भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
द्रुम बहु नाना भांतिके, छाई बेलि वितान ।
तिनमें पक्षी विविधविधि, करत युगल गुणगान ३५
सीतलमन्द सुगन्ध मय, रोचक बहत समीर ।
ऋतुबसन्त सन्तत रहत, बोलत कोयल कीर ३६
रैनि माहिं तहाँ छिपिरहै, श्याम चरण के दास ।
निज मन्दिर बारहदरी, जा बैठे जेहि पास ३७
करनलगे तहां भावना, मूंदलिये निज नैन ।
रोमांचितहो पुलक तन, कहे विरह मुख बैन ३८
हा राधे मम स्वामिनी, हे प्रीतम घनश्याम ।
वेगि दरश दे युगल वर, पूरणकर मन काम ३६
हा हा छबि दीजै दिखा, दास मोहिं निज मान ।
नाहीं तन तज जायगो, तात्काल यह प्रान ४०
विरह हूक हिय में उठी, भये महा बेहाल ।
दृगन अश्रुधारा बही, तनकी सुधि न सँभाल ४१
अन्तरयामी युगलवर, रसिकन के प्रिय प्रान ।
विरह विथा निज दासकी,अतिशय निज मनमान४२
चरणदास आये यहां, हमरे घर महमान ।
प्रगट होय दे निज दरस, करें सन्त सन्मान ४३
रसिक हमारे प्राण-धन, हम रसिकन के प्रान ।
प्रेमिन के समतुल हमें, और प्रिय जग आन ४४
अर्धनिशा बीती तबहि, प्रगटे प्यारी लाल ।
भक्तन के मन भावने, करुणासिन्धु कृपाल ४५
गौरश्याम अभिराम दोउ, अनुपम नवलकिशोर ।
ललितादिक अनगिनअली, संगलिये सिरमौर ४६
नील पीत पट सोहने, नखशिख सजि श्रृंगार ।