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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

( २ )
भेजदेने को कहा तो उन्हों ने हमारे मनोरथ की प्रशंसा कर
लिखित वाणीकी प्रति भेजदेना स्वीकार कर वाणीकी प्रति
को शुद्धकरके प्रेसमें मुद्रणार्थ भेज दिया अब हम अपने
मनोरथ सिद्धिकर्त्ता महाशय को परम धन्यवाद देतेहु ये ग्रन्थ
भक्तिसागर के परिशिष्टभाग के नाम से छापकर प्रकाशित
करते हैं—
सुपरिंटेंडेंट
राजाराम कुमार प्रेस लखनऊ

ॐ
श्रीराधाकृष्णाय नमः ॥
❃ श्री सरसमाधुरीजी रचित ❃
❃ सूचना दोहावली ❃
श्रीमत शुक मुनिराज वर, व्यास पुत्र भगवान ।
श्याम चरण के दासजी, जिनके शिष्य महान १
जिनकीवाणीविविधिविधि, अद्भुत अनुपम ग्रन्थ ।
नाम भक्तिसागर सरस, प्रेम परा को पन्थ २
ब्रजचरित्र तामें प्रथम, अमरलोक शुचिनाम ।
रासादिक लीला ललित, अरु महिमा निजधाम ३
कर्मकाण्ड शुभ अशुभ फल, कथन किये महाराज ।
नाम धरयो ताको प्रभू, अनुपम धर्म जहाज ४
योग युक्ति जामें भरी, सब विधि सांगोपांग ।
याहीतें याको धरयो, नाम योग अष्टांग ५
सागर योग सन्देह की, पुस्तक वरनी गूढ़ ।
गुरुमुख ज्ञानी जन बिना, अर्थ न समझें मूढ़ ६
योग स्वरोदय पुनि रच्यो, स्वर को भेद उचार ।
ताहि पढ़िकर प्रेम जो, पावे तत्व विचार ७
वेद अथर्वण की कही, पंच उपनिषद् सार ।
भाषा में वर्णन करी, योग ज्ञान निरधार ८
भक्ति पदारथ पुनि कथ्यो, श्रुति पुराण को सार ।
अगुन सगुन हरि रूपको, कियो तत्व निरधार ९
दत्तात्रेय मुनि ने किये, गुरु चौवीस उदार ।
ताकी कथा कथी भली, नाम सु गुटकासार १०

( ४ )
ब्रह्म जीव की एकता, कही खोल निरधार ।
ब्रह्मज्ञान सागर धरयो, ताको नाम बिचार ११
रची सरस शब्दावली, राग सहित रुचिकार ।
ज्ञान योग वैराग पुनि, प्रेम भक्ति भंडार १२
पुनि परिशिष्ट सुभाग में, दशम स्कन्धनुसार ।
श्रीकृष्ण लीला ललित, अनुपम युगल विहार १३
वानी श्रीमहाराज की, सद्ग्रन्थन को सार ।
सरस माधुरी जो पढ़ै, मिलैं पदारथ चार १४
इति ॥

·· श्रीमन्निकुञ्जविहारिणे नमः ॥
श्रीमद्भक्तिसागरग्रन्थ की महिमा तथा
माहात्म्य के वर्णन में ॥
श्रीसरसमाधुरीजी रचित
:- कवित्त :-
ग्रन्थ भक्तिसागर उजागर सब विश्वबीच बांचत हैं जाको
कविकोविद अरु ज्ञानी हैं। साधु सन्त बुद्धिमन्त विद्वज्जन
विविधि भाँति मनन करत हिये धरत योगी यती ध्यानी हैं ॥
त्यागी वैरागी जन-पढ़त ताय चितलगाय चतुर्वर्गदायक यह
निश्चय कर जानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सव सन्तन
को याके अर्थ समझे होत जीवनमुक्त प्रानी हैं ॥ १ ॥
अष्टादश षटरु चार चौदह अरु नव की सार ऐसी यह
अनूप श्याम चरणदास बानी हैं। भारत अरु गीता पुनि
भागवत भरी है यामें रामायण सार रसिकजननने पिछानी
हैं॥ संस्कृत भाषादिक पुस्तक बहु विश्वविदित उक्ति जुक्ति
सारी याके बीच में समानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सव
सन्तन को एक एक बात याकी अनुभव कर प्रमानी हैं ॥ २ ॥
नाम रूप लीला धाम सेवा श्री श्यामा श्याम सवही की
सुलभरीति बानी में बखानी हैं। सन्त अरु महन्त गुणवन्त
बुद्धिवन्त सकल सर्वोपरि रहस्य रीत मानी रससानी हैं ॥
याही को गावें अरु सुनावें सव शिष्यन को या समान सुलभ
सरल और न जगजानी हैं। कहे सरसमाधुरी यह सवकी
मन हरनहार महिमा अपार अरु भक्ति मुक्ति दानी हैं ॥ ३ ॥
जलाली जमाली जिक्र सुल्तानुल अजकार फ़ना बक्रा
सिफ़्त सब ग्रन्थ में बखानी हैं। जात अरु सिफ़ात की प्रकाश

