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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

६२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
देही दिव्य रूप धरि रहिया । सुन्दर एक विमान जु लहिया ॥
रतन जड़े घर माहिं बिराजैं । आठो सिद्धि खड़ी छबि छाजैं ॥
शील बरत में सांची नारी । पति की आज्ञा कबहुँ न टारी ॥
तिरदेवा सूं अपने पति कूं । अधिक जानती है वह हित सूं ॥
परपति के वह जाय न नीरा । सबकूं जानै बाप अरु बीरा ॥
अन्यपुरुष के छुवे न मोती । अपने पति की पहिरे पोती ॥
तिरलोकी जाकूं सिरनावै । जहां तहां वह अस्तुति पावै ॥
स्वर्ग माहिं सुख लेने वारी । शुभ लक्षण सब बात सँवारी ॥
पति के संग लगीही रहै । काहू से पिया की नहि कहै ॥
दुख विपता में संग नहि छाड़ैं । अपने पतिही सूं हितमांडै ॥
बुरा भला पति कूं नहिं जानै । हरिही की सम ताहि पिछानै ॥
बुरी भली आज्ञा जो करै । सबही माने नैक न टरै ॥
कोढ़ी अँधरा जो पति वाका । चितसूँ सेवन करै जो ताका ॥
पुरुष मरै जावै जग सेती । वाके संग जलै कर हेती ॥
पति कूँ कष्ट होय दुख मानै । वाका सभी आपना जानै॥२३॥
दोहा ॥
शुभकर्मी भर्ता भवै, कै षट कर्म करै ॥
मान भंग नहीं करै, सेवा चित्त धरै ॥ २४ ॥
चौपाई ॥
भर्ता पुन्य करै सुख मानै । पाप करै जब दुख हिये आनै ॥
ऐसे कर्म करै। जो नारी । पति समेत जा स्वर्ग मंझारी ॥
इन्द्रलोक में जाय बिराजै । सहस चौकड़ी लों वहाँ राजै ॥
रतन जड़े भूषन रहें पहिरें । मुतियन के हिये हार जुलहरैं ॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गवर्णनो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६२६
नासकेतउवाच ॥ दोहा ॥
ब्रह्मभोज जो देत हैं, जज्ञ करें चितलाय ।
और तपस्या करत हैं, अपने तनको ताय ॥ १ ॥
चौपाई ॥
जेठ मास पंच अगनी तापैं । चार ओरही पावक आपैं ॥
पँचवीं अगन सीसपर आना । यह पँच अगनी लेह पिछाना ॥
पूस माह में ऐसे धारे । सहस धार के लेने वारे ॥
टिगटी पर मटका धरवावैं । सहस छेद तामें करवावैं ॥
जल भरवा तल बैठें सोई । ऐसा कष्ट करै जो कोई ॥
सो वे रतन जड़े घर पावैं । सोमलोक में बहु हुलसावैं ॥२॥
दोहा ॥
सोनेका जो दान दे, सूरलोक कूं जाय ।
अरु कपड़े का जो करैं, वाही लोक रहाय ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
आसोज अरु कातिक जब आवैं । तिनमें विप्रन कूं भुगतावैं ॥
खीर खांड भोजन करवावैं । साध ब्राह्मण नोत जिमावैं ॥
दक्षिणा दे टीका जब काढैं । वाका धर्म अधिकही बाढैं ॥
पौह माहं दे लकड़ी दाना । बहु बिधदेह जडावल नाना ॥
बैशाख चैत ऐसा जिन कीया । अन्नदान मंगतों कूं दीया ॥
जेठ साढ़ जिन पानी प्याये । गोरस दान दिये मनभाये ॥
ते जिय जावैं स्वर्ग मंझारी । आनन्द पावैं अधिक अपारी ॥
दानदिये फल आगे आवैं । नाना भोगकरैं सुख पावैं ॥
जिन पति संग जलाई काया । याहूका फल अधिक बताया ॥
साठ किरोड़ बरष वह नारी । रहै सुरके लोक मंझारी ॥
सो वह दिव मारग कँ पावै । पति सूँ कर जोरे ही जाव ॥
२

