भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
और बात अब कहतहूँ, लहै स्वर्ग में बास ॥ ४ ॥
नारी जनक बिदेह की, जाका बहुत विचार ।
सूक्ष्म करि बर्णन करूं, ताकूं हिये में धार ॥ ५ ॥
तन तजकै स्वर्गहि गई, मुँदगये जमपुर द्वार ।
जो कोई मूये तादिना, सबकूँ ले गई लार ॥ ६ ॥
आगे पीछे भोर लों, और साँझ लग जान ।
सबै जीव सुरपुर गये, यह तू निहचै मान ॥ ७ ॥
सुनों ऋषीश्वर कहतहूं, बड़ा अचम्भा जोर ।
सभा धरमही रायकी, मैं भी था वह ठौर ॥ ८ ॥
बैठक धर्महि राय की, तामें सभा सुजान ।
जहाँ ऋषि बैठे गुण भरे, तिनकूं निर्मल ज्ञान ॥ ६ ॥
धरमराय बैठा दिपै, ज्यों तारों में चन्द ।
जहां ब्रह्मसुत आइया, नारद सुखका कन्द ॥ १० ॥
चौपाई ॥
बारह रविसम तेज उसीका । धरमराय किया भाव जिसीका॥
धरमराय लखि उठिकै धाया । कर प्रणाम आसन बैठाया ॥
अरघपाद करि पूजन कीया । हाथ जोड़ बोलन फिर लीया ॥
हे ब्रह्मसुत हे ऋषिराये । हे बुधवान भले तुम आये ॥
आज सुफलभया जनमह्मारा । भगवत किरपा भई अपारा ॥
तुमसे ऋषि का दर्शन पाया । बड़े भाग जागे सुख छाया ॥
यह सुन नारद मुनजी बोले । बचन प्रीतके मुखसों खोले ॥
नारद उवाच
मोकूं तुम दरशन की इच्छा । अरुकछू पूछन आयो सिच्छा ॥११॥
दोहा ॥
तुम सब लायक जोग हो, हे राजा धर्मराय ।