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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
महिमा गुरु के ध्यानकी, को करि सकै बखान ।
मेरे मन निश्चय यही, जाय मिलै भगवान ॥
करणी सों सत्ती भवै, करणी सों दातार ।
करणी सों शूरा भवै, जावै स्वर्ग 'मँझार ॥
भांतिभांति के सुख जहां, भोगै भोग अपार ।
धर्म पन्थ कोई चलै, शूद्रा कै नर नार ॥
चारिसमय नित नेमकरि, सदा रहै निष्पाप ।
गिना जाय हरिजन बिषे, होय नहीं जन ताप ॥
जिन जैसी करणी करी, सो निष्फल नहिं जाय ।
जाका बदला होयगा, शुकदेवा कहै गाय ॥
ब्राह्मण करणी ब्राह्मण होई । क्षत्री कर्मसों क्षत्री सोई ॥
वैश्य कर्म सों वैश्य कहावै । शूद्रकर्म सों शूद्र लखावै ॥
नहीं तो सबकी देह बराबर । पांचतत्त्व त्रैगुण सों कर कर ॥
कान आंख मुख नासा एकी । शीश हाथ पग काया देखी ॥
एकबाट ' ह्वै सबही आवै । एकहि भांति सबै बनिधावै ॥
दो० जाति वर्ण अरु 'आश्रम, करणी सों दर्शाय ।
चरणदास निश्चय करो, मूरख भी ले पाय ॥
धोबी छीपी आदि दै, ये छत्तीसौ पौन ।
करणी के सब नाम हैं, जैसो करै सो जोन ॥
कर्मोंहीं से जग यह भासै । कर्मोंही से फिर ह्वै नासै ॥
कर्म प्रलय उतपत्ति करावै । होनिहु कर्म ब्रह्म ह्वै जावै ॥
परलय समय कर्म जी सार्था । बुरे भले जो लागै गाथा ॥
संगहि जाय रहै माया में । 'माया जाय लगत काया में ॥
१ चारि अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र । २. चारि अर्थात् ब्रह्मचारी,
गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास ॥

धर्मजहाजवर्णन । ३१
वासा करि हरि चरणन माहीं । होय लीन वह मिटै जुनाहीं ॥
पूंजी कर्म जु माया पासा । फिरउतपति की वाको आसा॥
परलय कालब्यतीते जबहीं । उतपति करै जगतहू तबहीं ॥
चरणदास तुम ऐसे जानौ । कहैंशुकदेव सांच करि मानौ ॥
दो० रहत प्रलय महँ वस्तु छः, इनका नाश न होय !
सो मैं वर्णन करतहों, बुधिआंखन सों जोय ॥
काल अकास जीव अरु माया । पाप पुण्य प्रत्यक्ष बताया ॥
फिर उतपति इनहीं सों होई । जानै पण्डित विरला कोई ॥
काल न एकौ करै पुराना । प्रलय होय सो निश्चयजाना ॥
फिर परलय को लागारहै । करै समाप्त आपना गहै ॥
उतपतिसमै और नहिं होई । परलय हुये जो उतपति सोई ॥
कर्म धरे रहै ज्यों के त्योंही । उलटे पलटे नाहीं क्योंहीं ॥
जैसे के तैसे तन धारे । कर्म लगे रहे उनके लारे ॥
कहि शुकदेव कर्मगति भारी । चरणदास कोइछुटै खिलारी ॥
शिष्यवचन ॥
दो० चरणदास यों कहत है, सुनो गुरू शुकदेव ।
ज्यों करि हो निष्कर्मही, ताको कहियो भेव ॥
गुरुवचन ॥
कहि शुकदेव सँदेह मिटाऊं । ज्योंकी त्यों पूरी समझाऊं ॥
खोंटी करणी नरकहि जावे । पाप क्षीण मृतलोकहि आवे ॥
भले कर्म जा स्वर्ग मँझारा । पुण्यक्षीण मृतलोकहि डारा ॥
ऐसे लोक लोक फिरि आवै । कर्म न छूटै दुख सुख पावै ॥
जैसे कर्म छुटै सो कहूँ । तोपै दया करतही रहूँ ॥
खोटे कर्म सु सकल निवारै । शुभ करणी को नीके धारै ॥
जाके फलको मन नहिं लावै । ह्वै निष्कर्म परम सुख पावै ॥