( ६ )
करी सर्वबात नूर अरु जहूर सब बरनें रहमानी हैं ॥ फ़ना
फिल्लाबाद में बक़ा की बुनियाद कही आबिद मक़बूल खुदा
उनहीने जानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब फुकरन को
इश्क़ है हक़ीक़ी यामें शगल सुब्हानी हैं ॥ ४ ॥
सम्प्रदाय सर्वधर्म आश्रम अरु वर्णकर्म वैष्णवता मुख्य
मर्मया में जनाये हैं। कर्मयोग ज्ञानयोग सांख्ययोग राजयोग
अष्टांगयोग भक्तियोग दरसाये हैं॥ मायाजीव ईश्वर ये तीन
तत्त्व कहे अनादि ईश के अधीन माया जीव कहि गाये हैं।
कहे सरसमाधुरी कृपाल श्याम चरणदास शुक मुनि प्रसाद
गुप्तभेद प्रगटाये हैं ॥ ५ ॥
खण्डन अरु मण्डनकी उक्ति युक्ति कथी नाहिं श्रुति पुराण
सारधर्म सबही कहि गायो है। जितने मत पंथ प्रगट देखियत
जगत माहिं ग्रन्थ भक्तिसागर यह सबके मन भायो है ॥
बाँचैं कर मन विचार रहस्यरीति हृदयधार परमानँद सुख प्रतक्ष
उनहीने पायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब भक्तन को
भारत भूमि में प्रताप अतिशय कर छायो है ॥ ६ ॥
ज्ञानिनने पर्मज्ञान ध्यानिनने पर्मध्यान योगिनने पर्मयोग
याहि पढ़े पायो है। परम बैराग प्राप्त भयो है बिरागिन को
अनुरागी भक्तन के प्रेम हाथ आयो है ॥ आरत जिज्ञासू अरु
मुमुक्षु अधिकारिन के इच्छा अनुसार समाधान उर छायो
है। कहे सरसमाधुरी यह अतिही उपयोगी ग्रन्थ सबही मत
पंथ याकी बानी सुन लुभायो है ॥ ७ ॥
निर्गुन अरु सगुन पुनि सर्वोपरि रहनि यामें निराकार
अरु साकार सुलभ कहि सुनायो है। ओत प्रोत अगुन
सगुन सूरज अरु धूप सदृश भिन्नभेद भावरूप एक कर
दिखायो है ॥ जैसी जाके चाह ताहि तैसीही प्राप्तिहोत यामें

नहिं संशय यह भेद समझायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय
सब भक्तनको रस समुद्र सगुन ब्रह्म पुरुषोत्तम बतायो है ॥ ८ ॥
छहों मुक्तिमारग की रहस्य कही याके बीच प्रेम को परतत्त्व
सर्व उत्तम दृढ़ायो है। प्रेम के समान नहीं और कुछ वतायो
आन ज्ञान ध्यान योगादिक तुच्छ दरसायो है ॥ आदि मध्य
अन्त भक्तिसागर में भलीभाँति सबको सरताज प्रभु प्रेम को
जनायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब रसिकनको जिनने
कुछ पायो एक प्रेमही से पायो है ॥ ९ ॥
बिना पढ़े वेदनके वेदतत्त्व जानपरे बिना शास्त्र श्रवण किये
समझे बात सारी है। विना कियेजोगके जुगती सब जानलेव।
बिन बिराग त्याग भेद पावत नर नारी है॥ बिना किये तीरथ के
तीरथफल प्राप्तहोत बिना जाप अजपा की उक्ति उर बिचारी है।
कहे सरसमाधुरी सुनाय सब सन्तनको बांचे भक्तिसागर होत
भवसागर पारी है ॥ १० ॥
श्रीहरिके सुमिरनमें सुरति निरति लगे जाय नैनन में बसे
आय ध्यान प्रिया श्यामको। अमरलोक लीला को अनुभव
हियमाहिं फुरे दरसन लगजाय तात्काल रूप धामको ॥
रासादिक लीलाकी ललित रीति जानपरे हिये माहिं भरे
आय प्रेम अष्ट जामको। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब भक्तन
को ग्रन्थ भक्तिसागर है रसिकन के कामको ॥ ११ ॥
सरल और सुगम देश भाषा सो भूपित है अतिही निर-
दूषित यह बानी परम पावनी । पढ़ते ही अक्षर के अर्थ ज्ञान
परेजान धर्मभूल सबही संदेह की नशावनी ॥ प्रेम प्रगटावनी
रंगभक्ति की बढ़ावनी है अतिही सुहावनी सन्त भक्तन मन-
भावनी । हरि रस सरसावनी छवि दम्पति छकावनी सरस-

