भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६३७
धरम कहा अधरम कहा, मोकूं देहु बताय ॥ १२ ॥
सोरठा ॥
और कहो तुम मोहि, आश्रम चारों के धरम ।
सबै ज्ञान है तोहि, यह मेटो मेरो भरम ॥१३॥
नासकेत उवाच ॥
यौं नारद जी कहत थे, जम सेती यह बात ।
इतने ही में दीखिया, बहुत बिमान जु आत ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
अरु बाजे बहु बाजत आवैं। करती नृत्य अप्सरा धावैं ॥
मुरली शंख पखावज भेरा। हाथी घोड़े शब्द घनेरा ॥
ऐरावत पर इन्दर राजा। छाई थाली ये सब साजा ॥
उसही समैं बायु की नाईं। लखि जमराज छिपाघरमाहीं ॥
मुनीं समेत तेजस्वी राजा। और दूत भय सूँ गये भाजा ॥
अरु उसके गण भी कहीं भागे। जो कोई रहे सो छिपने लागे ॥
मोकूँ बड़ा अचंभा भया। खड़ा होय कर देखत रहा ॥
वाही समैं जु रथ हां आये। मानों पुंज अग्नि के धाये ॥
उनसूं उड़ै पतंगे ऐसे। छूटैं तारे नभ में जैसे ॥
ऐसा ठाठ वहां कर गया। धरमराय फिर अस्थिर भया ॥१५॥
दोहा ॥
आ बैठा भय भीत सा, डरता सा मन मांहिं।
पीछे से देखन लगो, तेज धरै वै जांहि ॥ १६ ॥
नारद उवाच ॥
कौतिक विष्णु समानही, ऐसे हो महाराज ।
यक्ष राक्षस के भूप तुम, तीन लोक तो राज ॥ १७ ॥