६३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शुभ मग माहीं वृक्ष घनेही । सूरज तुल्य बिमान बनेही ॥
नदियां दूध सहत दधिघीकी । अरु मीठे जलही की नीकी ॥४॥
दोहा ॥
जहां पटंबर बादले, अरु वसनन की छांहिं ।
सूरज ही के लोककूँ, ह्यां होकर वे जाहिं ॥ ५ ॥
चौपाई ॥
जो सूरज के सेवक जानौं । सूरही लोक बसत मन आनौं ॥
सुखदाई जानौं वह लोका । जहां बसै कुछ रहै न शोका ॥
अरु बाजों के शब्द जहां है । गन्ध्रव लाखों रहत तहां है ॥
वस्तर भूपन पहिरै आवैं । गावैं नाचैं ताहि रिझावैं ॥६॥
दोहा ॥
जो सेवक महादेवके, पहुंचै वाके लोक ।
सुख सेती जहां रहत है, निर्भै अधिक असोक ॥ ७ ॥
चौपाई ॥
पर कन्या का ब्याह रचावैं । परमारथ के हेत करावैं ॥
विप्पर बालक देह जनेऊ । ऐसे कारज मैं चित देऊ ॥
अरु कोई ऐसा कारज आवै । परकारज को उठ उठ धावै ॥
स्वर्गलोक पावत है सोई । भावैं नर नारी क्यों न होई ॥
बिना दान शिवलोक न पावै । धरमहीन कैसे कर जावै ॥
रतन जड़े नाना छवि वाकी । सब शोभा वरनुं कहा जाकी ॥
जो ब्रह्मा के सेवक होई । वाके लोक बसत है सोई ॥
आनंद करै महा सुख पावै । ब्रह्मलोक को जो कोइजावै ॥
जो ब्राह्मण अपना धर्म राखै । करै सुकर्म झूठ नहिं भाखै ॥
वेदपाठ साधै षट करमन । संध्या गायत्री अरु तरपन ॥
ऋतुवन्ती नारी पै जावै । और दिना चित नाहिं लगावै ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६३१
सब मनुष्यों से हित कर बोलैं । निंदा त्याग भली मुखखोलै ॥
शील दया हिरदै में धारैं । सो ब्रह्मा के लोक पधारैं ॥८॥
दोहा ॥
ज्यों क्षत्री धर्म आपने, सावधान जो होय ।
बस्ती की रक्षा करै, लोग दुखी नहिं कोय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
अपना अंश बांट कर लेवै । साध ब्राह्मण गऊ जु सेवै ॥
साधन की सेवा चित धरै । रनमें जूझै सनमुख मरै ॥
सोवै स्वर्गलोक कूं जावैं । भोगैं भोग बहुत सुख पावैं ॥
वैश्य शीलजुत गऊ चरावैं । साध ब्राह्मण कूं सिरनावैं ॥
बोलैं सांच बणज के माहीं । सत व्योपार झूठ कछु नाहीं ॥
शूदर अपने धर्म मंझारी । सांचे दयावन्त उपकारी ॥
सेवक गऊ बिरामन केरा । अपने गुरुका मनसों चेरा ॥
कोइ अतीत और गुरुभाई । सेवा कर बहुत चितलाई ॥
ऐसे चार बरन जो लेखे । चढ़े विमान जात मैं देखे ॥
और जिन्होंने लक्ष्मी धाई । लोक कामना पहुँचै जाई ॥१०॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने स्वर्गवर्णनोनाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
नासकेत उवाच ॥ चौपाई ॥
जिस जिस देवतकूं कोई धावैं । ताके लोकमाहिं वह जावैं ॥
ठाकुर का कोई भक्ता लसैं । वाके लोकमाहिं जा बसैं ॥
करै विनोद महासुख भारी । कै हो पुरुष और कै नारी ॥
दियाजिन्हों दधि दूध मिठाई । भोजन दिये महा सुखदाई ॥
दिया घीव रस सोना रूपा । छायाकरी हरी जिन धूपा ॥
मोती माणक गुली कपूरा । दिये दान जिन बस्तर पूरा ॥
बहुबिध दान करैं जो केता । तीरथ बर्त करें अरु जेता ॥

