भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १३
मुकुट चन्द्रिका शीशपर, छविको नाहीं पार ४७
युगल चन्द्रमुख चन्द्रिका, छाई मध्य निकुंज ।
दमकत चमकत अंगदुति, अनुपम छविकी पुंज ४८
चंचल वितवनि रसभरी, मन्द मधुर मुसकान ।
अलक कपोलन छुटरही, अधर ललाई पान ४६
बेसर और बुलाक शुचि, नासा शोभा देत ।
निरखतही निजजननको, मनमानिक हरि लेत ५०
गल बैयां दीने दोऊ, मदन मनोहर लाल ।
प्रीतम कर वंशी लसी, प्रिय कर कमल रसाल ५१
युगलचरण वारिजबरण, छवि कुछ कही न जाय ।
पायल घुँघरू सजि रहे, छुम छुम शब्द सुनाय ५२
उठ आतुर चरणन परे, चरणदास तेहि वार ।
कृष्ण भुजनभर हियलगा, कियो प्रेम अति प्यार ५३
कुँवरि किशोरी करि कृपा, प्रेम मंजरी जान ।
हस्तकमल मस्तक धरो, दियो प्रेम वरदान ५४
पुनि दोऊ प्रीतम प्रिया, चरणदास लै संग ।
जाय विराजे कुंज में, हिलमिल हर्ष उमंग ५५
हँसिहँसि रसबतियांकरन, लागे श्याम सुजान ।
चतुर शिरोमणि लाड़िली, नागरि नेह निधान ५६
कहनलगे मुख मृदुवचन, आये प्रीति पिछान ।
कहा करें तुम पहुनई, अरु सेवा सन्मान ५७
चरणदास दोउ जोरकर, या विधि बोले बैन ।
सेवादे निज पद कमल, निकट रखो दिन रैन ५८
हँसि बोले तब श्रीहरि, मधुर वचन अभिराम ।
जगमें भेजे जिस लिये, सो न किये कुछ काम ५६