भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
नासकेतलीलावर्णन । ५८७
मोकूं अरु अपनी माताकूं । हमें छोड़ के ह्वां मत जातू ॥
ऐसे वचन पिता जब बोले । नासही केत दीन हो बोले ॥
नांसकेत उवाच ॥
एहो पिता डिगा मत मोकूं । नमस्कार बहुते करूं तोकूं ॥
ध्यान तुम्हारो हिरदै धरि हूं । वचन तुम्हारे कूं सब करिहूं ॥
सत से सूरज तपता मानौं । सतसूं पिरथी कूं थिर जानौं ॥
सतसूं अगन जलत है सोई । सतसूं चन्दा अस्थित होई ॥
सतसूं लोक रहत ठहराई । सतसूं धर्म सदा बिरधाई ॥
सतसूं यह ब्रह्माण्ड खड़ा है । सत सूं सत्ती सूर अड़ा है ॥
हे महाराज साख कहूं एका । एक समय विधि कियो विवेका ॥
अश्वमेध यज्ञ सहस्रु लीने । इक पलड़े में राख जु दीने ॥
दूजे पलड़े में सत राखा । भारी भया सांच यह साखा ॥१७॥
दोहा ॥
यज्ञ पलड़ा ऊंचे गया, सत पलड़ा रहा भार ।
सत करिकै जो रहत नर, सोमसान सम धार ॥१८॥
ज्यों मसान तज दीजिए, वा नर कूं यों त्याग ।
सत्य जतन कर राखिये, सतही सेती लाग ॥१९॥
स्वर्ग सत्तसूं पाइये, सतही सों गति होय ।
सत्य धर्म सें हीन नर, जाहि नरककूँसोय ॥२०॥
तातें शोक निवारिये, बुधकों थिर कर लेहु ।
मैं जाऊं जमलोक कँ, येहि जु आज्ञा देहु ॥२१॥
ठौर ठौर कूं देखकर, आऊं चरनों पास ।
बेगहि आ दरशन करूं, मतहो नेक उदास ॥२२॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन कहत है, हे राजा सुज्ञान ।
५८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नासकेत कहि पिता सूं, फिर भया अन्तर ध्यान ॥२३॥
चौपाई ॥
इतनी कहि फिर गवन विचारा । गया जोग वल लगी न वारा ॥
ऐसे जमके लोक पधारा । धरमराय का दरस निहारा ॥
सिंघासन के ऊपर राजे । अगन पुंज ज्यों तेज विराजै ॥
जव इन हाथ जोड़ दोउ लीया । अस्तोत्तरधर्मराय का कीया ॥
भक्ति भावकर जुक्ति संभारै । लिये दीनता लज्जा धारै ॥
धरम नीक परवीन महाई । रनजीत कहै तिरलोक वड़ाई ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने यमदर्शनो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
वैशंपायन उवाच ॥ दोहा ॥
पैठि सभा के बीच में, दीठ वुद्धि उद्धार ।
पण्डित वहुत विराजई, विद्या का उजियार ॥ १ ॥
सारदूल से भूप सुनि, वालक कियो वनाय ।
अस्तोत्तर धर्मरायका, सो अव कहूं सुनाय ॥ २ ॥
नासकेत उवाच ॥
नमस्कार धर्मराय कूं, सर्व पिता महिदेव ।
तीत लोक रक्षा करन, सकल हरन निरलेव ॥ ३ ॥
सूरज सुत मरजाद धरि, नीति शास्त्र के रूप ।
धर्म अधर्म विचार कै, न्याई अधिक अनूप ॥ ४ ॥
सव पित्रों के नाथ हो, पूजैं सव सुर आदि ।
वुद्धिमान धर्मात्मा, सतवादी विन वाद ॥ ५ ॥
क्रांन्त वड़ी अरु निर्मला, महा पवित्तर देह ।
परजाओं के पति वड़े, नमस्कार मम लेह ॥ ६ ॥
अधिकारी धर्म ध्यान के, लक्ष्मीवान सुजान ।
नमस्कार मम लीजिए, वहुरूपी वहु ज्ञान ॥ ७ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५८६
नमस्कार मम लीजिए, पाप मिटावन हार ।
बेल बढ़ावन धर्म के, अस्तुति बारम्बार ॥ ८ ॥
वैशंपायन उवाच ॥
वैशंपायन ने कहा, सुन राजा यह शिक्ष ।
अस्तोत्तर ऋषिसुत कियो, पापदहन परतिक्ष ॥ ६ ॥
यह अस्तोत्तर सुन खुसी, बोला धर्महि राय ।
हे ब्राह्मण परसन भयो, पूछत हूं हरषाय ॥१०॥
क्यों कर आया कहां सूं, कै किन दिया पठाय ।
कै तू आया आपसूं, हम कूं कहो सुनाय ॥११॥