६३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जाका फल मनमें नहिं धरै। सब ठाकुर कूं अरपन करै ॥
दान करै हरि के हित बोवै। सो बैकुंठ परापति होवै ॥
तातें अपनो भला करीजै। धर्मपंथ में सदा रहीजै।
गुरू ब्राह्मण कूं जो मानै। जो गृहस्थ कूं बेद बखानै ॥
जो गृहस्थ के साधू आवै। देखत उठकै सीस नवावै ॥
आदर आसन दे बैठारै। मुखसूं मीठे बचन उचारै ॥
जथाशक्त भोजन करवावै। कंदमूल जैसा घर पावै ॥
जिन साधोंका सेवन चीन्हा। देवत पित्तर पूजन कीन्हा ॥
साध समान जगत के माहीं। और धरम कोइ दीखै नाहीं ॥
जिनकी अस्तुति राम बखानी। बेद पुरानन में हो जानी ॥१॥
दोहा ॥
एक समय धरमराय सब, लीने दूत बुलाय ।
कहा कि तिरलोकी बिषै, हरिजन हैं अधिकाय ॥ २ ॥
चौपाई॥
एक बात यह जाने रहियो। मेरा कहा जो नीकै लहियो ॥
साधुरूप कूं ऐसे जानो। हरिकी देह मिले पहिचाहो ॥
वे तो हैं परमेश्वर प्यारे। रहैं रामका बाना धारे ॥
जिनके दरशन पातक नासै। जनम मरनकी छूटैं गासैं ॥
किरपा कर निज भेद बतावैं। चौथेपद आनन्द दरसावैं ॥
ऐसे साधन कूं कहिं देखो। हरिसम जिनको जान बिसेखो ॥
साध बसैं जहां तुम मत जइयो। उनके सेवक कूं मत गहियो ॥
और साध जां जिस घरमाहीं। ह्वांभी तुमकूँ जाना नाहीं ॥३॥
दोहा ॥
साधन की सेवा करें, अरु चरणामृत लेह ।
तिनके भी मत जाइयो, जिनसे उनका नेह ॥ ४ ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६३३
चौपाई ॥
और गिरस्ती ठाकुर सेवैं । माला फेर नाम हरि लेवैं ॥
राखैं बरत जागरण करैं । संध्यासमै आरती सरैं ॥
भोग लगाकर भोजन खावैं । और सन्तों को सीस नवावैं ॥
जिनके घर तुम कभी न जावो । अपनीसूरतनाहिंदिखावो ॥५॥
दोहा ॥
परमेश्वर के पारषद । उनकूं लेने जाहिं ।
तुमतो भूल न जाइयो, याद रखो मन माहिं ॥ ६
विष्णुभक्ति परभावकूं, अरु साधन की बात ।
चित्रगुप्त भी ना लखै, न्याव नहीं उन हाथ ॥७॥
चौपाई ॥
अरु इक नदी स्वर्ग के मांहीं । नाम पुहपका अधिक सुहाई ॥
सिध गंध्रब तानिकट बिराजै । देवत अरु धर्मातम राजै ॥
पुण्य बढ़त है नहाने सेती । तामें है सोने की रेती ॥
शंख पद्म ता माहिं भरेही । पुहुप भरे जहां वृक्ष खरेही ॥
दूध सुधासा जल है ताकै । ढेर मणों का कूल जुवाकै ॥
सूरज किरणों से अति दमकै । चन्द चांदनी सों वे चमकै ॥८॥
दोहा ॥
वाके तट इक बाग है, सुखका दैन सुथान ।
पवन सुगन्धी लिये जहां, बहत रहत सामान ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
देखे तहां बिलास ही करते । बहुतभांति कर सुखही धरते ॥
भूख प्यास जाड़ा नहिं गर्मी । सदा निरोग रहें वहां धरमी ॥
बूढ़ा बाला ज्वान न दरसै । दुखकलेश हां कछू न परसै ॥
कष्ट तपस्या जो जग करई । भय अरु दुख वह कंहूं न भरई ॥

