भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 685, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें६४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
विष्पर भिष्टल मांस अहारी । देत दान जिनकूँ ग्रहचारी ॥
दोनों गीदड़ को तन पावैं । नासकेत यह खोल दिखावैं ॥
जो नर परतिरिया कूँ ताकै । पावै जनम सुवर को आकै ॥
जो नारी पर पुरुष लुभानी । सो वे 'सुरी होती जानी ॥
अरु जो दान करत कोई रोकै । पीठ लदै वहं घोड़ा होकै ॥
झूठा कर ब्राह्मणकूँ देवै । सोतो जनम बाज का लेवै ॥
जो कोई धरी धरोहर नाटै । अरु पक्षी के पर जो काटै ॥
सो बिष्ठाके कीड़े जानों । उनको पापी अधिक पिछानों ॥
काहूं के जो बसन चुरावैं । सो वे नर धोबी हो आवैं ॥
और जिन मोती रतन चुराया । अपना खाविंद मार गँवाया ॥
सो होवें पत्थर के कीड़ा । निहचै पावैं किरम शरीरा ॥५॥
दोहा ॥
सब बिध देवे जोग हो, नहीं देत वै दान ।
मनै करै जो और दे, बागल हो जग आन ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
जो कुदिष्ट आँखन सूं देखै । अंधे काने होत बसेखै ॥
झूठा बाद विवाद बढ़ावै । सो कछुवे की काया पावै ॥
जो कोई परका दरब चुरावै । सोतो जन्म इह्व हो आवै ॥
इह्व देह तज बन्दर होवै । जनम अकारथ निहचै खोव ॥
जो कोई बेटी होती मारै । सो घिरघिट की काया धारै ॥
जो काहू का सूत मुसावै । होय न्हारू बहु दुख पावै ॥
गुली कपूर कपास चुरावै । सो मकड़ी की देही पावै ॥
जो काहू की चौरै पनहीं । जनमलेत चकचूंधर तनहीं ॥७॥