३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
फल त्यागै सोइ चरणदासा। चरणकमलकी राखै आसा ॥
दो० सो पावै निर्वान' पद, आवा गमन मिटाय ।
जन्म मरण होवे नहीं, फिरि फिरि काल न खाय ॥
शिष्यवचन ॥
जो जो कहि गुरुदेवजी, सो सो परी प्रत्यक्ष ।
चरणदास को दीजिये, साधु होन की शिक्ष ॥
गुरुवचन ॥
वही साधवी जानिये, निरवारै सब कर्म ।
तन मन वचन सधेरहैं, पालै अपना धर्म ॥
पहिले साधै वचन को, दूजे साधै देह ।
तीजे मन को साधये, गुरु सों राखै नेह ॥
जिनहीं के उपदेश को, सुन राखै निज चित्त ।
ताको मनन सदा करै, भूलै ना नित वृत्त ॥
शिष्यवचन ॥
जो जो कही सो जानिया, एहो श्री शुकदेव ।
साधन तन मन वचन को, सबही कहिये भेव ॥
गुरुवचन ॥
शिष्य सो तोसों कहत हौं, नीके सुन दै कान ।
ज्यों ज्यों कर्म बचैं दशौ, ताकी करि पहिचान ॥
प्रथम वचन के चार सुनाऊं । तेरे चितमें नीके लाऊं ॥
एक यही जो झूठ न बोलै । सांच कहै तब हिरदय तोलै ॥
झूठ कहन को पातक भारी । जो जप करै सुदेह उजारी ॥
झूठेका जप लागत नाहीं । सिद्धहोय नहिं निष्फल जाहीं ॥
अरु झूठेकी नहिं परतीतैं । झूठेकी खोटी सब रीतैं ॥
१ जिस को कि ब्रह्मपद सबसे उत्तम कहते हैं ॥

धर्मजहाजवर्णन । ३३
दूजे निन्दा नाहीं करिये। पर के औगुण चित्त न धरिये ॥
निन्दाका भारी है पाप। यासों भी निष्फल है जाप ॥
तीजे कड़ुआ वचन न भाखै। सबजीवन सों हितही राखै ॥
खोटा वचन महा दुखदाई। जो साधै सो अतिबलदाई ॥
खोटा वचन तपस्या खोवै। नरक माहिं लै जाय समोवै ॥
मीठे वचन बोलि सुखदीजै। उनके मनका शोक हरीजै ॥
कहि शुकदेवा चौथा सुनिये। चरणदास लै मनमें गुनिये ॥
दो० चौथे मौन गहे रहे, लक्षण अधिक अमोल।
कर्म लगै जग वात सों, हरि चरचा में खोल ॥
तन सों तीनि कर्म जो लागे। जो मैं कहूं तुम्हारे आगे ॥
चोरी जारी अरु हिंसा है। इन पापन सों भारी भय है ॥
कर्म छुटै जाकी विधि गाऊं। भिन्न भिन्न तोको समझाऊं ॥
तन सों चोरी कबहुँ न कीजै। काहूकी नहिं वस्तु हरीजै ॥
चोरी त्यागै सो सतवादी। तापर रीझैं राम अनादी ॥
जारीके क्रम ऐसे भानों। परतिरिया को माता जानों ॥
तीजी हिंसा त्यागहि कीजै। दया राखि जीवन सुख दीजै ॥
दया बराबर तप नहिं कोई। आतम पूजा तासों होई ॥
कर्म छुटन का भारी गैला। ज्यों साबुन उजला पट मैला ॥
शुकदेवा कहै तन के कहे। तीनि करम अब मनके रहे ॥
दो० कहौं जु मनके तीनि अब, झीनी जिनकी बात।
गुरू दिखाये दीखई, विधि औरी न दिखात ॥
खोटी चितवन वैरही, अरु तीजा अभिमान।
इन सों कर्म लगैं घने, मेटैं संत सुजान ॥
खोटी चितवनि खोलि दिखाऊं। जासों कहिये सो समझाऊं ॥
कवहूं चितवै परनारी को। कवहूं चितवै फलवारी को ॥