६३४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
करैं किलोल हरष सुख पावैं । चरणदास जो स्वर्ग ही जावैं ॥
अरु पतिवर्ता फल बहु भोगे । संग पुरुष के जोगा जोगे ॥
इच्छा करत भोग जो आव । कहां लग कहूं बहुत सुखपावै ॥
पतिव्रता बहु नैन निहारी । शुभकर्मों के करने वारी ॥
अरु जो हैं विभिचारन नारी । उनपर विपत्ता देखी भारी ॥
जिनहूं की मैं कहूं सुनाई । दुराचारनी पति दुखदाई ॥१०॥
दोहा ॥
खोटा चित खोटे करम, पुरुष पराये साथ ।
चौरन जारन है घनी, जिनकी सुनों जो बात ॥११॥
चौपाई ॥
कलह सुहावै अति कंकाली । मैले मनकी अति जंजाली ॥
अपने पति कूं दोष लगावै । आन पुरुष सों चित मिलावै ॥
जलती रहै हिये के माहीं । या जगमें जस नेकहु नाहीं ॥
जब वह मरै पकड़ जम लेजाँ । उनकूं देह नरक दारुण माँ ॥
चौरासी वर्ष क्रोड जु ताहीं । हांसू तिन्हें निकासें नाहीं ॥
अष्ट धात के पुरुष बनाये । पावक सम वै अधिक तपाये ॥
जम कहै इनके संग मिलोही । जार तुम्हारे गलै लगोही ॥
मार मार कैही लपटावैं । जलते त्राह कहैं दुखपावैं ॥
अरु जो पापी नर हाँ जावैं । जम आज्ञा बहु पीड़ा पावै ॥
अरु जम यों कहैं पापी लोगो । खोटे कर्म किये अब भोगो ॥
रे मूरख ऐसा तन पाया । सो तुम पापहि माहिं गंवाया ॥
एक जनम के सुख के काजा । एककल्प भुगतौ नर्क साजा १२
दोहा ॥
बहुत दिनों तन ना रहै, जानत है सब कोय ।
पाप गाँठ बांधै घने, ये अपराधी लोय ॥ १३ ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६३५
कलह लड़ाई करत हैं, औरनकूं दुख देत ।
ह्यां भी वे दुख पावहीं, नरकमाहिं दुख लेत ॥१४॥
पापी जीवन कूं कहैं, किंकर मारहिं मार ।
करम भौम दुर्लभ महा, जनम न बारंबार ॥१५॥
बोये ना शुभ करमहीं, अब लुनते सुख भोग ।
तें कीने खोटे करम, बड़ा लगाया रोग ॥१६॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने विष्णुभक्तिप्रभाववर्णनोनाम पंचदशोऽध्यायः ॥१५॥
नासकेत उवाच ॥
चौपाई ॥
स्वर्ग लोक इक और अनूठा । सो वह मृत्युलोक में डीठा ॥
वह भी बड़भागन सूं पावै । हरिकिरपा पुन्यसे बनआवै ॥१॥
दोहा ॥
अचरज मनुषा देहकूं, स्वर्ग लोकही जान ।
तामें आये होत है, परमेश्वर पहिचान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
ऐसा स्वर्ग लोक नहिं दूजा । तामें आकै सब कुछ सूझा ॥
तामें भोगे भोग अपारा । तामें दीखै अति गुलजारा ॥
मूरख याका भेद न पाया । तामें सब ब्रह्माण्ड समाया ॥
तामें पावै ब्रह्म विचारै । तामें आकै तत्त्व निहारै ॥
जाके दीखै दस दरवाजे । तामें अनहद बाजे बाजे ॥
करम धरम बहुते तप कीन्हा । ताते हरिने नरतन दीना ॥
ऐसा पाया स्वर्ग गँवावैं । कलप कलप बहुते पछतावैं ॥
जो कोई ह्याँ सूं गिरजावैं । मनुषादेह बहुर नहिं पावैं ॥३॥
दोहा ॥
मनुषा देह अनूप की, कही चरनही 'दास ।

६३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और बात अब कहतहूँ, लहै स्वर्ग में बास ॥ ४ ॥
नारी जनक बिदेह की, जाका बहुत विचार ।
सूक्ष्म करि बर्णन करूं, ताकूं हिये में धार ॥ ५ ॥
तन तजकै स्वर्गहि गई, मुँदगये जमपुर द्वार ।
जो कोई मूये तादिना, सबकूँ ले गई लार ॥ ६ ॥
आगे पीछे भोर लों, और साँझ लग जान ।
सबै जीव सुरपुर गये, यह तू निहचै मान ॥ ७ ॥
सुनों ऋषीश्वर कहतहूं, बड़ा अचम्भा जोर ।
सभा धरमही रायकी, मैं भी था वह ठौर ॥ ८ ॥
बैठक धर्महि राय की, तामें सभा सुजान ।
जहाँ ऋषि बैठे गुण भरे, तिनकूं निर्मल ज्ञान ॥ ६ ॥
धरमराय बैठा दिपै, ज्यों तारों में चन्द ।
जहां ब्रह्मसुत आइया, नारद सुखका कन्द ॥ १० ॥
चौपाई ॥
बारह रविसम तेज उसीका । धरमराय किया भाव जिसीका॥
धरमराय लखि उठिकै धाया । कर प्रणाम आसन बैठाया ॥
अरघपाद करि पूजन कीया । हाथ जोड़ बोलन फिर लीया ॥
हे ब्रह्मसुत हे ऋषिराये । हे बुधवान भले तुम आये ॥
आज सुफलभया जनमह्मारा । भगवत किरपा भई अपारा ॥
तुमसे ऋषि का दर्शन पाया । बड़े भाग जागे सुख छाया ॥
यह सुन नारद मुनजी बोले । बचन प्रीतके मुखसों खोले ॥
नारद उवाच
मोकूं तुम दरशन की इच्छा । अरुकछू पूछन आयो सिच्छा ॥११॥
दोहा ॥
तुम सब लायक जोग हो, हे राजा धर्मराय ।