चौपाई ॥
जब यों पूछा धर्महि राया। रे बालक तू ह्यां कित आया ॥
बिना बुलाये ना कोइ आवे। अरु अपनी देह नहिं लावे १२
नासकेत उवाच ॥ दोहा ॥
नासकेत ऐसे कही, दीनों पिता सराप ।
अब तू जा जमलोक कूं, यों मैं आयो आप ॥१३॥
चौपाई ॥
पिता सराप आपही आयो। तुम्हरे दरशन कर सुख पायो ॥
यम उवाच ॥
धरमराय सुन बचन उचारा । धनधन बालक परन तुम्हारा ॥
आज्ञा मान पिता की आए। हम तुमपै बहुतै हरषाए ॥
हे बुधिमान कहा तोहि चहिए । मनमें हो सो हमसों कहिए ॥
सुखसों बिचर जमपुरी माहीं । बरमाँगे सो ले अब ह्याहीं ॥
नासकेत उवाच ॥
अहो देव तू परसन मोपै। तो इक बर मांगूं मैं तोपै ॥
सुन्दर नगर तुम्हारा कैसा। सभी दिखावो जित जित जैसा॥
५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुपत कूं मोहिं मिलावो। ह्यांका सबही भेद जनावो ॥१४॥
दोहा ॥
पतितन कूं दुख होत है, धरमी सुख निवास ।
एहू ठौर दिखाइए, मैं चरणन को दास ॥१५॥
चौपाई ॥
तिह उपरान्त धरमही राया । किंकर अपना कूं जु सुनाया ॥
या बालक कूं संग ले जावो । चित्रगुपत ही कूं जु मिलावो ॥
यह ब्राह्मण है पण्डित भारा । सत्त धर्म का जानन वारा ॥
श्राप पिता के ह्यां चलि आया । याको नगरी देहु दिखाया ॥
चित्रगुप्त कूं याजा दीज्यो । मेरी अज्ञा सूं यों कीज्यो ॥
वैशंपायन उवाच ॥
ऐसे दूतन सों कहि दीया । नासकेत को जब संग लीया ॥
चित्रगुप्त के जाके द्वारे । द्वारपाल सों वचन उचारे ॥
दूत उवाच ॥
धर्मराय ने हमें खंदाया । नासकेत कूं संग पठाया ॥१६॥
दोहा ॥
चित्रगुप्त के पास ही, जाय कहो यह बोल ।
सुनकर गए सिताबही, बात कही सब खोल ॥१७॥
चौपाई ॥
चित्रगुप्त सुनिये महाराजा । धर्मराय भेजे इस-काजा ॥
इक ब्राह्मण कों संग पठाया । दूतन साथ पोलि पै आया ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
पूछो जाय सिताबी वाकों । कै भीतर ले आवो ताकों ॥
वैशंपायन उवाच ॥
द्वारपाल सब कूं ले गया । चित्रगुप्त का दरशन भया ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६१
चित्रगुप्त दूतन सों पूछा । तबही दूत बचन कहे गूछा ॥
दूत उवाच ॥
हे बड़भाग सुनौ करि दाया । धरमराय ने हमें पठाया ॥
यह ब्राह्मण आया बुधिव्राना । सत्य धर्म में दृढ अति स्याना ॥
पिता सराप जमपुरी आया । याका चाव करो मन भाया ॥१८॥
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त जो बोलिया, सुन ब्राह्मण महाराज ।
तो इच्छा पूरी करूं, खोल कहो अब काज ॥१६॥
नासकेत उवाच ॥
जानत हो सब नरन की, गुप्त प्रगट जो बात ।
कछू नहीं तुम सूं छिपा, द्योस करो कै रात ॥२०॥
तेजवंत प्राकर्म ही, बड़े तुम्हारे काज ।
देखा चाहूं जमपुरी, अरु सब ह्यां के साज ॥२१॥
चौपाई ॥
अरु इक मनकी खोल सुनाऊं । दुख सुख ह्यां के देखा चाहूं ॥
चित्रगुप्त उवाच ॥
धरमराय को बचन हमारो । हे दूतो तुम हिरदै धारो ॥
ठौर ठौर सब जाय दिखावो । संगहि रहो फेर ह्यां ल्यावो ॥
इसे नरक दुख पवन न लागे । रक्षा सो ले जाहु सुभागे ॥
वैशंपायन उवाच ॥
चित्रगुप्त की आज्ञा पाई । सगरी नगरी जाय दिखाई ॥
नासकेत देखतही जाई । ठौर ठौर देखी हित लाई ॥
सात स्वरग अरु नरक अठारा । भिन्न भिन्न कर देखा सारा ॥
सब दिखाय फिर लाये पासा । नमस्कार कर होय हुलासा ॥२२॥
५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चित्रगुप्त उवाच ॥ दोहा ॥
