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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 138

११० पुस्तक प्रवेश
जितने पुरुष और स्त्री रचे गए हैं सब तुम्हारा ही रूप हैं, कबीर अल्लाह
का और राम का बेटा है, वही कबीर का गुरु और पीर है ।
हिन्दू और तुरुक की एक ही राह है, जो सत्गुरु ने बताई है, कबीर
कहता है, सुनो भाई सन्तो ! राम और ख़ुदा में कोई भेद नहीं है ।
हिन्दू राम कहते हैं, मुसलमान रहीम कहते हैं । आपस में दोनों लड़
लड़ कर मरते हैं, मर्म को कोई नहीं जानता ।
कबीर पहला भारतवासी था, जिसने हिन्दू और मुसलमान दोनों के
लिए बल्कि समस्त मानव जाति के लिए एक सामान्य धर्म का निर्भीकता
के साथ प्रतिपादन किया । उसके अनुयाइयों में हज़ारों हिन्दू और मुसल-
मान शामिल थे । अभी तक कबीरचौरा (काशी) में कबीर के हिन्दू
अनुयायी और मगहर में कबीर के मुसलमान अनुयायी हर साल जमा होकर
कबीर की याद में अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हैं । कबीरपन्थियों की
संख्या इस समय शायद् दस लाख से अधिक नहीं है, किन्तु कबीर का
प्रभाव इससे कहीं अधिक है, और पञ्जाब, गुजरात, बङ्गाल और दक्खिन
तक फैला हुआ है। मुग़ल साम्राज्य के दिनों कबीर के विचार बराबर
फैलते गए, यहाँ तक कि दूरदर्शी सम्राट अकबर ने 'दीने इलाही' के रूप में
उन्हें सर्वस्वीकृत कराने की कोशिश की । वास्तव में कबीर ही अकबर का
मानसिक पिता था । विधि ने या देश के भीतर तथा बाहर की परिस्थिति
ने कबीर और अकबर को पूरी तरह सफल न होने दिया, किन्तु भारत की
अन्तरात्मा भीतर से पुकार रही है—यदि सत्य है तो यही है, और यदि
भविष्य के लिए कोई मार्ग है तो केवल यही है ।
कबीर के विचारों की मौलिकता और महानता के कारण कबीर के