नासकेतलीलावर्णन । ६३७
धरम कहा अधरम कहा, मोकूं देहु बताय ॥ १२ ॥
सोरठा ॥
और कहो तुम मोहि, आश्रम चारों के धरम ।
सबै ज्ञान है तोहि, यह मेटो मेरो भरम ॥१३॥
नासकेत उवाच ॥
यौं नारद जी कहत थे, जम सेती यह बात ।
इतने ही में दीखिया, बहुत बिमान जु आत ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
अरु बाजे बहु बाजत आवैं। करती नृत्य अप्सरा धावैं ॥
मुरली शंख पखावज भेरा। हाथी घोड़े शब्द घनेरा ॥
ऐरावत पर इन्दर राजा। छाई थाली ये सब साजा ॥
उसही समैं बायु की नाईं। लखि जमराज छिपाघरमाहीं ॥
मुनीं समेत तेजस्वी राजा। और दूत भय सूँ गये भाजा ॥
अरु उसके गण भी कहीं भागे। जो कोई रहे सो छिपने लागे ॥
मोकूँ बड़ा अचंभा भया। खड़ा होय कर देखत रहा ॥
वाही समैं जु रथ हां आये। मानों पुंज अग्नि के धाये ॥
उनसूं उड़ै पतंगे ऐसे। छूटैं तारे नभ में जैसे ॥
ऐसा ठाठ वहां कर गया। धरमराय फिर अस्थिर भया ॥१५॥
दोहा ॥
आ बैठा भय भीत सा, डरता सा मन मांहिं।
पीछे से देखन लगो, तेज धरै वै जांहि ॥ १६ ॥
नारद उवाच ॥
कौतिक विष्णु समानही, ऐसे हो महाराज ।
यक्ष राक्षस के भूप तुम, तीन लोक तो राज ॥ १७ ॥

६३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़ा अचंभा मो भया, डर भागे किस काज ।
बाय बेग ज्यों उठ गये, कारन कहिए आज ॥ १८ ॥
फिर बहुरे तुम आपही, आसन बैठे आय ।
सांच कहो संक्षेप से, मोकूं देहु, सुनाय ॥ १९ ॥
जम उवाच ॥
हे मुनि महा जु श्रेष्ठ हो, कहूं सु तू सुन लेह ।
छिपी बात है एक यह, सावधान चित देह ॥ २० ॥
चौपाई ॥
पुन्य बिचार संपूरन तामें । सुनों प्रीतसों कहूं कथा में ॥
है मुनि मृत्यु लोक के मांहीं । श्रीमान महाराजा हांहीं ॥
सांच बचन का बोलन वारा । जिसका नांव जनक उजियारा ॥
अश्वमेध जगका कर्त्ता जानों । सत्यधर्म में डिढ पहिचानों ॥
छिमां दया अरुशील सहितहै । हरिकी सेवा करत रहत है ॥
ज्ञानवन्त शीतल सुखदाई । क्रोध लोभ बिन रहत सदाई ॥
वेद अर्थ का जानन हारा । नीति धरम का है रखवारा ॥
अपनी परजा कूं सुख देवै । एक एक की सुधही लेवै ॥२१॥
दोहा ॥
जैसे माली बाग की, सुध कूं भूलै नाहिं ।
ऐसे अपनी सृष्टि कूं, राखै हृद्या माहिं ॥ २२ ॥
चौपाई ॥
दूधभरी गऊ दान करत है । रंकन का बहु दुःख हरत है ॥
खेती सहित भूमि का दाना । विप्रन कूं देकर सनमाना ॥
बड़ी उमर की परजा सारी । नीति धर्म सब करै संभारी ॥
ऐसा महाराजा अनुरागी । जाका नांव जनक बड़भागी ॥
जाकी नार सतवंती नामा । जिसके भये संपूरन कामा ॥

