भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्ञान सीख गुरूसूं फिरजावै । सो शरीर कोढ़ी को पावै ॥ १२॥
दोहा ॥
खोटे कर्मन सूं सबै, चौरासी में जाहिं ।
कहां लों गिनती मैं करूं, समझ देखि मनमाहिं ॥१३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने कर्मानुसारयोनिप्राप्तिवर्णनं नाम
सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
नासकेतउवाच ॥ चौपाई ॥
जिन मनुषों शंकर नहिं माना । ब्रह्मा का पूजन नहिं ठाना ॥
विष्णु भक्ति में मन नहिं दीन्हा । गुरुसेवा का नेम न लीन्हा ॥
साधों की सेवा नहिं जानी । तीरथ किये न परब पिछानी ॥
गुरुका कबहूं नाम न लीया । कबहूं पापी होम न कीया ॥
परमेश्वर का जप नहिं साधा । योग जुगत नाहीं आराधा ॥
पांचों इन्द्री बस नहिं कीन्हीं । भली वस्तु काहू नहिं दीन्हीं ॥
कथा कीरतन में नहिं गया । हरि सों बेमुख दुष्टी भया ॥
जिन नर ऐसी चाल बिसारी । सो डूवत है नरक मँझारी ॥१॥
दोहा ॥
जिन पूजे हैं देवता, होम यज्ञ कर दान ।
नासकेत देखी कहै, स्वर्ग लहैं वह जान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
धरमराय जब पकड़ बुलावै । पाप पुण्य का न्याव चुकावै ॥
पापी पठवै नरक मँझारी । पुण्यी पठवै स्वर्ग मँझारी ॥
पाप पुण्य क्षीण होजावैं । फिर वह मृत्युलोक में आवैं ॥
पापी देह निषद जो पावैं । पुण्यी मनुष होय हुलसावैं ॥
धनवन्ते उत्तम घर जनमैं । भले भले लक्षण आवैं तिनमें ॥
अरु जो चौरासी सूं कढ़ैं । मनुष देह धर ऊचे चढ़ैं ॥