३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मनही मन में भोगै भोग । हाथ न आवै उपजै शोग ॥
कबहुं चितवै वाको मारौं । कबहूं चितवै फांसी डारौं ॥
कवहूं चितवै द्रव्य चुराऊं । वाको धन अपने घर लाऊं ॥
कबहूं चितवै ठगई करौं । माल बिराना छलकरि हरौं ॥
भांति भांति चितवनि उपजायै । बुरे मनोरथ कर्म लगावै ॥
ताते याका करै उपाऊ । होय जो साधू कर्म छुटाऊ ॥
जो चितवै तौ हरि गुरु चरणा । ब्रह्मविचार सदाही करणा ॥
खोटी चितवनि चितवै नाहीं । सदा रहै थिर ताके माहीं ॥
कहि शुकदेव सो हिरदै रहै । इत उतको चित नाहीं बहै ॥
दो० दूजा कर्म जु वैर है, महा पाप की पोट ।
सदा हिया जलता रहै, करै खोटही खोट ॥
वैरभाव में अवगुण भारी । तनछूटै जा नरक मंझारी ॥
वैरी याद रहै मन माहीं । हरि सों हेत लगन दे नाहीं ॥
ताते वैरभाव नहिं कीजै । याको कर्म लाग नहिं दीजै ॥
अरु तीजा जानौ अभिमाना । गुरू कृपा सों ताको जाना ॥
हूं हूं हूं हूं करता रहै । नीचा होय तौ अन्तर दहै ॥
कबहूं फूलै मन के माहीं । मो समान कोउ ऊंचा नाहीं ॥
मैंही योंकर योंकर करिया । मो बिन कारज कछू न सरिया ॥
अपने को चतुरा बहु जानै । और सबन को मूरुख मानै ॥
अभिमानी ऐसा मन लावै । हरिकेगुण किरिया बिसरावै ॥
गर्व भरा खोंटी वृत्ति धारै । अपने मनमें कबहूँ न हारै ॥
शुकदेव कहै वाहि पहिचानौ । नरकजायगा निश्चय आनौं ॥
रणजीता अभिमान न कीजै । कर्म बचाय परम सुख लीजै ॥
दो० कृत घनी बेमुख भवै, गुरु सों विद्या पाय ।
उनको जानै तनकही, आपन को अधिकाय ॥

धर्मजहाजवर्णन । ३५
जैसे इक दृष्टान्त सुनाऊं । कथा पुरानी कहि समुझाऊं ॥
महापुरुष इक स्वामी पूरा । ज्ञान ध्यान में था भरपूरा ॥
लक्षण सभी हुते वा माहीं । आठपहर हरिहीको ध्याहीं ॥
उनको शिष्य आन इक भयो । वहि उपदेश जु नीको दयो ॥
करिकै प्यार निकट जो राखो । प्रीतिकरी अरुसबकछुभाखो ॥
फिरि रामतकी आज्ञा लीन्ही । उनहूँ करि किरपातवदीन्ही ॥
पहुँचा एक नगर अस्थाना । ह्वांके नरन सिद्ध बड़जाना ॥
ठहराया अरु पूजा कीन्ही । बहुत नरन ने कण्ठीलीन्ही ॥
बहुतक प्राणी आवें जावें । संध्या भोर शीश बहु नावें ॥
महिमा देखि फूल¹ मनमाहीं । कहाकि हमसमगुरुभी नाहीं ॥
दो० गद्दी पर बैठा रहै, तकिया बड़े लगाय।
बहुत रहैं आज्ञा विषे, शिरपर चँवर दुराय ॥
गुरु परताप नहीं वह जानै । अपनीही बुधि बड़ी जुठानै ॥
मूरख आगे क्यों नहिं भया । दीन होय करि द्वारेगया ॥
थोड़ेहीसे बहु इतराना । गुरुकी कृपा प्यार ना जाना ॥
बार वार शोचै मन मोई । हमरो गुरु क्या ऐसो होई ॥
उनको तो नर कोइ कोइ जाने । हमको सिगरो देश वखानै ॥
दिन दिन बढ़ता दीखै आगे । मेरे भाग बड़ेही जागे ॥
मेरे मनमें ऐसी आवै । उनका शिष्य जु कौन कहावै ॥
वहीँ अचानक गुरु ह्वां आया । बैठेही शिर शिष्य नवाया ॥
दो० जैसे आते वैष्णव, करता वह दंडौत।
ऐसेही गुरु से किया, आदर किया न वहोत ॥
देखि गुरू मन हांसी ठानी । वाको जाना बहु अभिमानी ॥
मुखसोंकहि करि बहुझिड़कारा । कहा कि तू अभिमानी भारा ॥
१ आनन्द ॥