नांसकेतलीलावर्णन । ६३६
सभी लक्षनों सहित बिराजै । सब धर्मों कूं लीयें राजै ॥
पतिवर्ता अरु पति की प्यारी । सदा पिया की आज्ञाकारी ॥
भरताही की भक्ति करेवा । भरताही जिसका है देवा ॥२३॥
दोहा ॥
स्वामी के दुखसे दुखी, स्वामी के सुख सोय ।
स्वामी के रंग में रंगी, और नेह सब खोय ॥२४॥
चौपाई ॥
जब भरता के दरशन करै । पियाकी अस्तुति कर मनभरे ॥
भरता क्रोधकरै जब वापै । मीठे बचन कहै वह तापै ॥
भरता अरु सब कुटुंब जिमावै । पाछे बचा आपहूं खावै ॥
ऐसे और बहुत गुनवंती । तिरियन में अधिकी सतवंती ॥
पतिवर्ता मैं जान बड़ीही । जाती स्वर्ग विमान चढ़ींही ॥
इन्दर सहित देव बहु साथा । सभी नवावें जाकूं माथा ॥
बाजे बजत बहुत परकारा । गंध्रब गावत राग विचारा ॥२५॥
दोहा ॥
चाहै जा अमरावती, चाहै जा ब्रह्मलोक ।
चाहै जावै शिवपुरी, किये पुण्यके थोक ॥२६॥
चौपाई ॥
आनन्द भरता सहित जुपावै । चढ़ी विमानों ऊपर जावै ॥
वाका तेज अचानक आया । हो भयभीत भाज मैं गया ॥
घर में गया छिपा पहिचानौ । दूत भजे सो भी तुम जानौ ॥
बातोंही के करने मांहीं । दूत गए सो आये हांहीं ॥
सुनके नारद बहु हुलसाया । पतिवर्ता का उत्तर पाया ॥
अरु फिर नारद पूछन लागे । सूरज पुत्तर सुनो सुभागे ॥

६४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भानु तेजसा तन है तेरा । ताये सोने कासा हेरा ॥
देह तुम्हारी गौरी सुहनी । मुख सांवरा कारन कौनी ॥
याका भी मोहिं, उत्तर दीजे । कहो भेद अरु किरपा कीजे ॥
धरमराय बोले मुसकाई । छिपी बात यह है ऋषिराई ॥
मेरेही हिरदै में रही । अबलग काहू से नहिं कही ॥
ब्रह्मसुत अब तोसं भाखूं । याका भेद कछू नहिं राखूं ॥
जिन मनुषौ तप दान किया है । निहचै हरिका नाम लिया है २७
दोहा ॥
अरु इन्द्रीमन वश किया, कियो योगही ध्यान ।
हरिगुण गाये भक्ति करि, आराधे भगवान ॥२८॥
चौपाई ॥ ६
गुरुके भक्त साध संग कीन्हा । हरिजन सेवनका व्रत लीन्हा ॥
क्षमां शील अरु दया विचारी । सतवादी भये नर क्या नारी ॥
तीरथ करके फल नहिं चाहा । हरिकी भक्ति करनका लाहा ॥
दुख सुख एक बराबर जानै । सत संतोष सदा हिय आनै ॥
पांच यज्ञ कर हरिकूं अरपैं । फल नहिं चाहैं आपन थरप ॥
कौन कौन यज्ञ सो बतलाऊं । जुदे जुदे कर सब दिखलाऊं ॥
मावस अरु संक्रायत जानों । व्यतीपात द्वादशी मानों ॥
और पांचवें पूरनवासी । देवैं दान रहैं निरबासी ॥
अरु पच अगनी तपैं निराशा । तपही की पूंजीजिनपासा॥२६॥
दोहा ॥
प्रेम भक्ति निहकाम जो, करैं अनन्यही भाय ।
तन मन हरिके ध्यानमें, राखैं चित्त लगाय ॥३०॥
चौपाई ॥
ऐसे साध संत जो आवैं । पुरी पास हो आगे जावैं ॥

तिनकूं देखूं नयन निहारा। जिनके तेज श्याम मुखम्हारा ॥
पहिरे रहूं कवच तनमाहीं। ताकूँ आँच लगत है नाहीं ॥
नारद यह सुन निहचै कीजे। यही बात हिरदै धर लीजे ॥
धरमराय अरु नारद मुनी। दोनों की हम चित दे सुनी ॥
स्वरग नरक को सबही गाथा। तुमसों कही खोल ये बाता ॥
देखी नासकेत 'नहीं राखी। नैन निहारी सगरी भाखी ॥३१॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमनारदसंवादोनामषोडशोऽध्यायः॥ १६ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
और बात इक जगत में, है परसिद्ध लहूं।
देखी अपने नैनही, सोभी सुनो कहूं ॥ १ ॥
जो पापी जीवों किये, पिछले करम अघाय।
जनम पाय जा जगत में, सोई भुगतैं आयें ॥ २ ॥
चौपाई ॥
हत गऊवां पातक कियो भारी। बिषदे मनुष मारहू डारी ॥
अपने गुरुके घरके माहीं। देखें खोटी दिष्टबुराई ॥
सो निषिद्ध काया धर आवैं। ह्वाँ चंडाल जोनही पावैं ॥
मारै राह झूठ बहु बोलें। सो रोगी हो जग में डोलैं ॥
जो सोना जगमाहिं चुरावैं। जनम पाय कुष्ठी होजावैं ॥
जो मदिरा पी भये मतवाले। जिनके दांत हुये नखकारे ॥
ब्राह्मण पुस्तक पढ़न बिचारा। पावै जनम नागही कारा ॥
और जिन पाप जानकर कीन्हा। वाहू जनम सर्पकालीन्हा ॥३॥
दोहा ॥
जो कन्या कूं हनत है, कै बाहिर कै गेह।
जनम पायहैं जगत में, होय गधे की देह ॥ ४ ॥