( ८ )
माधुरी रसामृत को रसिकन को प्यावनी ॥ १२ ॥
गृहस्थ अरु विरक्त वानप्रस्थ संन्यस्तहू की जुदी जुदी
रहनि गहनि जुक्ति कर जनाई है । आश्रम अरु वर्ण धर्म
शास्त्रनमें सकल कहे उनहूकी करनरीति उत्तम बताई है ॥
ऊँच नीच कर्मनके फलन की अनेकगति जैसी प्राप्तहोत तैसी
खोलकर दिखाई है । कहे सरसमाधुरी रहस्यभरी बानी यह वांचें
जो ग्रन्थ तिन्ह सुगम जानपाई है ॥ १३ ॥
ज्ञाताज्ञेय ज्ञानअरु ध्याता ध्येय ध्यानहू की त्रिपुटी के मिटे
शुद्ध आत्माबताई है । क्षर और अक्षर निहअक्षर बखान किये अक्ष-
रातीतरीत बानीमें गाई है॥ पदस्थ पिंडस्थ रूपस्थ रूपातीत ध्यान
शून्य में समावन की बात समझाई है । परमहै प्रकाशमान पटतर
नहि होत भान परमतत्त्वकी पिछान सरस कहिसुनाई है ॥१४॥
सतयुग अरु त्रेता पुनि द्वापर कलियुग कराल तिनहूं की
रहनि गहनि रीति सर्व गाई है । जैसी करे करनी ताहि तैसीही
भरनी है टरनी है नाहिं यही दृढ़कर दरसाई है ॥ जीतन जम-
राज काल काटन को गाया जाल श्रीहरिगुन गान रीति ग्रन्थमें
बताई है । कहे सरसमाधुरी सुसाज बाज सहित भजन करे
ताहि मिलें आय राधिका कन्हाई है ॥ १५ ॥
सर्व से सुलभ कलिबीच सार कीरतन है याहीको करके
कह्यो हरिको रिझावना । जोग जग्य ज्ञान ध्यान तीरथ के
न्हानहूते उत्तम है यही सही केवल गुण गावना ॥ भजन के
कियेते भवसागर तरजात तुरत निश्चय कर याहीतें परम धाम
पावना । कहे सरसमाधुरी सु सेवाकर दम्पति की छवि में नित
छके छुटे आवन अरु जावना ॥ १६ ॥
इति ॥

श्रीमन्निकुंजविहारिणे नमः॥
श्रीमत् श्यामचरणदासाचार्यचरितामृत ॥
ॐ श्री सरसमाधुरीजी रचित ॐ
(दोहावली)
श्रीसतगुरु बलदेव प्रभु, चरणन शीश नवाय।
श्यामचरण के दास को, चरितामृत कहों गाय १
बैठि हिये मम श्रीगुरु, करि हैं आय सहाय।
सरस माधुरी गुरु कृपा, सबही विधि बनजाय २
सम्बत सत्रहसौ गिनो, ऊपर साठ पिछान।
प्रगटे भार्गववंश में, कृष्ण अंश प्रभु आन ३
शोभनजी के कुल विषै, अष्टम पीढ़ी अन्त।
मुरलीधर घर प्रगट भे, श्यामरूप धर सन्त ४
स्वप्न माहिं दर्शन दिये, कुंजो कों श्री श्याम।
तुमरे प्रगटूं पुत्र हो, सुनहु मातु सुखधाम ५
भादो शुक्ला तीज को, कुंजो कूख मझार।
बालनाम रणजीत धर, प्रगटे कृष्ण मुरार ६
जन्म समय अस्थान में, भयो अधिक उजियार।
अनहद धुनि बाजे बजे, छई सुगन्धि अपार ७
नाम ग्राम डहरे विषै, घर घर मंगल चार।
विविधि बधाई गुनिनमिल, गाई भली प्रकार ८
पंच वर्ष की वैसमें, सरिता तट शुकदेव।
गोदलिये रणजीत को, प्यार कियो गुरुदेव ६
गये वर्ष उन्नीस में, गंगातट शुकतार।
साक्षात् दर्शन दिये, शुक मुनि व्यास कुमार १०

