भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
आचारज बपु दे तुम्हें, भक्ति प्रचारन काज ।
भेजा है संसार में, सुनहु भक्त महराज ६०
योगध्यान तज कीजिये, नौधा भक्ति प्रचार ।
प्रेमपरायण जीव हो, उतरे भवनिधि पार ६१
प्रेमभक्ति प्रगटाय जग, जीवन को दे दान ।
करो कृतारथ जक्त को, मेरे जीवन प्रान ६२
कछु इक दिन बीते तुम्हें, ले निजधाम बुलाय ।
रखें निरन्तर निकट नित, सुन प्यारे चितलाय ६३
वचन कहे श्रीकृष्ण ने, सुने श्याम चरनदास ।
बिछुरन बिरह वियोगलखि, अतिशय भये उदास ६४
गदगद बानी होगई, नैन बही जलधार ।
सुबकीले रोवन लगे, सन्मुख कृष्ण मुरार ६५
हाय हरी कैसी करी, धीर धरी नहिं जाय ।
तुम सब समझत लाड़िले, बिछुरन दुख अधिकाय ६६
तुमरो श्रीमुख चन्द्रमा, मेरे नयन चकोर ।
बिनदरशन जीवन नहीं, सुनिये नवलकिशोर ६७
सघन सजल गिरि आपहो, मैं हों तुम्हूरा मोर ।
सुखी होंहु सुन साँवरे, बंशीधुनि घन घोर ६८
चरण कमलवत आप के, मधुकर है मन मोर ।
तहां बसनको चित चहै, अन्त नहीं कहिं ठौर ६६
स्वामी मेरे आप हो, मैं सेवक निज दास ।
उत्कंठा अति रहन की, सदा तुम्हारे पास ७०
स्वाति बूंद तुम हो हरी, चातक मोहिं पिछान ।
रूप सुधारस पान बिन, तलफत मेरे प्रान ७१
आप पारधी प्रांण धन, मोहिं मृगा लो मान ।