भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
पृष्ठ 686, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 686
नासकेतलीलावर्णन । · ६४३
दोहा ॥
जिन काहू के फल चुरा, मानी नाहीं संक ।
ते नर हाथी होयकर, सिरमें खावैं अंक ॥ ८ ॥
गुरू ब्राह्मण का लिया, जानें अंस चुराय ।
काला होवै सरपही, मारूदेश में जाय ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
विप्र साध पैरों जिन मारै । जनमत पिंगल भये विचारै ॥
जो ब्राह्मण कूँ मदिरा प्यावै । कूकर जौन सोई हो आवै ॥
जो काहू का अन्न चुरावै । होवे बहिरा सुना न जावै ॥
काहू से कीन्ही दुष्टाई । वे तो मृग होवैं बन जाई ॥
आप गुरू हो गुरू न कीन्हा । सो बिलाव होता हम चीन्हा ॥
वृक्ष काट जो फूल चुरावैं । जौन पपीहा की वे पावैं ॥
नितप्रत क्रोध नहीं · हरषावैं । सो वे जौन न्योल हो धावैं ॥
जो काहू की निन्दा करैं । जौन कोकिला की वे धरैं ॥१०॥
दोहा ॥