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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 690 में से

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पृष्ठ 683

६४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भानु तेजसा तन है तेरा । ताये सोने कासा हेरा ॥
देह तुम्हारी गौरी सुहनी । मुख सांवरा कारन कौनी ॥
याका भी मोहिं, उत्तर दीजे । कहो भेद अरु किरपा कीजे ॥
धरमराय बोले मुसकाई । छिपी बात यह है ऋषिराई ॥
मेरेही हिरदै में रही । अबलग काहू से नहिं कही ॥
ब्रह्मसुत अब तोसं भाखूं । याका भेद कछू नहिं राखूं ॥
जिन मनुषौ तप दान किया है । निहचै हरिका नाम लिया है २७
दोहा ॥
अरु इन्द्रीमन वश किया, कियो योगही ध्यान ।
हरिगुण गाये भक्ति करि, आराधे भगवान ॥२८॥
चौपाई ॥ ६
गुरुके भक्त साध संग कीन्हा । हरिजन सेवनका व्रत लीन्हा ॥
क्षमां शील अरु दया विचारी । सतवादी भये नर क्या नारी ॥
तीरथ करके फल नहिं चाहा । हरिकी भक्ति करनका लाहा ॥
दुख सुख एक बराबर जानै । सत संतोष सदा हिय आनै ॥
पांच यज्ञ कर हरिकूं अरपैं । फल नहिं चाहैं आपन थरप ॥
कौन कौन यज्ञ सो बतलाऊं । जुदे जुदे कर सब दिखलाऊं ॥
मावस अरु संक्रायत जानों । व्यतीपात द्वादशी मानों ॥
और पांचवें पूरनवासी । देवैं दान रहैं निरबासी ॥
अरु पच अगनी तपैं निराशा । तपही की पूंजीजिनपासा॥२६॥
दोहा ॥
प्रेम भक्ति निहकाम जो, करैं अनन्यही भाय ।
तन मन हरिके ध्यानमें, राखैं चित्त लगाय ॥३०॥
चौपाई ॥
ऐसे साध संत जो आवैं । पुरी पास हो आगे जावैं ॥