१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुदीक्षा दी विधि सहित, मंत्र सुनायो कान ।
योग ज्ञान वैराग दे, किये शिष्य हित मान ११
श्री तिलक मस्तक रचो, श्रीतुलसी शुचि माल ।
गल में बांधी प्रेमसों, कीन्हें शिष्य निहाल १२
नौधा प्रेमा अरु परा, त्रिविधि भक्तिदइ दान ।
तारण तरण बनायके, कीने आप समान १३
आज्ञा दी श्री शुकमुनी, जगमें भक्ति प्रचार ।
विमुखन हरि सन्मुख करो, निस्तारो संसार १४
सतगुरु आज्ञा शीशधर, आ दिल्ली अस्थान ।
रचि मन्दिर राजे जहां, कियो मानसी ध्यान १५
योग युक्ति चौदह वरष, करी समाधि लगाय ।
रूप अनेकन धार प्रभु, भारत दियो चिताय १६
राजा रानी छत्रपति, तिनकी करी न चाह ।
चरणदास हरि रंग रंगे, सबसों बे परवाह १७
ईश्वरीय परिचय अमित, दिये भक्ति हरि हेत ।
किये मनोरथ सबन के, पूरण प्रेम समेत १८
बादशाह दिल्ली तखत, ठाड़े रहे हुजूर ।
चरणदास के चरण की, मस्तक धारी धूर १६
अष्टसिद्धि नवनिद्धि सब, खड़ी रही कर जोर ।
श्यामचरणके दास प्रभु, लखें न तिनकी ओर २०
शिष्य अनेकन कर प्रभो, तारन तरन बनाय ।
चार धाम सातो पुरी, तीरथ दिये पठाय २१
श्री भगवत की भक्ति को, भानु दियो प्रगटाय ।
भर्म निशा सोते हुए, दीने जीव जगाय २२
नर नारी संसार के, करन लगे हरि भक्त ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । ११
पगे प्रेम प्रीतम प्रिया, नशी बासना जक्त २३
कलियुगके कलभप सकल, दीने सबहि मिटाय ।
चरणदास प्रभु कृपाकर, बिगरी दई बनाय २४
कलियुग छायो जक्त में, मिटी वेद मरयाद ।
उबरे अनगिन जीव जग, श्री चरणदास प्रसोद २५
कलियुग सतयुग समकियो, दियो नाम हरि दान ।
चरणदास जग जियको, प्रेम करायो पान २६
कलियुग में सत कर्मको, कियो बहुत बिस्तार ।
चरणदास गुरु भक्ति दे, निस्तारो संसार २७
श्रीवृन्दावनगमनवर्णन ॥
सगुण ब्रह्म सर्वज्ञ प्रभु, सर्व व्यापी श्याम ।
पुरुषोत्तम परमात्मा, श्रीवन जिनको धाम २८
सतचिदघन आनन्दमय, जिनको अद्भुत रूप ।
ध्यानधरत विधि शिवसदा, तिन पद पद्म अनूप २६
श्याम चरण के दास प्रभु, आचारज अवतार ।
दिल्ली से चलकर गये, वृन्दा विपिन मझार ३०
दृगन चटपटी दरस की, निरखन नन्दकुमार
विरह विथा व्याकुल महा, तनकी सुधिन सँभार ३१
पहुंचे सेवा कुंज मैं, निरखी अनुपम ठौर ।
सब कुंजनतें अति सरस, तेहि समान नहिं और ३२
सेव्य जहाँ श्रीराधिका, सेवक श्रीनँदलाल ।
याते नाम प्रसिद्ध जग, सेवा कुंज रसाल ३३
लता ललित छाई जहाँ, छवि को नाहिं न पार ।
कुसुमित तरु वेली छईं, भृंग करत गुंजार ३४

