भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 684, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिनकूं देखूं नयन निहारा। जिनके तेज श्याम मुखम्हारा ॥
पहिरे रहूं कवच तनमाहीं। ताकूँ आँच लगत है नाहीं ॥
नारद यह सुन निहचै कीजे। यही बात हिरदै धर लीजे ॥
धरमराय अरु नारद मुनी। दोनों की हम चित दे सुनी ॥
स्वरग नरक को सबही गाथा। तुमसों कही खोल ये बाता ॥
देखी नासकेत 'नहीं राखी। नैन निहारी सगरी भाखी ॥३१॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमनारदसंवादोनामषोडशोऽध्यायः॥ १६ ॥
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
और बात इक जगत में, है परसिद्ध लहूं।
देखी अपने नैनही, सोभी सुनो कहूं ॥ १ ॥
जो पापी जीवों किये, पिछले करम अघाय।
जनम पाय जा जगत में, सोई भुगतैं आयें ॥ २ ॥
चौपाई ॥
हत गऊवां पातक कियो भारी। बिषदे मनुष मारहू डारी ॥
अपने गुरुके घरके माहीं। देखें खोटी दिष्टबुराई ॥
सो निषिद्ध काया धर आवैं। ह्वाँ चंडाल जोनही पावैं ॥
मारै राह झूठ बहु बोलें। सो रोगी हो जग में डोलैं ॥
जो सोना जगमाहिं चुरावैं। जनम पाय कुष्ठी होजावैं ॥
जो मदिरा पी भये मतवाले। जिनके दांत हुये नखकारे ॥
ब्राह्मण पुस्तक पढ़न बिचारा। पावै जनम नागही कारा ॥
और जिन पाप जानकर कीन्हा। वाहू जनम सर्पकालीन्हा ॥३॥
दोहा ॥
जो कन्या कूं हनत है, कै बाहिर कै गेह।
जनम पायहैं जगत में, होय गधे की देह ॥ ४ ॥