भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनासकेतलीलावर्णन । ६४५
खोटे लक्षै तिनके माहीं । चरनदास कहैं निहचै आई ॥
जितके जीव जहाईं जाई । यह मत वेद पुराणन गाई ॥
साध संगत कोई उतरै पारा । और चौरासी जाहिं मँझारा ॥
सुनि ऋषीश्वर रसमें पागै । धन्य धन्य जब कहने लागे ॥
अस्तुति करि मनमें हरपाये । अपने अपने अस्थल आये ॥३॥
दोहा ॥
नासकेत की यह कथा, संस्कृत्त के माहिं ।
चरनदास ने सो करी, उक्ति आपनी नाहिं ॥४॥
पढ़ा लिखा मैं कुछ नहीं, सतगुरु दीन्हों ज्ञान ।
रणजीता यों कहत है, ताही की पहिचान ॥५॥
कथाजु अधिक सुहावनी, सुनकर उपजै चाव ।
दया धरम हिये आबसै, भाजैं सबै कुभाव ॥ ६ ॥
सुनकर जो रहनी रहै, मनमाहीं गहलेह ।
पाप निकट आवै नहीं, जनम नाहिं दुखदेह ॥७॥
कथा सुनै चितवन करै, समझ धरै मन माहिं ।
पवन नरक की नालगै, पातक सबहिं नसाहिं ॥८॥
सुनकर रहनी ना रहै, चलै न याकी चाल ।
चरनदास यों कहत है, ताहि नरक तत्काल ॥६॥
सुनकर मनलावै नहीं, तामें चित नहिं दै ।
जीवत भिष्टलही रहै, मुये नरक का भै ॥१०॥
जनमेजय की साखही, कहूँ सुनों चितलाय ।
कुष्ठ अठारह ही हुते, सुनकर गये नसाय ॥ ११ ॥
नासकेत ऐसी कथा, जैसा धरम जहाज ।
जनमेजय तापर चढ़ा, कुष्ठ गये सब भाज ॥१२॥
खेवटिया जहाँब्यास से, बचन बाहहीवान ।