चित्रगुप्त कही दूतसों, पूरी भई जु आस।
अब याकूं ले जाइए, धरमराय के पास॥ २३ ॥
सुनकै तुरतही लेगए, नमस्कार करि जाय।
धर्मराय वा देखकै, बोले अधिकी भाय ॥ २४ ॥
आधा आसनही दिया, बैठाया कर चाव।
चरन धोय पूजाकरी, जान किया ऋषि भाव ॥२५॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धरमराय हँस बचन सुनाए। सभी देख कहो सुख सूं आये ॥
नासकेतजी ठौर निहारी। तुमने देखी नगरी सारी ॥
नासकेत उवाच ॥
तुम किरपा सों स्वर्ग निहारे। अरु हम देखे नरक अठारे ॥
पापी पुन्यो सब हां देखे। अरु उनके फल सभी बिसेखे ॥
अबइक अरज़ और सुन लीजे। घर जाने की आज्ञा दीजे ॥
माता दुखी पिता दुख भारूं। जाय मिलूं दुख सबही टारूं ॥
उनसूं बचन किया था आगूं। देख जमपुरी चरनों लागूं॥२६॥
दोहा ॥
नमस्कार कर यों कही, देखो सबही भेव।
अब मात पिता पै जायहूं, मोकूं आयसु देव॥ २७॥
यम उवाच ॥ चौपाई ॥
धर्मराय कही आछी बाता। बचन कहो यह मोहिं सुहाता ॥
अब हम तोकूं यह वर दीना। होगा अमर सदा परबीना ॥
अरु काया बूढ़ी नहि होगी। हमरे बरतैं रहै निरोगी ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६३
वैशंपायनउवाच ॥
नासकेत बर ले सिर नाया । मातपिताढिंग बेगही आया ॥
चला जोगबल लगी न बारा । एक पलक में जैसे तारा ॥
रोवत माता कूं जहां पाया । पिता शोक में था अधिकाया ॥
पुत्तर कूं जब आया देखा । उद्दालक भया खुशी विशेखा ॥
पिता और चन्द्रावति माई । हरष मान बहुकरी बधाई ॥२८॥
उद्दालकउवाच ॥
दोहा ॥
जनम करम पूजा सभी, सुफल भए मम आज ।
पुत्तर का मुख देखतें, सभी गए दुख भाज ॥ २६ ॥
चौपाई ॥
उद्दालक कह्यो वाकी मासूं । देख जमपुरी आया हां सूं ॥
जोग तपस्या बल कूँ देखो । अपने मन में कर कर लेखो ॥
जमपुर गया देख अरु आया । हांका भेद सभी जो लाया ॥
यों कहि नासकेत कों ताका । पूंछूं बरनन करि सब वाका ॥
किसी जमपुरी देखी कैसे । कैसा मारग आया जैसे ॥
कैसा देखा वह जमराया । कहापिया अरु क्यातुमखाया ॥
जो जो देखा सो अब कहिये । हमसे सभी कहा जो चहिये ॥
नंरक माहिं दुख कैसे कैसे । सुरग माहिंसुख जैसे जैसे ॥३०॥
दोहा ॥
अपनी आंखों देखकर, तुम आये या ठौर ।
सुन सुनकै जानत हुते, सभी ऋषिश्वर और ॥३१॥
नासकेतउवाच ॥
चौपाई ॥
नासकेत जोरे दोऊ हाथा । कहने लागे हांकी बाता ॥
५६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तुम किरपा जमलोक सिधारा । बहु देवन का दरस निहारा ॥
चित्रगुपतही अरु धर्मराया । उनहूं का मैं दरशन पाया ॥
सर्वलोक दण्ड देने वारा । सोइ काल मैं लिया विचारा ॥
जमके दूत बड़े बलवाना । जिनकी सूरत भांति जुनाना ॥
धर्मराय को जा मैं चीन्हा । अस्तुति करकर परसन कीन्हा ॥
उन मोकूं बर दिया असोगा । कहा किअजर अमर तू होगा ॥
अरु कही जाहु पिताके पासा । जबमें आया तुम्हरा दासा ॥३२॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने पितापुत्रसंवादो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
हे राजा ताही समय, ऋषिआये वा ठौर ।
नासकेत के दरसको, काज न कोई और ॥ १ ॥
रघुराजा कों आदिदे, अरु आये बहुभूप ।
ऋषिराजा बहु आइया, अचरज सुना अनूप ॥ २ ॥
अचरज लखि कहने लगे, आपसही के माहिं ।
गए जमपुरी आइया, ढीललगाई नाहिं ॥ ३ ॥
चौपाई ॥
पूछन उद्दालक घर आये । नासकेत ह्वांकी सुध लाये ॥
