भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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माधुरी रसामृत को रसिकन को प्यावनी ॥ १२ ॥
गृहस्थ अरु विरक्त वानप्रस्थ संन्यस्तहू की जुदी जुदी
रहनि गहनि जुक्ति कर जनाई है । आश्रम अरु वर्ण धर्म
शास्त्रनमें सकल कहे उनहूकी करनरीति उत्तम बताई है ॥
ऊँच नीच कर्मनके फलन की अनेकगति जैसी प्राप्तहोत तैसी
खोलकर दिखाई है । कहे सरसमाधुरी रहस्यभरी बानी यह वांचें
जो ग्रन्थ तिन्ह सुगम जानपाई है ॥ १३ ॥
ज्ञाताज्ञेय ज्ञानअरु ध्याता ध्येय ध्यानहू की त्रिपुटी के मिटे
शुद्ध आत्माबताई है । क्षर और अक्षर निहअक्षर बखान किये अक्ष-
रातीतरीत बानीमें गाई है॥ पदस्थ पिंडस्थ रूपस्थ रूपातीत ध्यान
शून्य में समावन की बात समझाई है । परमहै प्रकाशमान पटतर
नहि होत भान परमतत्त्वकी पिछान सरस कहिसुनाई है ॥१४॥
सतयुग अरु त्रेता पुनि द्वापर कलियुग कराल तिनहूं की
रहनि गहनि रीति सर्व गाई है । जैसी करे करनी ताहि तैसीही
भरनी है टरनी है नाहिं यही दृढ़कर दरसाई है ॥ जीतन जम-
राज काल काटन को गाया जाल श्रीहरिगुन गान रीति ग्रन्थमें
बताई है । कहे सरसमाधुरी सुसाज बाज सहित भजन करे
ताहि मिलें आय राधिका कन्हाई है ॥ १५ ॥
सर्व से सुलभ कलिबीच सार कीरतन है याहीको करके
कह्यो हरिको रिझावना । जोग जग्य ज्ञान ध्यान तीरथ के
न्हानहूते उत्तम है यही सही केवल गुण गावना ॥ भजन के
कियेते भवसागर तरजात तुरत निश्चय कर याहीतें परम धाम
पावना । कहे सरसमाधुरी सु सेवाकर दम्पति की छवि में नित
छके छुटे आवन अरु जावना ॥ १६ ॥
इति ॥