३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मनही मन में भोगै भोग । हाथ न आवै उपजै शोग ॥
कबहुं चितवै वाको मारौं । कबहूं चितवै फांसी डारौं ॥
कबहूं चितवै द्रव्य चुराऊं । वाको धन अपने घर लाऊं ॥
कबहूं चितवै ठगई करौं । माल बिराना छलकरि हरौं ॥
भांति भांति चितवनि उपजावै । बुरे मनोरथ कर्म लगावै ॥
ताते याका करै उपाऊ । होय जो साधू कर्म छुटाऊ ॥
जो चितवै तौ हरि गुरु चरणा । ब्रह्मविचार सदाही करणा ॥
खोटी चितवनि चितवै नाहीं । सदा रहै थिर ताके माहीं ॥
कहि शुकदेव सो हिरदै रहै । इत उतको चित नाहीं बहै ॥
दो० दूजा कर्म जु वैर है, महा पाप की पोट।
सदा हिया जलता रहै, करै खोटही खोट ॥
वैरभाव में अवगुण भारी । तनछूटै जा नरक मंझारी ॥
वैरी याद रहै मन माहीं । हरि सों हेत लगन दे नाहीं ॥
ताते वैरभाव नहिं कीजै । याको कर्म लाग नहिं दीजै ॥
अरु तीजा जानौ अभिमाना । गुरू कृपा सों ताको जाना ॥
हूं हूं हूं हूं करता रहै । नीचा होय तौ अन्तर दहै ॥
कबहूं फूलै मन के माहीं । मो समान कोउ ऊंचा नाहीं ॥
मैंही योंकर योंकर करिया । मो बिन कारज कछू न सरिया ॥
अपने को चतुरा बहु जानै । और सबन को मूरख मानै ॥
अभिमानी ऐसा मन लावै । हरिकेगुण किरिया बिसरावै ॥
गर्व भरा खोंटी वृत्ति धारै । अपने मनमें कबहूँ न हारै ॥
शुकदेव कहै वाहि पहिचानौ । नरकजायगा निश्चय आनौं ॥
रणजीता अभिमान न कीजै । कर्म बचाय परम सुख लीजै ॥
दो० कृत्य घनी बेमुख भवै, गुरु सों विद्या पाय ।
उनको जानै तनकही, आपन को अधिकाय ॥

धर्मजहाजवर्णन । ३५
जैसे इक दृष्टान्त सुनाऊं । कथा पुरानी कहि समझाऊं ॥
महापुरुष इक स्वामी पूरा। ज्ञान ध्यान में था भरपूरा ॥
लक्षण सभी हुते वा माहीं। आठपहर हरिहीको ध्याहीं ॥
उनको शिष्य आन इक भयो । वहि उपदेश जु नीको दयो ॥
करिकै प्यार निकट जो राखो। प्रीतकरी अरुसबकछुभाखो ॥
फिरि रामतकी आज्ञा लीन्ही । उनहूँ करि किरपातवदीन्ही ॥
पहुँचा एक नगर अस्थाना। ह्वाँके नरन सिद्ध बड़जाना ॥
ठहराया अरु पूजा कीन्ही । बहुत नरन ने कण्ठीलीन्ही ॥
बहुतक प्राणी आवैं जावैं । संध्या भोर शीश बहु नावैं ॥
महिमा देखि फूल१ मनमाहीं । कहाकि हमसमगुरुभी नाहीं ॥
दो० गद्दी पर बैठा रहै, तकिया बड़े लगाय ।
बहुत रहैं आज्ञा बिषे, शिरपर चँवर दुराय ॥
गुरु परताप नहीं वह जानै । अपनीही बुधि बड़ी जुठानै ॥
मूरख आगे क्यों नहिं भया । दीन होय करि द्वारेगया ॥
थोड़ेहीसे बहु इतराना । गुरुकी कृपा प्यार ना जाना ॥
बार वार शोचै मन सोई । हमरो गुरु क्या ऐसो होई ॥
उनको तौ नर कोइ कोइ जानै । हमको सिगरो देश बखानै ॥
दिन दिन बढ़ता दीखै आगे । मेरे भाग बड़ेही जागे ॥
मेरे मनमें ऐसी आवै । उनका शिष्य जु कौन कहावै ॥
वहीं अचानक गुरु ह्वां आया । बैठेही शिर शिष्य नवाया ॥
दो० जैसे आते वैष्णव, करता वह दंडौत ।
ऐसेही गुरु से किया, आदर किया न वहोत ॥
देखि गुरू मन हांसी ठानी । वाको जाना बहु अभिमानी ॥
मुखसोंकहीकरि बहुझिड़कारा । कहा कि तू अभिमानी भारा ॥
१ आनन्द ॥