इक इक ऋषिकूँ यों पहिचानों । बलती अगन तेज ज्योंजानों ॥
इक ऐसे पखवारे मांहीं । रणजीत कहै वे भोजन खाई ॥
एक जु ऐसे मास उपासी । जग भोगन सों रहें उदासी ॥
इक जल माहिं तपस्या करई । इक पचअगनी तपकूँ धरई ॥
एक अधोमुख तपकों साधै । इक सूरजही कों आराधै ॥
एक स्वासकों जान न देई । कुंभक साधरहै है वेई ॥
रहै एक जो पवन अहारा । एकों निराहार व्रतधारा ॥४॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६५
दोहा ॥
एक पांव बाजे खड़े, बाजे ऊरध बाहु ।
बाजे मौन गहे रहें, ऊंचे फल की चाहु ॥ ५ ॥
बाजे नगन शरीर हैं, बाजे करें जु होम ।
बाजे साधैं जोगही, लखिकै उत्तम भौम ॥ ६ ॥
कोइ चन्द्रायण बर्त कर, रहे जु तपके माहिं ।
कोई इक सूखे पात जो, तरवर ही के खाहिं ॥ ७ ॥
ऐसे ऐसे ऋषि सबै, नासकेत ढिग आय ।
पूछन की इच्छा सहित, दरशन ही के चाय ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
सबही मुन मिलबे कूं धाये । नासकेत उठ शीश निवाये ॥
मिलकर बैठे आश्रम माहीं । नासकेत सूं पूछत जाई ॥
जो जो अपनी आंखों देखा । सो सो हमसों कहो बसेखा ॥
जो तुम देख जमपुरी आये । समाचार ज्यों ह्वां के लाये ॥६॥
ऋषिउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे ऋषि पूछत भए, नासकेत सूं बात ।
ह्वां का सब विस्तारही, कहिये हमरे साथ ॥ १० ॥
ह्वांके मनुष्यन की कहौ, क्रोधवन्त कै शान्त ।
कडुवे कै मीठे वचन, ज्ञानवन्त कै भ्रान्त ॥ ११ ॥
चौपाई ॥
कैसा पाप पुण्य का भेदा । कैसा जीवन कूं ह्वां खेदा ॥
कैसा नरक स्वरग का बासा । कहा कहा ह्वां जमकी त्रासा ॥
ह्वां का सबही करौ बखाना । एकदिना हमहूं कूं जाना ॥
सुखी होन की चाल बताओ । धरम करम हमकूं समझावो ॥
५६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ह्वां का भेद कछू मत राखो । कहैं कहां लो सब तुमभाखो ॥
जमलेने कूं कैसे आवैं । या प्रानी क्योंकर ले जावैं ॥
दुख सुख कहा बाट के माहीं । केते द्योसन में ले जाईं ॥
यों कहकर मुख ताकन लागे । नासकेत जब भाषन लागे १२॥
नासकेतउवाच ॥
दोहा ॥
नासकेत जब यों कही, सुनों ऋषीश्वर साख ।
जो जो देखा जमपुरी, सभी कहतहूँ भाख ॥ १३ ॥
चौपाई ॥
सुनों ऋषीश्वर चित अब दीजै । अब मैं कहूं सबै सुन लीजै ॥
महाभयानक दुख बहु भारै । सुनकर रोम उठै तन सारै ॥
पिता सराप गया मैं ह्वांईं । धर्मराय थे ललित तहांईं ॥
मैं अस्तुति करि परसन कीना । आधा आसन उन मोहिंदीन्हा॥
देवत बहुत सातुकी देखे । बलतकार जमदूत बलेखे ॥
चित्रगुपत मैं नैन निहारा । सबकूं शिक्षा देने वारा ॥
अरु मैं दीन होय बरपाया । कही अमर होगी तो काया ॥
पिता दया मैं फिर ह्यां आया । कहूं जु ह्वांकीं सबैसुनाया ॥१४॥
दोहा ॥
सुन्दर नगर सुहावना । जमपुर ताका नाम ।
सहस जोजन विस्तार है, सत्य न्याव की ठांव ॥ १५ ॥
चौपाई ॥
महा भयानक कोट निहारा । जोजन पांच भीत उचियारा ॥
दक्षिण दिशा ताहि कूं जानौं । तिसके द्वारे चार पिछानौं ॥
जैसे कर्म करै जो कोई । तैसे द्वारे बड़ि है सोई ।
पिरथम जमगण जगमें धावैं । या प्रानी कूँ लेने आवैं ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
जैसे पाप करै नर लोई । जम सूरत बनिआवै वोई ॥
याकूं मार पकड़ ले जावैं । जैसे कर्म किये भुगतावैं ॥१६॥
दोहा ॥
या प्रानी जा भांति के, लीन्हे पाप लगाय ।
