भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहिं संशय यह भेद समझायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय
सब भक्तनको रस समुद्र सगुन ब्रह्म पुरुषोत्तम बतायो है ॥ ८ ॥
छहों मुक्तिमारग की रहस्य कही याके बीच प्रेम को परतत्त्व
सर्व उत्तम दृढ़ायो है। प्रेम के समान नहीं और कुछ वतायो
आन ज्ञान ध्यान योगादिक तुच्छ दरसायो है ॥ आदि मध्य
अन्त भक्तिसागर में भलीभाँति सबको सरताज प्रभु प्रेम को
जनायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब रसिकनको जिनने
कुछ पायो एक प्रेमही से पायो है ॥ ९ ॥
बिना पढ़े वेदनके वेदतत्त्व जानपरे बिना शास्त्र श्रवण किये
समझे बात सारी है। विना कियेजोगके जुगती सब जानलेव।
बिन बिराग त्याग भेद पावत नर नारी है॥ बिना किये तीरथ के
तीरथफल प्राप्तहोत बिना जाप अजपा की उक्ति उर बिचारी है।
कहे सरसमाधुरी सुनाय सब सन्तनको बांचे भक्तिसागर होत
भवसागर पारी है ॥ १० ॥
श्रीहरिके सुमिरनमें सुरति निरति लगे जाय नैनन में बसे
आय ध्यान प्रिया श्यामको। अमरलोक लीला को अनुभव
हियमाहिं फुरे दरसन लगजाय तात्काल रूप धामको ॥
रासादिक लीलाकी ललित रीति जानपरे हिये माहिं भरे
आय प्रेम अष्ट जामको। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब भक्तन
को ग्रन्थ भक्तिसागर है रसिकन के कामको ॥ ११ ॥
सरल और सुगम देश भाषा सो भूपित है अतिही निर-
दूषित यह बानी परम पावनी । पढ़ते ही अक्षर के अर्थ ज्ञान
परेजान धर्मभूल सबही संदेह की नशावनी ॥ प्रेम प्रगटावनी
रंगभक्ति की बढ़ावनी है अतिही सुहावनी सन्त भक्तन मन-
भावनी । हरि रस सरसावनी छवि दम्पति छकावनी सरस-