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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । ११
पगे प्रेम प्रीतम प्रिया, नशी बासना जक्त २३
कलियुगके कलभप सकल, दीने सबहि मिटाय ।
चरणदास प्रभु कृपाकर, बिगरी दई बनाय २४
कलियुग छायो जक्त में, मिटी वेद मरयाद ।
उबरे अनगिन जीव जग, श्री चरणदास प्रसोद २५
कलियुग सतयुग समकियो, दियो नाम हरि दान ।
चरणदास जग जियको, प्रेम करायो पान २६
कलियुग में सत कर्मको, कियो बहुत बिस्तार ।
चरणदास गुरु भक्ति दे, निस्तारो संसार २७
श्रीवृन्दावनगमनवर्णन ॥
सगुण ब्रह्म सर्वज्ञ प्रभु, सर्व व्यापी श्याम ।
पुरुषोत्तम परमात्मा, श्रीवन जिनको धाम २८
सतचिदघन आनन्दमय, जिनको अद्भुत रूप ।
ध्यानधरत विधि शिवसदा, तिन पद पद्म अनूप २६
श्याम चरण के दास प्रभु, आचारज अवतार ।
दिल्ली से चलकर गये, वृन्दा विपिन मझार ३०
दृगन चटपटी दरस की, निरखन नन्दकुमार
विरह विथा व्याकुल महा, तनकी सुधिन सँभार ३१
पहुंचे सेवा कुंज मैं, निरखी अनुपम ठौर ।
सब कुंजनतें अति सरस, तेहि समान नहिं और ३२
सेव्य जहाँ श्रीराधिका, सेवक श्रीनँदलाल ।
याते नाम प्रसिद्ध जग, सेवा कुंज रसाल ३३
लता ललित छाई जहाँ, छवि को नाहिं न पार ।
कुसुमित तरु वेली छईं, भृंग करत गुंजार ३४