, न काबे में हूँ न कैलाश में । यदि तू सच्चा खोजी है
तो मैं तुरन्त एक पल भर की खोज में तुझे मिल जाऊँगा । कबीर कहता
है—हे साधो ! सुनो, साहेब सब के प्राणों का प्राण है ।
सूफ़ियों की तरह कबीर ने लोगों को इश्क़ की शराब पीने की दावत
दी है । अभ्यास द्वारा ब्रह्मत्व की ओर रूह की यात्रा को कबीर ने ठीक
उन्हीं शब्दों में बयान किया है जिन शब्दों में कबीर से पाँच सौ साल पहले
मनसूर ने बयान किया था । अपनी पुस्तक 'दस मुक़ामी रेख्ता' में कबीर ने
हज़रत मोहम्मद के मेराज के क़िस्से को अपने ढङ्ग से बयान किया है ।
वास्तव में कबीर ने भारत का ध्यान एक ऐसे सार्वजनिक धर्म की ओर
दिलाया जो न हिन्दू था, न मुसलमान । इसीलिए उसने हिन्दू और
मुसलमान दोनों के अलग अलग कर्मकाण्डों, दोनों के मतभेदों, दोनों के
धार्मिक ग्रन्थों की निष्भ्रान्तता इत्यादि की अत्यन्त कड़े से कड़े शब्दों में
निर्भीकता के साथ आलोचना की है । ब्राह्मणों के प्रभुत्व, जात पाँत और
छुआछूत का वह कट्टर विरोधी था ही । राम शब्द को उसने ईश्वर के अर्थों