वा भांती जम आय हैं, भयको रूप बनाय ॥१७॥
चौपाई ॥
कोई सूकर पर चढ़ आवै । कांधे गदा बहुत डरपाव ॥
कोई चढ़े सिंघ की पीठा । करमें गुरज बुरी ही डीठा ॥
कोई जम चढ़आवै भैंसे । बुरी आंख अरु ऊंचे कैसे ॥
कोई आवै जरक सवारी । दांत बड़े मुगदर लिये भारी ॥
कोई मुरदे के चढ़ि कांधे । खैंचु कमान तीर ही सांधे ॥
कोई कुत्ते पर चढ़ि धावे । हाथों फासी सीस घुमावे ॥
कोइ आवै गधा पलानैं । काढै जीभ बुरही बानैं ॥
जगमें बुरे कर्म जिन कीन्हे । तिनकूं यों आवत जम चीन्हे ॥
बुरी बुरी सूरत ही बनिआवैं । कहांलगकहूंबहुतभयलावैं ॥१८॥
दोहा ॥
बुरे कर्म पापी करें, जिनकी यह गत जान ।
भले कर्म जो करत हैं, तिनका करूं बखान ॥१९॥
जो जग में पुण्यात्मा, चरणदास सुखपाय ।
तन छूटे गण पारषद, सुख सूं ही ले जाय ॥२०॥
चौपाई ॥
गण आवन कों रूप बखानूं । भिन्न भिन्न जैसे मैं जानूं ॥
कोई आवत ऐसे देखा । धरि आवै तपसीका भेखा ॥
कोई रूप वैशनों आवै । गलमाला अरु तिलक बनावै ॥
कोई आत पिता के रूपा । कोई आवै गुरू सरूपा ॥
५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोई करत कीरतन धावैं । हरि के गुण गावतही आवैं ॥
कोई आवै माला फेरत । वा प्रानी कूं हितसूँ हेरत ॥
कोई रथ विमान ले आवैं । हरि गुरुका कोइ नाम जपावैं ॥
कोई पालकी घोड़े ल्यावैं । कोई हाथी लीये आवैं ॥
शुभकर्मी कूँ तहां चढ़ावैं । सुखदेते जमपुर ले जावैं ॥२१॥
दोहा ॥
मृत्युलोकसूँ राह जो, जमपुरही की जान ।
छ्यासी सहस जोजन सबै, इतनों है परमान ॥२२॥
आठ ठौरहै कष्ट की, वाही मारग माहिं ।
दुख सुखही भुगतावते, जमगण ले ले जाहिं ॥२३॥
चौपाई ॥
जब प्रानी की छूटे देही । सब मिल आवैं कुटुम्ब सनेही ॥
बांध जोड़ कर अरथी करै । चार मनुष्य कै कांधै धरै ॥
ले जावैं मरघट के मांहीं । मुंह झुलसैं अरु देह जलाई ॥
तब हां नेक नहीं ठहरावैं । अपने अपने घरकूँ जावैं ॥
जबहीं जुदे होय परवारी । मात पिता सुत धन अरु नारी ॥
पाट पटम्बर हीरे मोती । सबही अलगहोय कुलगोती ॥
बाग महल हाथी अरु घोड़े । सबने पीठदई मुख मोड़े ॥
राजकटक अरु मुलक भौमही । दूरहोय सबतेज जौमही ॥
बीर भतीजे अरु यह देही । रनजीत कहैं कोई नाहिं सनेही ॥
जूवे हारा धाडी लूटा । ऐसे चाला सबसे छूटा ॥२४॥
दोहा ॥
जिन कारन बहु पापकरि, लाता दरब कमाय ।
अपना कर कर जानता, देता तिन्हें खुलाय ॥२५॥
वे वाके होवें नहीं, तोड़ि कहैं यह बात ।
नासकेतलीलावर्णन । ५६६
जैसा कीया सो लुणैं, हम तेरे नहिं साथ ॥ २६ ॥
सबही मिल कहने लगे, हम तेरे अब नाहिं।
पाप पुण्य जो कुछ किया, सोही संगहि जाहिं ॥ २७ ॥
चौपाई ॥
जगत ठाठ जब ऐसे कहैं । तब प्रानी हकधक हो रहैं ॥
जबही मुंडी धुनने लागे । कहै माहिं क्यों इनके पागे ॥
हाय हाय मैं कछु नहिं कीया । राम भगति में मन नहिं दीया ॥
जिन कारन बहु पाप कमाये । सो मेरे अब काम न आये ॥
साध संग के माहिं न मिलिया । दया धर्मकी राह न चलिया ॥
भला कर्म सबही बिसराया । खोटे कर्मन सूं चितलाय ॥
सोच सोच सब और निहारैं । कोई न संगी हुआ हमारैं ॥
यों प्रानी पछतावा करै । जममारै लै आगे धरै ॥
चरणदास कहैं कछु न बसावै । ऐसे बांधा जमपुर जाव ॥२८॥
दोहा ॥
पकड़ बांध जम ले चलैं, गल में डार जंजीर ।
पापी जीवन दुख सहित, देत घनी ही पीर ॥ २६ ॥
जो जीहै पुण्यात्मा, सोवै सुखसूँ जाहिं ।