१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
द्रुम बहु नाना भांतिके, छाई बेलि वितान ।
तिनमें पक्षी विविधविधि, करत युगल गुणगान ३५
सीतलमन्द सुगन्ध मय, रोचक बहत समीर ।
ऋतुबसन्त सन्तत रहत, बोलत कोयल कीर ३६
रैनि माहिं तहाँ छिपिरहै, श्याम चरण के दास ।
निज मन्दिर बारहदरी, जा बैठे जेहि पास ३७
करनलगे तहां भावना, मूंदलिये निज नैन ।
रोमांचितहो पुलक तन, कहे विरह मुख बैन ३८
हा राधे मम स्वामिनी, हे प्रीतम घनश्याम ।
वेगि दरश दे युगल वर, पूरणकर मन काम ३६
हा हा छबि दीजै दिखा, दास मोहिं निज मान ।
नाहीं तन तज जायगो, तात्काल यह प्रान ४०
विरह हूक हिय में उठी, भये महा बेहाल ।
दृगन अश्रुधारा बही, तनकी सुधि न सँभाल ४१
अन्तरयामी युगलवर, रसिकन के प्रिय प्रान ।
विरह विथा निज दासकी,अतिशय निज मनमान४२
चरणदास आये यहां, हमरे घर महमान ।
प्रगट होय दे निज दरस, करें सन्त सन्मान ४३
रसिक हमारे प्राण-धन, हम रसिकन के प्रान ।
प्रेमिन के समतुल हमें, और प्रिय जग आन ४४
अर्धनिशा बीती तबहि, प्रगटे प्यारी लाल ।
भक्तन के मन भावने, करुणासिन्धु कृपाल ४५
गौरश्याम अभिराम दोउ, अनुपम नवलकिशोर ।
ललितादिक अनगिनअली, संगलिये सिरमौर ४६
नील पीत पट सोहने, नखशिख सजि श्रृंगार ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १३
मुकुट चन्द्रिका शीशपर, छविको नाहीं पार ४७
युगल चन्द्रमुख चन्द्रिका, छाई मध्य निकुंज ।
दमकत चमकत अंगदुति, अनुपम छविकी पुंज ४८
चंचल वितवनि रसभरी, मन्द मधुर मुसकान ।
अलक कपोलन छुटरही, अधर ललाई पान ४६
बेसर और बुलाक शुचि, नासा शोभा देत ।
निरखतही निजजननको, मनमानिक हरि लेत ५०
गल बैयां दीने दोऊ, मदन मनोहर लाल ।
प्रीतम कर वंशी लसी, प्रिय कर कमल रसाल ५१
युगलचरण वारिजबरण, छवि कुछ कही न जाय ।
पायल घुँघरू सजि रहे, छुम छुम शब्द सुनाय ५२
उठ आतुर चरणन परे, चरणदास तेहि वार ।
कृष्ण भुजनभर हियलगा, कियो प्रेम अति प्यार ५३
कुँवरि किशोरी करि कृपा, प्रेम मंजरी जान ।
हस्तकमल मस्तक धरो, दियो प्रेम वरदान ५४
पुनि दोऊ प्रीतम प्रिया, चरणदास लै संग ।
जाय विराजे कुंज में, हिलमिल हर्ष उमंग ५५
हँसिहँसि रसबतियांकरन, लागे श्याम सुजान ।
चतुर शिरोमणि लाड़िली, नागरि नेह निधान ५६
कहनलगे मुख मृदुवचन, आये प्रीति पिछान ।
कहा करें तुम पहुनई, अरु सेवा सन्मान ५७
चरणदास दोउ जोरकर, या विधि बोले बैन ।
सेवादे निज पद कमल, निकट रखो दिन रैन ५८
हँसि बोले तब श्रीहरि, मधुर वचन अभिराम ।
जगमें भेजे जिस लिये, सो न किये कुछ काम ५६

