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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 15

१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुदीक्षा दी विधि सहित, मंत्र सुनायो कान ।
योग ज्ञान वैराग दे, किये शिष्य हित मान ११
श्री तिलक मस्तक रचो, श्रीतुलसी शुचि माल ।
गल में बांधी प्रेमसों, कीन्हें शिष्य निहाल १२
नौधा प्रेमा अरु परा, त्रिविधि भक्तिदइ दान ।
तारण तरण बनायके, कीने आप समान १३
आज्ञा दी श्री शुकमुनी, जगमें भक्ति प्रचार ।
विमुखन हरि सन्मुख करो, निस्तारो संसार १४
सतगुरु आज्ञा शीशधर, आ दिल्ली अस्थान ।
रचि मन्दिर राजे जहां, कियो मानसी ध्यान १५
योग युक्ति चौदह वरष, करी समाधि लगाय ।
रूप अनेकन धार प्रभु, भारत दियो चिताय १६
राजा रानी छत्रपति, तिनकी करी न चाह ।
चरणदास हरि रंग रंगे, सबसों बे परवाह १७
ईश्वरीय परिचय अमित, दिये भक्ति हरि हेत ।
किये मनोरथ सबन के, पूरण प्रेम समेत १८
बादशाह दिल्ली तखत, ठाड़े रहे हुजूर ।
चरणदास के चरण की, मस्तक धारी धूर १६
अष्टसिद्धि नवनिद्धि सब, खड़ी रही कर जोर ।
श्यामचरणके दास प्रभु, लखें न तिनकी ओर २०
शिष्य अनेकन कर प्रभो, तारन तरन बनाय ।
चार धाम सातो पुरी, तीरथ दिये पठाय २१
श्री भगवत की भक्ति को, भानु दियो प्रगटाय ।
भर्म निशा सोते हुए, दीने जीव जगाय २२
नर नारी संसार के, करन लगे हरि भक्त ।