तिनकूं गण ले जात हैं, जम नहिं छूवैं छाहि ॥ ३० ॥
चौपाई ॥
दो हजार जोजन मगमाहीं । सहजरूप दुख सुख
६०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
लोहे कीसी कीलें पैनी । चुभचुभ जाय महादुख दैनी ॥
वह पैंडा है अति दुखदाई । जाहिं कष्ट सूं लोग लुगाई ॥
अरु धरमी जी सुख सूं जावैं । दिये दान सब आगै आवैं ॥
रथ चंडोल पालकी म्याना । हाथी घोड़े और विमाना ॥
ऐसी विध के बाहन आवैं । उन ऊपर चढ़ि बाट लंघावैं ॥
चरणदास कहैं जो ह्यां देवैं । जाका बदला आगे लेवैं ॥३१॥
दोहा ॥
जोजन दोय हजारही, पैंडा बालू रेत ।
दान जिन्हों पनहीं करी, सो-लंघि हैं सुख सेत ॥३२॥
आगै बारह सहसही, जोजन खांडे धार ।
महाविषम वह बाट है, पाप पुण्यही लार ॥३३॥
घोड़े के या बैलके, रथ देवे जो कोय ।
वह पैंडा सुख सूं लंघै, ताकूँ दुख नहिं होय ॥३४॥
चौपाई ॥
वाके आगे जलही आवै । रुकरहा भरा थाह नहीं पाव ॥
चहूँ ओर डरही डर लागै । आठ सहस्र जोजन वह जागै ॥
भूमिदान जिन दीया होई । सुखसूँ जाय पार हो सोई ॥
ऊंचा दान किया फल लावै । पगसूं धरती लगती जावै ॥
जलसूँ उतर चलै जो आगै । राह अँधेरी डर बहु लागै ॥
तीस सहस जोजन मगजानौ । तामें कष्ट अधिक पहचानौ ॥
बिजली चमक गरज बहुमानो । परलयकीसी निश्चित आनौ ॥
दानकिये दीवे तहां आवैं । सो प्रानी चांदिन में जावैं ॥
पचभीषम तुलसी के ठांईं । कै ठाकुरद्वारे के माहीं ॥
कै सतगुर के भवन मँझारै । बाटमाहिं कै दीपक जारै ॥
ब्राह्मण कै घर कै धर्मशाला । तीरथ पर कै दीवा बाला ॥३५॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०१
दोहा ॥
प्रानी इसही दानसों, चांदिनही में जायँ ।
रनजीत कहै सुख कूं लंघै, उसही अंधेरु माहिं ॥३६॥
चौपाई ॥
आगैं भयानक ऊबट बाटा । उतर चढ़नके बहुतक घाटा ॥
बहुतक डर जहां आगै आवैं । प्रानी अतिव्याकुल हो जावैं ॥
कहा कहूं बहुते दुखदाया । जाकूं देखे कांपै काया ॥
आठ सहस जोजन मगसोई । तामें धीरज रहै न कोई ॥
आगै तप्त भानकी जारै । सोतो जोजन सहस अठारै ॥
वा पैड़ेमें तो सुख पावैं । कुवे बावड़ी ताल खुदावैं ॥
कै पो देवे मारग माहीं । प्यासे जलकूं नाटै नाहीं ॥
धर्मशाला में रखै भराई । कै ब्राह्मण घर दे पोंहचाई ॥
ठाकुरद्वारे माहिं भगवै । कै गुरद्वारे भर पहुँचावै ॥
कै सुन्दर से भवन बनाये । दिये दान जिन हां फलपाये ॥
बाटमाहिं जो बृक्ष लगावे । ऐसा दान काम हां आवे ॥
आय प्रापत जल हां होवै । तपत प्यास प्रानी की खोवै ॥
छ्यासीसहसजोजनमगगहिया । भिन्न भिन्न मैं तुमसों कहिया ३७
दोहा ॥
जमपुरी के निकट है, ताको करूं बखान ।
बैतरनी नदी जहां, सौ जोजन परवान ॥३८॥
चौपाई ॥
पीप रकत तामाहीं भरिया । प्रानी थरहर धीर न धरिया ॥
बीछू कीड़े सांप घनेही । दुखसों उतरे पाप सनेही ॥
जो अपने स्वामी कूं मारै । और ब्राह्मन कूं हनडारै ॥
प्यास लगै जब ऐसे करै । रकत पीप पी तृष्णा हरै ॥
६०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बैतरनी कोई सकै न देखा । तामें लहरैं उठैं अनेका ॥
जाके हले जीव वे सारै । तल ऊपर कभी लगै किनारै ॥
अरु हां रक्षा करै न कोई । नाते हितू न संगी होई ॥
कृतघ्नी बिस्वांसी घाती । निजधर्मनके होय न साथी ॥३६॥
दोहा ॥
विना विचारे करत है, बरत करै जो भंग ।
मिथ्या वाद करै घना, रँगे लोभ के रंग ॥४०॥
चौपाई ।