३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नीकी बुद्धि तेरी गइ खोई । वसी मूर्खता घटमें सोई ॥
मेरा सब उपदेश विसारा । जग मोहनको मन में धारा ॥
दशवीसनको शिष्यकरभूला । गद्दीपर बैठो बहु फूला ॥
शिष्यने कहा और क्या कीया । वही किया आज्ञा तुम दीया ॥
तुमनेही सतसंग बताई । कीजो दीजो जित मनलाई ॥
शिष्य शाखा करि संग बढ़ाई । मेरी तुम्हरी भई बड़ाई ॥
देखि ईर्षा तुमको आई । हमरी देखी बहु अधिकाई ॥
फिरिहँसि गुरु कहि तू अज्ञानी । में कहि संगति तैं नहिंजानी ॥
मैं कही भक्तनका सँग कीजै । सतपुरुषन के चरण गहीजै ॥
दिन दिन ज्ञान होय सरसाई । हरि गुरुमों है प्रीति सवाई ॥
तेरी तौ गति औरै भई । महा अविद्या में मति ठई ॥
दो० झरना मूंदे ज्ञानके, लाय रहा अज्ञान ।
राम रुठावनहीं किया, भई मुक्ति की हान ॥
कहा बात पूजी कहा, इतने में गयो भूलि ।
मति ओछी घट थोथरा, तापर बैठा फूलि ॥
सिद्धी प्रापत जो भवे, देह विसर्जन होय ।
वहभी जो गुरु को तजै, जाय नरक को सोय ॥
कछू तपस्या नाकरी, नाहिं किया कछु योग ।
नाहीं लगी समाधिही, ले बैठा तू भोग ॥
रजगुण तमगुण लेलिया, तजा सतोगुण अङ्ग ।
हरि गुरुको दइ पीठिही, करि विषयिनको सङ्ग ॥
भक्ति भावको छोड़ि कै, करी दम्भकी हाट ।
मुक्त पन्थको तजि दिया, लई नरक की बाट ॥
इन बातन सों क्या सरै, बहुत भया विख्यात ।
१ अरताना २ मूर्खता ॥

धर्मजहाजवर्णन । ३७
तुमसे अधिकी मूढ़ नर, जगमें घने दिखात ॥
हुकुम बड़ा माया बड़ी, नामी बड़े जु भूप।
नर नारी बहु टहल में, सुन्दर अधिक अनूप ॥
सन्तन की गति और है, हरि गुरुसों सनमुख ।
मुक्त होय छूटैं सबै, जन्म मरण के दुख ॥
जगत बड़ाई में फँसे, परी अविद्या छाहि ।
नरक भुगति यमदण्डही, फिरि चौरासी माहिं ॥
हरि औ गुरु को शिरपर धरिये, सतपुरुषनकी सङ्गति करिये ॥
रहिये साधुनके सँग माहीं । ध्यान भजन जहाँ छूटे नाहीं ॥
है परिपक्व जहां मन रहो। गुरुमत दया दीनता गहो ॥
सहज सहज उपदेश लगावो । भूलेको हरि बाट बतावो ॥
तारन तरन बहुत जन भये । क्षमा दीनता धारे गये ॥
पै उनको अभिमान न आया । नेक न पड़ी अविद्या छाया ॥
आपा मेटि गुरूही राखा । जब बोले तब गुरुही भाषा ॥
तू अभिमानी जन्म गँवाया । पापबोझ शिर घना उठाया ॥
दो० योंही न१भकी ओरसों, वाणी भई जुआय ।
कियो गुरू्सों मान तैं, चौरासी२ को जाय ॥
तहं सों गुरु रमते भये, शिष्यहि दै फटकार ।
कहा कि तेरे तन बिषे, हूजी बड़ो विकार ॥
तापाछे कछु दिननमें, देही भयो विकार ।
निकट न आवैं तासुके, तहं के कोउ नर नार ॥
कुष्ठ भयो अर्द्धंगको, रहो न काहू योग ।
आठ पहर वाको भयो, निरोशोगही शोग ॥
तनतजिकै नरकै गयो, फिरि चौरासी माहिं ।
१ आकाश २ कुंभीपाक आदि चौरासी नरक संख्या ॥