६४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
विष्पर भिष्टल मांस अहारी । देत दान जिनकूँ ग्रहचारी ॥
दोनों गीदड़ को तन पावैं । नासकेत यह खोल दिखावैं ॥
जो नर परतिरिया कूँ ताकै । पावै जनम सुवर को आकै ॥
जो नारी पर पुरुष लुभानी । सो वे 'सुरी होती जानी ॥
अरु जो दान करत कोई रोकै । पीठ लदै वहं घोड़ा होकै ॥
झूठा कर ब्राह्मणकूँ देवै । सोतो जनम बाज का लेवै ॥
जो कोई धरी धरोहर नाटै । अरु पक्षी के पर जो काटै ॥
सो बिष्ठाके कीड़े जानों । उनको पापी अधिक पिछानों ॥
काहूं के जो बसन चुरावैं । सो वे नर धोबी हो आवैं ॥
और जिन मोती रतन चुराया । अपना खाविंद मार गँवाया ॥
सो होवें पत्थर के कीड़ा । निहचै पावैं किरम शरीरा ॥५॥
दोहा ॥
सब बिध देवे जोग हो, नहीं देत वै दान ।
मनै करै जो और दे, बागल हो जग आन ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
जो कुदिष्ट आँखन सूं देखै । अंधे काने होत बसेखै ॥
झूठा बाद विवाद बढ़ावै । सो कछुवे की काया पावै ॥
जो कोई परका दरब चुरावै । सोतो जन्म इह्व हो आवै ॥
इह्व देह तज बन्दर होवै । जनम अकारथ निहचै खोव ॥
जो कोई बेटी होती मारै । सो घिरघिट की काया धारै ॥
जो काहू का सूत मुसावै । होय न्हारू बहु दुख पावै ॥
गुली कपूर कपास चुरावै । सो मकड़ी की देही पावै ॥
जो काहू की चौरै पनहीं । जनमलेत चकचूंधर तनहीं ॥७॥

नासकेतलीलावर्णन । · ६४३
दोहा ॥
जिन काहू के फल चुरा, मानी नाहीं संक ।
ते नर हाथी होयकर, सिरमें खावैं अंक ॥ ८ ॥
गुरू ब्राह्मण का लिया, जानें अंस चुराय ।
काला होवै सरपही, मारूदेश में जाय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
विप्र साध पैरों जिन मारै । जनमत पिंगल भये विचारै ॥
जो ब्राह्मण कूँ मदिरा प्यावै । कूकर जौन सोई हो आवै ॥
जो काहू का अन्न चुरावै । होवे बहिरा सुना न जावै ॥
काहू से कीन्ही दुष्टाई । वे तो मृग होवैं बन जाई ॥
आप गुरू हो गुरू न कीन्हा । सो बिलाव होता हम चीन्हा ॥
वृक्ष काट जो फूल चुरावैं । जौन पपीहा की वे पावैं ॥
नितप्रत क्रोध नहीं · हरषावैं । सो वे जौन न्योल हो धावैं ॥
जो काहू की निन्दा करैं । जौन कोकिला की वे धरैं ॥१०॥
दोहा ॥