१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आचारज बपु दे तुम्हें, भक्ति प्रचारन काज ।
भेजा है संसार में, सुनहु भक्त महराज ६०
योगध्यान तज कीजिये, नौधा भक्ति प्रचार ।
प्रेमपरायण जीव हो, उतरे भवनिधि पार ६१
प्रेमभक्ति प्रगटाय जग, जीवन को दे दान ।
करो कृतारथ जक्त को, मेरे जीवन प्रान ६२
कछु इक दिन बीते तुम्हें, ले निजधाम बुलाय ।
रखें निरन्तर निकट नित, सुन प्यारे चितलाय ६३
वचन कहे श्रीकृष्ण ने, सुने श्याम चरनदास ।
बिछुरन बिरह वियोगलखि, अतिशय भये उदास ६४
गदगद बानी होगई, नैन बही जलधार ।
सुबकीले रोवन लगे, सन्मुख कृष्ण मुरार ६५
हाय हरी कैसी करी, धीर धरी नहिं जाय ।
तुम सब समझत लाड़िले, बिछुरन दुख अधिकाय ६६
तुमरो श्रीमुख चन्द्रमा, मेरे नयन चकोर ।
बिनदरशन जीवन नहीं, सुनिये नवलकिशोर ६७
सघन सजल गिरि आपहो, मैं हों तुम्हूरा मोर ।
सुखी होंहु सुन साँवरे, बंशीधुनि घन घोर ६८
चरण कमलवत आप के, मधुकर है मन मोर ।
तहां बसनको चित चहै, अन्त नहीं कहिं ठौर ६६
स्वामी मेरे आप हो, मैं सेवक निज दास ।
उत्कंठा अति रहन की, सदा तुम्हारे पास ७०
स्वाति बूंद तुम हो हरी, चातक मोहिं पिछान ।
रूप सुधारस पान बिन, तलफत मेरे प्रान ७१
आप पारधी प्रांण धन, मोहिं मृगा लो मान ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १५
मारो निस्तारो तुमहि, मोको गति नहिं आन ७२
गंगाजल सम श्याम तुम, मैं हों तुम्हरा मीन ।
तुम माता मैं पुत्रवत, समझो सत्य प्रवीन ७३
तुम गैया मैं बत्स सम, मैं पतंग तुम दीप ।
यही चाह चित में बसे, निशिदिन रहों समीप ७४
कहनलगे श्रीकृष्ण तब, सुनहु श्याम चरनदास ।
तुमरे हिय माहीं रहै, हमरो सदा निवास ७५
सन्त हमारी आतमा, यामें नहिं संदेह ।
रोम रोम में रमि रहै, ज्यों बादर में मेह ७६
आज्ञा जो हमने दई, लीजे प्यारे मान ।
भक्ति प्रचारो भक्त में, करो जियन कल्यान ७७
जो आज्ञा करिहों यही, कही चरणही दास ।
देखो चाहूँ सांवरे, सुन्दर रास बिलास ७८
ह्वै प्रसन्न बोले लला, मूंदो अपने नैन ।
आज्ञा दूँ तब खोलियो, हे प्रीतम सुख दैन ७६
मूंदे तबहीं नैन निज, चरणदास तेहि बार ।
बोले पुनि श्रीश्यामघन, देखो पलक उघार ८०
दृगन खोल देखन लगे, तेजोमय उजियार ।
रत्न जटिल अवनी लखी, जगमग जोति अपार ८१
ऋतु बसंत संतत तहाँ, अनगिन बाग बहार ।
फूले फूल अनेक जहाँ, लहरत लता अपार ८२
फुलवारी क्यारी बनी, न्यारी नाना रंग ।
तरुन माहिं बहु वरन के, बोलत विविधि विहंग ८३
बीच विविधि कुंजस्थली, छाई बेलि वितान ।
तिन में सेवा हित रहें, सहचरि सखी सुजान ८४

१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ठौर ठौर सुंदर सुखद, भरे सरोवर नीर ।
कमल खिले बहु रंग के, रोचक बहत समीर ८५
बँग्ला अरु बारहदरी, बनी अनेकन और ।
तिन पर सूवा सारिका, क्रीड़त मोरी मोर ८६
मध्य महारमनीक इक, रतन जटित सुढार ।
बन्यों चौतरा अति सरस, मंडल गोलाकार ८७
चौसठ खम्भा तासु पर, जटित- जवाहर लाल ।
पचरँग चुन्नी चमकनी, बूंटा वेलि सुढाल ८८
चौंसठ खम्भा पर बनो, रंग महल रस खान ।
मणि माणिक बहुँ दिसि जड़े, जगमग जोति महान ८६
चौंसठ कलश सुहावने, ध्वज पताक धजदार ।
लहरत फहरत तड़ित सम, दमकत दुति मनहार ६०
चौंसठ खम्भा मध्य में, विछी विछायत खूब ।
नरम रेशमी गलीचा, अतिशय सरस अजूब ६१
गुलदस्ता सुंदर सजे, सुमन अनेकन रंग ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १७
चहों ओर ठाड़ी सखी, मनहुँ प्रेम की माल ६७
चमर मोर छल अरु छरी, लिये खरी कोइ बाल ।
इतरदान लीने कोऊ, कोउ कर लिये रुमाल ६८
पानदान लेकर कोऊ, कोउ फूलन की माल ।
कोउ दरपन अरपन करत, छविलखि होत निहाल ६६
सन्मुख श्यामा श्याम के, खड़े सखिन के वृन्द ।
इकटक निरखत युगलको, मनहुँ चकोरी चंद १००
सखी रास रस करन को, बजवत बीन मृदंग ।
कोउ सितार कोउ सरंगी, कोउ बजात मुहचंग १०१
मधुर मजीरा कोउ अली, लिये बजावत संग ।
कोऊ अलापत सप्तस्वर, हिय में भरी उमंग १०२
कोउ उघटत सांगीतअली, नृतत गति नव ढंग ।
भाव बतात नचात दृग, लचकावत कटि अंग १०३
जै जै जुगल किशोर कहि, कोऊ रही हरषाय ।
गोदन भर अति मोद मन, सुमन रही वरषाय १०४
चरणदास तहां अपन का, देखे सखी सरूप ।
नव यौवन सुकुमार तन, नख शिख सुंदर रूप १०५
सिंहासन के सन्निकट, रही दोऊ कर जोर ।
तब हँसि बोले श्री हरिः, चितय चपल दृगकोर १०६
अब नीके लखि लीजिये, लीला रास विलास ।
सुख रासी दासी चरन, आव हमारे पास १०७
चरणदासि कर गहि उठे, श्री मत गोपीनाथ ।
पुनि लालन निरतन लगे, प्राण प्रिया लै साथ १०८
वाम अंग श्री राधिका, दहिने चरणहिदासि ।
मध्य बिहारी लाल जू, नृतत उमँगि हुलासि १०६
चहों ओर आली नचत, मंडल गोल बनाय ।

