भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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करी सर्वबात नूर अरु जहूर सब बरनें रहमानी हैं ॥ फ़ना
फिल्लाबाद में बक़ा की बुनियाद कही आबिद मक़बूल खुदा
उनहीने जानी हैं। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब फुकरन को
इश्क़ है हक़ीक़ी यामें शगल सुब्हानी हैं ॥ ४ ॥
सम्प्रदाय सर्वधर्म आश्रम अरु वर्णकर्म वैष्णवता मुख्य
मर्मया में जनाये हैं। कर्मयोग ज्ञानयोग सांख्ययोग राजयोग
अष्टांगयोग भक्तियोग दरसाये हैं॥ मायाजीव ईश्वर ये तीन
तत्त्व कहे अनादि ईश के अधीन माया जीव कहि गाये हैं।
कहे सरसमाधुरी कृपाल श्याम चरणदास शुक मुनि प्रसाद
गुप्तभेद प्रगटाये हैं ॥ ५ ॥
खण्डन अरु मण्डनकी उक्ति युक्ति कथी नाहिं श्रुति पुराण
सारधर्म सबही कहि गायो है। जितने मत पंथ प्रगट देखियत
जगत माहिं ग्रन्थ भक्तिसागर यह सबके मन भायो है ॥
बाँचैं कर मन विचार रहस्यरीति हृदयधार परमानँद सुख प्रतक्ष
उनहीने पायो है। कहे सरसमाधुरी सुनाय सब भक्तन को
भारत भूमि में प्रताप अतिशय कर छायो है ॥ ६ ॥
ज्ञानिनने पर्मज्ञान ध्यानिनने पर्मध्यान योगिनने पर्मयोग
याहि पढ़े पायो है। परम बैराग प्राप्त भयो है बिरागिन को
अनुरागी भक्तन के प्रेम हाथ आयो है ॥ आरत जिज्ञासू अरु
मुमुक्षु अधिकारिन के इच्छा अनुसार समाधान उर छायो
है। कहे सरसमाधुरी यह अतिही उपयोगी ग्रन्थ सबही मत
पंथ याकी बानी सुन लुभायो है ॥ ७ ॥
निर्गुन अरु सगुन पुनि सर्वोपरि रहनि यामें निराकार
अरु साकार सुलभ कहि सुनायो है। ओत प्रोत अगुन
सगुन सूरज अरु धूप सदृश भिन्नभेद भावरूप एक कर
दिखायो है ॥ जैसी जाके चाह ताहि तैसीही प्राप्तिहोत यामें