६४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्ञान सीख गुरूसूं फिरजावै । सो शरीर कोढ़ी को पावै ॥ १२॥
दोहा ॥
खोटे कर्मन सूं सबै, चौरासी में जाहिं ।
कहां लों गिनती मैं करूं, समझ देखि मनमाहिं ॥१३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने कर्मानुसारयोनिप्राप्तिवर्णनं नाम
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
नासकेतउवाच ॥ चौपाई ॥
जिन मनुषों शंकर नहिं माना । ब्रह्मा का पूजन नहिं ठाना ॥
विष्णु भक्ति में मन नहिं दीन्हा । गुरुसेवा का नेम न लीन्हा ॥
साधों की सेवा नहिं जानी । तीरथ किये न परब पिछानी ॥
गुरुका कबहूं नाम न लीया । कबहूं पापी होम न कीया ॥
परमेश्वर का जप नहिं साधा । योग जुगत नाहीं आराधा ॥
पांचों इन्द्री बस नहिं कीन्हीं । भली वस्तु काहू नहिं दीन्हीं ॥
कथा कीरतन में नहिं गया । हरि सों बेमुख दुष्टी भया ॥
जिन नर ऐसी चाल बिसारी । सो डूवत है नरक मँझारी ॥१॥
दोहा ॥
जिन पूजे हैं देवता, होम यज्ञ कर दान ।
नासकेत देखी कहै, स्वर्ग लहैं वह जान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
धरमराय जब पकड़ बुलावै । पाप पुण्य का न्याव चुकावै ॥
पापी पठवै नरक मँझारी । पुण्यी पठवै स्वर्ग मँझारी ॥
पाप पुण्य क्षीण होजावैं । फिर वह मृत्युलोक में आवैं ॥
पापी देह निषद जो पावैं । पुण्यी मनुष होय हुलसावैं ॥
धनवन्ते उत्तम घर जनमैं । भले भले लक्षण आवैं तिनमें ॥
अरु जो चौरासी सूं कढ़ैं । मनुष देह धर ऊचे चढ़ैं ॥

नासकेतलीलावर्णन । ६४५
खोटे लक्षै तिनके माहीं । चरनदास कहैं निहचै आई ॥
जितके जीव जहाईं जाई । यह मत वेद पुराणन गाई ॥
साध संगत कोई उतरै पारा । और चौरासी जाहिं मँझारा ॥
सुनि ऋषीश्वर रसमें पागै । धन्य धन्य जब कहने लागे ॥
अस्तुति करि मनमें हरपाये । अपने अपने अस्थल आये ॥३॥
दोहा ॥
नासकेत की यह कथा, संस्कृत्त के माहिं ।
चरनदास ने सो करी, उक्ति आपनी नाहिं ॥४॥
पढ़ा लिखा मैं कुछ नहीं, सतगुरु दीन्हों ज्ञान ।
रणजीता यों कहत है, ताही की पहिचान ॥५॥
कथाजु अधिक सुहावनी, सुनकर उपजै चाव ।
दया धरम हिये आबसै, भाजैं सबै कुभाव ॥ ६ ॥
सुनकर जो रहनी रहै, मनमाहीं गहलेह ।
पाप निकट आवै नहीं, जनम नाहिं दुखदेह ॥७॥
कथा सुनै चितवन करै, समझ धरै मन माहिं ।
पवन नरक की नालगै, पातक सबहिं नसाहिं ॥८॥
सुनकर रहनी ना रहै, चलै न याकी चाल ।
चरनदास यों कहत है, ताहि नरक तत्काल ॥६॥
सुनकर मनलावै नहीं, तामें चित नहिं दै ।
जीवत भिष्टलही रहै, मुये नरक का भै ॥१०॥
जनमेजय की साखही, कहूँ सुनों चितलाय ।
कुष्ठ अठारह ही हुते, सुनकर गये नसाय ॥ ११ ॥
नासकेत ऐसी कथा, जैसा धरम जहाज ।
जनमेजय तापर चढ़ा, कुष्ठ गये सब भाज ॥१२॥
खेवटिया जहाँब्यास से, बचन बाहहीवान ।

६४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जगतसिन्धुसम जानिए, धरम जहाज पिछांत ॥ १३ ॥
यामें जो कोई चढ़ै, सोई उतरै पार ।
रहिजावै अभिमानसूं, सो डूबै मँझधार ॥ १४ ॥
सतगुरु बिन डूब सबी, रामभक्ति नहिं जान ।
सतसंगत आवै नहीं, करके बहु अभिमान ॥ १५ ॥
नासकेत की कथा कूं, कहै सुनै चितलाय ।
पाप तजै अरु पुन्यकरै, बसै स्वर्ग वह जाय ॥ १६ ॥
शुकदेव के परतापसूं, कह्यो नासहीकेत ।
पाप पुण्य के भेदकूं, समझन कारण हेत ॥ १७ ॥
इति श्रीश्यामचरनदासजीकृते नासकेतोपाख्याने शुभाशुभनिर्णय-
वर्णननामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
संपूर्णः ॥

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