१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निरखत छवि रस माधुरी, हर्ष न हृदय समाय ११०
लेत स्वल्पगति लाड़लो, बहुबिधि भाव बताय ।
नैन नचा लचकाय कटि, ताथेइया मुख गाय १११
अंग संग दै अधर रस, प्यावत प्रेम बढ़ाय ।
चरणदासि को श्यामघन, लेत भुजन भर धाय ११२
मुकट लटक मन को हरत, अलक रही बलखाय ।
छुटी कपोलन लाल के, चित को लेत चुराय ११३
मकराकृत कुंडल श्रवन, नाक बुलाक सुढार ।
मोती मटकत अधर पर, अजब सुराहीदार ११४
पाजामा कछनी ललित, पीत रंग मनहार ।
नख शिख लो भूषन सजे, गल फूलन के हार ११५
रंग रँगीली लाड़िली, मदन मनोहर लाल ।
नटवर गति ले ले नई, रस बस कीनी बाल ११६
श्री राधे रासेश्वरी, सखियन की सरदार ।
दरसायो चरनंदासि को, नित नवरास बिहार ११७
पुनि राजे दम्पति तबहि, सिंहासन पर जाय ।
चरणदासि को कर कृपा, लइनिज निकटबुलाय ११८
हँसि बोले श्री हरि बचन, करके प्रेम अपार ।
चरणदासि जा जक्त में, भक्ति करो विस्तार ११६
तबहि दासि दोउ जोर कर, आज्ञा सिर धर लीन ।
परिक्रमा करके बहुर, चरण प्रणाम सुकीन १२०
नैन मूंदि निज लीजिये, कही कृष्ण भगवान ।
दृग मूंदे तब दास ने, ताही समय पिछान १२१
पुनि आकाशबानी भई, चक्षु खोल चरनदास ।
दृग खोलतही आ गये, बंशीवट के पास १२२
संतरूप आपन लखो, श्याम चरन के दास ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १६
बिछुरन दम्पति मन समझ, अतिशय भये उदास १२३
धरनि गिरे व्याकुल विरह, देह दशा विसराय ।
नैनन जल धारा बही, करत हाय हरि हाय १२४
इसी भांति बीतो दिवस, होय गई पुनि रैन ।
प्रगट भये शुकदेव मुनि, निजशिष्यको सुखदैन १२५
श्री सतगुरु नैनन निरखि, उठ करि चरण प्रणाम ।
व्याकुल हो बिलपन लगे, बिनश्रीश्यामाश्याम १२६
विनय करी कर जोर के, दम्पति दरस कराय ।
नाहीं तो तन त्यागि के, जीव निकस यहजाय १२७
श्री शुक मेस्तक शिष्य के, धरो कृपा कर हाथ ।
बंशीवट नीचे लखे, श्याम राधिका साथ १२८
गलबैंयां दीने युगल, नवल लाड़िली लाल ।
मंद मंद मुसकात मुख, रूप राशि छवि जाल १२६
श्री दम्पति के दरस कर, छके श्याम चरनदास ।
रोम रोम में प्रगट भयो, परमानंद हुलास १३०
शिष्य के मस्तक से तभी, मुनि लियो हाथ उठाय ।
दृष्टि परे दम्पति न तब, अचरजभयोअधिकाय १३१
श्री शुक मुनिचरनन परे, श्यामचरन के दास ।
धन्यवाद श्री गुरुन को, कीनो सहित हुलास १३२
पुनि गुरु शिष्य दोऊन में, ज्ञान गोष्टि सम्वाद ।
रह्यो रैन में रंग अति, उर उपजो आह्लाद १३३
प्रात होत शुक मुनि कही, सुनो श्याम चरनदास ।
दिल्ली जाके तुम करो, श्री हरि भक्ति प्रकास १३४
शिष्य करी तब दंडवत, श्री गुरुचरनों माहिं ।
शीश उठा देखन लगे, शुक मुनि दरसे नाहिं १३५
श्रीशुक मुनि धर ध्यानउर, श्यामचरन के दास ।

