भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनांसकेतलीलावर्णन । ६३६
सभी लक्षनों सहित बिराजै । सब धर्मों कूं लीयें राजै ॥
पतिवर्ता अरु पति की प्यारी । सदा पिया की आज्ञाकारी ॥
भरताही की भक्ति करेवा । भरताही जिसका है देवा ॥२३॥
दोहा ॥
स्वामी के दुखसे दुखी, स्वामी के सुख सोय ।
स्वामी के रंग में रंगी, और नेह सब खोय ॥२४॥
चौपाई ॥
जब भरता के दरशन करै । पियाकी अस्तुति कर मनभरे ॥
भरता क्रोधकरै जब वापै । मीठे बचन कहै वह तापै ॥
भरता अरु सब कुटुंब जिमावै । पाछे बचा आपहूं खावै ॥
ऐसे और बहुत गुनवंती । तिरियन में अधिकी सतवंती ॥
पतिवर्ता मैं जान बड़ीही । जाती स्वर्ग विमान चढ़ींही ॥
इन्दर सहित देव बहु साथा । सभी नवावें जाकूं माथा ॥
बाजे बजत बहुत परकारा । गंध्रब गावत राग विचारा ॥२५॥
दोहा ॥
चाहै जा अमरावती, चाहै जा ब्रह्मलोक ।
चाहै जावै शिवपुरी, किये पुण्यके थोक ॥२६॥
चौपाई ॥
आनन्द भरता सहित जुपावै । चढ़ी विमानों ऊपर जावै ॥
वाका तेज अचानक आया । हो भयभीत भाज मैं गया ॥
घर में गया छिपा पहिचानौ । दूत भजे सो भी तुम जानौ ॥
बातोंही के करने मांहीं । दूत गए सो आये हांहीं ॥
सुनके नारद बहु हुलसाया । पतिवर्ता का उत्तर पाया ॥
अरु फिर नारद पूछन लागे । सूरज पुत्तर सुनो सुभागे ॥