सोवै नदी ही के माहीं । गिरते देखे पतित तहां हीं ॥
पतितों दीखे राध रकत की । पुनवारे कूं घीव शहद की ॥
जिसने दीया अन्नही दाना । और बसे तीरथ अस्थाना ॥
और नहात है गंगासागर । दृढ़ व्रत अपना रखै उजागर ॥
पोथी धरम सासतर केरी । लिखा लिखादे दान घनेरी ॥
साधों के चरितों की इछ्या । सतगुरू सेती लेवे दीछ्या ॥
जिन गौदान करै शुभबारा । ताकी पूंछ पकड़ हो पारा ॥
घने मनुष मैं उतरत देखे । बहुत सितांबी सुनौं बसेखे ॥४१॥
दोहा ॥
वाके आगे गिरि बड़ा, धरम सैल जिहनाव ।
सोनेका निर्मल इसा, जों बिलोर की दांव ॥४२॥
पतितनकूं दीखे नहीं, दीखे तो भय रूप ।
देखत है पुन्यात्मा, सुन्दर महा अनूप ॥४३॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने महामार्गस्थानंनाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
ऋपिउवाच ॥ दोहा ॥
फेर ऋषीश्वर बोलिया, नासकेत महाराज ।
मारग की जो तुम कही. नीके समझी आज ॥ १ ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०३
अब कहिए धर्मराय की, और सभा की खोल।
तुम दाता सुखदान हो, मीठे तुम्हरे बोल ॥ २ ॥
सभी करें परनामही, हमतो चरनही दास।
सुनबे को मन चाव करि, आ बैठे तुम पास ॥ ३ ॥
नासकेतउवाच ॥
नासकेत कर जोर कर, ऐसे बोले बैन।
तुम चरनन की रेनुका, हमरी है सुखदैन ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
नासकेत कहि दास तुम्हारे। तुम ह्यां आये भाग हमारे ॥
धरम राय की सबै सुनाऊं। और सभाकी खोल दिखाऊं॥५॥
दोहा ॥
जम नगरी वा पास ही, जिसके द्वारे चार।
छोटे नग्गर और बहु, वाही ठोर मंझार ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रतन जड़े जहां बहुते भांती। वा नगरीकी अतिही क्रांती ॥
बहुत अपसरा नृत्य करत हैं। बाजे बजत गीत उचरत हैं ॥
ताते सुन्दर होय रहा है। फूल बिछे बहु भूमि महा है ॥
सभामाहिं धर्मराय निहारा। ज्यों तारों में चन्दा सारा ॥
ऋषि जोगी तिंहपास विराजैं। किन्नर गन्धर्व अति छविछाजैं ॥
विद्याधर तिन केही पासा। बड़े सरप रहे उमँग हुलासा ॥
अत्रे मैत्रे भारद्वाजा। भृगु मरीच दधीच सुराजा ॥
गोतम दुरवासा महा जोगी। चिवन पुलस्त सुमित्र असोगी ॥
गालवि जातूकरन महामति। धर्म अधर्म विचार करैं नित ॥
और ऋषीश्वर बहु सतवादी। धरमरायढिंग जिनकी गादी ॥
बारह सूरज की समरूपा। बस्तर पहरैं रतन अनूपा ॥
६०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चतुर वेद के पढ़ने वारे । अरु मीमांसा जानन हारे ॥
बहुत शास्त्र आप बनाए । धर्म काज जगमांहि चलाए ॥
धरमराय उन केही मांहीं । शोभांवत अधिक छविपाई ॥
सिरपर सुन्दर मुकुट धरेही । बहुत भांति के रतन जड़ैही ॥
तेज कहूं ज्यों बारह भाना । करै न्याव ज्यों दूध अरुपाना ॥
प्रानी कूं जमगण ले जांई । खड़ा करै जाकर वह ठांई ॥
धरमराय कहै हां ले जावो । चित्रगुपतही कूँ दिखलावो ॥
पाप पुण्य का लेखा करै । प्रानी किया सु दुख सुख भरै ॥
छिपकर अरु परगट ज्यो कीया । चित्रगुप्त ने सब कह दीया ॥
पाप पुण्य सब कह समझावै । धर्मराय जब न्याव चुकावै ॥
कहैक पहले भुगतै पापा । नरक मांहि फिर देहु संतापा ॥
दोहा ॥
नरक अठारह है जहां, जिन किये जैसे पाप ।
वैसे मांही डाल हैं, तैसो तिन्हें संताप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
ऐसा जमपुर चार दुवारे । भांत भांत के न्यारे न्यारे ॥