२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बृन्दाबन से गवन कर, दिल्ली कियो निवास १३६
रहन लगे आनन्द सों, कृष्ण ध्यान गलतान ।
नर नारिन उपदेश दे, भजन करें भगवान १३७
दूर देश रमत करन, जावें श्री महाराज ।
भक्ति प्रचारें जक्त में, परमारथ के काज १३८
रूप अनेकन धार के, भक्तन करी सहाय ।
जल थल देश बिदेश में, चरणदास प्रगटाय १३६
बैष्णव नागरिदास को, जगन्नाथ निज रूप ।
दरसायो करि के कृपा, सुंदर अधिक अनूप १४०
बैजनाथ विप्रने लखे, श्री महाराज सुजान ।
चरण प्रछाले गंगजल, शिष्य ह्वगए अस्थान १४१
बैष्णव परमानंद की, मनसा पूरन कीन ।
कृष्ण रूप निज है प्रभो, दर्श दयानिधि दीन १४२
जोग जीत गुरु छोन कों, दरसायो निज धाम ।
अमर लोक सँग ले गये, जहां श्री राधे-श्याम १४३
राम सखी सह वपु गई, श्याम सुँदर के संग ।
जा पहुँची निज धाम में, जहां रास रस रंग १४४
श्री मति कुंजो मात कों, दरस कराये श्याम ।
तन को तज के फिर गई, अमरलोक निजधाम १४५
बिबिचारी जय करन को, कियो कृतारथ जाय ।
अमर लोक में ले गये, दम्पति दरस कराय १४६
स्वर्ग प्रवाही गंगजल, सेवक दिये न्हवाय ।
जय जय श्रीमहाराज की, सकल उठे मुख गाय १४७
साधू परमानंद को, डसो सर्प ने आय ।
श्यामचरण के दास प्रभु, लीनो तुरत जिवाय १४८
दो कन्या पैदा हुई, सेवक के घर आन ।

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । २१
निज प्रभुता सों पुत्र किए, चरणदास भगवान १४९
रक्षा कीनी बैल सों, शिष्य प्रेम गलतान ।
घोड़े से लीनो बचा, निरमलदास सुजान १५०
जमुना में न्हावत हुते, मुक्तानंद सु संत ।
ग्राह ग्रसे लीने छुड़ा, चरनहि दास तुरंत १५१
दूसर आतम राम को, दीने नर्क दिखाय ।
भय मानो यमदूत लखि, चरण शरणलइ आय १५२
बैठे जमुना नाव में, डूबन लागे संत ।
ध्यान धरो महाराज को, दिये उवार तुरंत १५३
छै महिने पहिले कह्यो, आवन नादिरशाह ।
परचय पा चरनन परे, शाह मुहम्मदशाह १५४
माना नादिरशाह ने, भक्त राज इर्शाद ।
मुरशद पीर पिछान के, कीना निज दिलशाद १५५
गिलचे आये क़तल को, कियो तरवार प्रहार ।
हाथ हुवे जड़ सबन के, तब मन मानी हार १५६
नौधा प्रेमा - पराको, निशिदिन बरसे रंग ।
सदा होइ हरिकीरतन, बाजत बीन मृदंग १५७
सेवक साधू सन्त सब, रहें ध्यान लवलीन ।
युगल लगन में मग्ननित, प्रेम सिंधु मन मीन १५८
भक्ति हरी को कर दियो, श्री महाराज प्रचार ।
भारत में करने लगे, प्रेम भक्ति नर नार १५९
सर्परूप श्री हरी ने, पार्षद दिया पठाय ।
आवो प्यारे धाम अब, दियो संकेत जनाय १६०
तब निज सन्तनको बुला, बोले श्री महाराज ।
हमजावें हरिधाम को, कर मन वांछित काज १६१
भक्ति भजन करते रहो, सुमरो श्री हरिनाम ।