भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़ा अचंभा मो भया, डर भागे किस काज ।
बाय बेग ज्यों उठ गये, कारन कहिए आज ॥ १८ ॥
फिर बहुरे तुम आपही, आसन बैठे आय ।
सांच कहो संक्षेप से, मोकूं देहु, सुनाय ॥ १९ ॥
जम उवाच ॥
हे मुनि महा जु श्रेष्ठ हो, कहूं सु तू सुन लेह ।
छिपी बात है एक यह, सावधान चित देह ॥ २० ॥
चौपाई ॥
पुन्य बिचार संपूरन तामें । सुनों प्रीतसों कहूं कथा में ॥
है मुनि मृत्यु लोक के मांहीं । श्रीमान महाराजा हांहीं ॥
सांच बचन का बोलन वारा । जिसका नांव जनक उजियारा ॥
अश्वमेध जगका कर्त्ता जानों । सत्यधर्म में डिढ पहिचानों ॥
छिमां दया अरुशील सहितहै । हरिकी सेवा करत रहत है ॥
ज्ञानवन्त शीतल सुखदाई । क्रोध लोभ बिन रहत सदाई ॥
वेद अर्थ का जानन हारा । नीति धरम का है रखवारा ॥
अपनी परजा कूं सुख देवै । एक एक की सुधही लेवै ॥२१॥
दोहा ॥
जैसे माली बाग की, सुध कूं भूलै नाहिं ।
ऐसे अपनी सृष्टि कूं, राखै हृद्या माहिं ॥ २२ ॥
चौपाई ॥
दूधभरी गऊ दान करत है । रंकन का बहु दुःख हरत है ॥
खेती सहित भूमि का दाना । विप्रन कूं देकर सनमाना ॥
बड़ी उमर की परजा सारी । नीति धर्म सब करै संभारी ॥
ऐसा महाराजा अनुरागी । जाका नांव जनक बड़भागी ॥
जाकी नार सतवंती नामा । जिसके भये संपूरन कामा ॥