पूरब दिशा एक है द्वारा । दूजा पच्छिम और निहारा ॥
तीजा उत्तर दिशा सुनाऊं । चौथा दक्षिण और बताऊं ॥
कहूं द्वार पूरब की जानूं । जाकी महिमा सभी बखानूं ॥
जिन प्रानी ऐसे कर्म कीने । कपड़े लकड़ी जाड़े दीने ॥
पानी गर्मी मांहि पिलाये । रस्ते में जिन वृक्ष लगाये ॥
थके मनुष बाहन चढ़वाये । भूखे कूँ भोजन करवाये ॥
गुरु के सेवन की ब्रतलीनी । अरु साधन की संगत कीनी ॥
उत्तम तीरथ किये संभारी । दया धरम हिरदय में धारी ॥
कथा कीरतन बरत बसेखे । पूरब द्वारे बढ़ते देखे ॥
नासकेतलीलावर्णन । ६०५
साथ अप्सरा हरि गुणगावैं । करत कीरतन ही ले जावैं ॥६॥
दोहा ॥
पूरबद्वारे की कही, सुनों ऋषीश्वर चैन ।
पच्छिम द्वारा अब कहूं, सोभी है सुख दैन ॥१०॥
चौपाई ॥
जिन मात पिताकी आज्ञामानी । पर निन्दा कबहू नहीं ठानी ॥
नित्त प्रति कुछ कीया दाना । परधन कूं विंष्ठा सम जाना ॥
काम क्रोध जिनके नहीं मोहा । काहूँ सें राखै नहिं द्रोहा ॥
परतिरिया मनमें नहीं लीनी । नारायन की पूजा कीनी ॥
वे पच्छिम द्वारे हो जावैं । अपने लक्षन सूं सुखपावैं ॥
द्वार तीसरे की सुन बाता । सभी सुनाऊं ताकी काथा ॥
जो प्रानी है पर उपकारी । पर कारजहित दुखसहैं भारी ॥
अपने कारज ढील लगावैं । पर कारज कूँ उठ उठ धावैं ॥
आपन दुखसह पर सुख दीना । जीवत परमारथही कीना ॥
आप धर्म कर और करावैं । हिरदय दया नाम चितलावैं ॥
सो जावैं उत्तरही द्वारै । साधरूप गण तिनके लारै॥११॥
दोहा ॥
विष्णु भक्ति की नेष्ठा, साध विप्र की सेव ।
धर्म बरत में डिढ रहै, सिरपर रख गुरुदेव ॥१२॥
चौपाई ॥
अरुभलेकर्म जिन कीने नाहीं । खोटे कर्मन के पडमाहीं ॥
सो चौथे द्वारे हो जावैं । बाटमाहिं जम बहुत सतावैं ॥
पाप किये जिन ऐसे ऐसे । सबही खोल बताऊं तैसे ॥
दुष्टबड़े तनमन दुखदाई । सब जीवन सूं करै बुराई ॥
६०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाये कूं बहुतै मारै । छिपकर परघरही कूं जारै ॥
पक्षी पकड़ फन्द में डारै । जीव हतन की मन में धारै ॥
हरे बिरछ कूं जो वे काटैं । अरु चोरीकर लूटत बाटैं ॥
गऊ ब्राह्मण की कर घातैं । मात पिता सूं टेढ़ी बातैं ॥१३॥
दोहा ॥
जार करम हित सूं करै, गरभ गिरावै जान ।
पर निन्दा बहुती करैं महा मूढ़ अज्ञान ॥ १४ ॥
चौपाई ॥
और वै हैं विस्वासी घाती । बोलैं झूठ महा अपराधी ॥
झूठी साख भरै न लजावैं । परघरही सूं धन ठगलावैं ॥
जाका नोन खाय वा मारै । रस्ते मांहि आगहू डारै ॥
खुशी होय परकी कर हांसी । मनमें राखै सब सूं गांसी ॥
डिभ कपट छल भगल अहारा । जो कुछ किया सो नांहि विचारा ॥
साधसंग में मन नहिं दीन्हा । गुरुका कहा पंथ नहिं चीन्हा ॥
बेमुख हो आवना त्यागैं । दुनियां के दुख धंधे पागैं ॥
वेद पुरानन कों नहिं मानैं । शास्त्र की निन्दाही ठानैं ॥
पाप अनेक करत नहिं डरैं । मनमें पाप पाप धुन धरैं ॥
औगुन ग्राही गुन नहिं पकड़ैं । दीन होय जासों बहु अकड़ैं ॥
धरमजु अपने स्वामी केरा । ताकी निन्दा करै घनेरा ॥
परकी चुगली हित कर करैं । गुरूके बचन न हिरदै धरैं ॥
रिण देवैं अरु ब्याज बढ़ावैं । ताका धान खुशी हो खावैं ॥
ब्याज लैन में भारी हान । निरफल जाय करै जो दान ॥
हाय हाय कर जनम गंवावै । सब कुछ रख संतोष न आवै ॥
संकल फांसी जिन गल माहीं । दक्षिण द्वारे होते जाईं ॥१५॥