३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गुरु सों करे मानहीं, ताकी गतिहोय नाहीं ॥
कहैं गुरू शुकदेवजी, चरणदास परवीन ।
मनसोंतजि अभिमानको, गुरुसों रहिये दीन ॥
मान न काहूसों करै, सबही सों आधीन ।
समरथ हरिकी भक्तिमें, जगतकाज सों हीन ॥
दश कर्मों को जानिये, महापापकी खानि ।
तन मन बचन सँभारिये, यहीजु अधिकसयानि ॥
कहूं एक दृष्टान्तही, सो परमारथ भेश ।
सुनि समुझै हिरदै धरै, तौ लागै उपदेश ॥
रहै सुहावत नगर इक, बसैं लोग सुखमान ।
नर नारी सुन्दर सबै, अरुधनवन्त बखान ॥
नया करैं जहाँ भूपही, बरस दिनाके माहिं ।
संवत बीते तासुको, फिर वै राखैं नाहिं ॥
पकड़ डारदैं नदी पारा । जहां भयानक अधिक उजारा ॥
पशू आदि ताको भषि जावैं । स्वपनासा देखैं विनशावैं ॥
नयाभूप करि आज्ञा मानैं । ताको अपना ईश्वर जानैं ॥
रहैं हुकुम माहीं करजोरैं । वाको बचन न कबहूँ मोरैं ॥
छत्तरधारी छाईं डारैं । सों मैं आगे कही उजारैं ॥
कई सैकड़ों ऐसे भये । चेते नहीं निष्फल गये ॥
राजा नया और इक किया । सो वह समझा चेता हिया ॥
मनही मनमें कहै विचारे । बहुत भूप जंगल में डारे ॥
दो० बरस दिना जब बीतिहैं, हमहूँ को दे डारि ।
सरिताही१ के पारही, अधिकी जहां उजारि ॥
याको कछू उपाय बिचारौं । तासेती यह जन्म न हारौं ॥
१ नदी ॥

धर्मजहाजवर्णन । '३६
एक दिना उन यही विचारा। देखन गयो नदी के पारा ॥
जहां भूप जाजाकरि मरते। तिनके हाड़ हईं जा गिरते ॥
खड़ा जु होय देखि मन आई। नीकी ठौर बनाऊं ह्नांई ॥
दृष्टि उठाय ऊंची जो कीन्ही। कामदारको आज्ञा दीन्ही ॥
बन काटौ आज्ञा दइ एता। फेरक पांचकोस में जेता ॥
सुन्दरसा इक कोट बनाओ। तामें सुन्दर बाग रचाओ ॥
करौ हवेली१ ताके माहीं। जैसी भूपनहूँ कै नाहीं ॥
गिलंम२ बिछौने परदे लावो। अरु तय्यारी सबै करावो ॥
होय चुकै जब मोहिं सुनावो। बहुत इनाम अधिक तुम पावो ॥
दो० वैसीही बनने लगी, जैसी आज्ञा दीन।
बनते बनते बनचुकी, सुन्दर अधिक नवीन ॥
फिर राजा को आनि सुनाया। राजा सुनि बहुतै सुखपाया ॥
आछी वस्तु वहां पहुँचाई। ह्नांजो रही न सुरति लगाई ॥
कहा कि एक दिना ह्नां जाना। क्षण क्षण होय अ³वधिकीहाना ॥
पांचक गांव कोटके साथा। किये दिये लिखि अपने हाथा ॥
अपना एक हितू मन भाई। भरी कचहरी लिया बुलाई ॥
करि इनाम ताको वह दिया। वाका देखा सांचा हिया ॥
और कही जो राजा होवै। वाहि तलाकँ४ याहि जो खोवै ॥
योंही आठ महीने बीते। करणी करि भये मनके चीते ॥
दो० है निश्चित आनँदभये। चिन्ता भय नहिं कोय ॥
अपना कारज करिचुके। ह्नां ह्नां एकहि होय ॥
सुखही में वह वर्ष बिताया। अवधिबीतिफिरिवहदिनआया ॥
सब उमराव५ जु घिरिकर आये। नया भूप करने को लाये ॥
यहि सिंहासन सों दियो डारी। कहा कि तुम्हरी बीती बारी ॥
१ मकान २ गलीचा ३ अवादा ४ कसम ५ अमीर ॥
५

४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसे कहि कर गहि लै चाले। पार नदी के जंगल घाले ॥
शुभकरणी को करि वह राजा। अपने महलन जाय बिराजा ॥
इतसे भी उत सुख बहुभारी। ना कोइबैरी ना जंजारी ॥
अपनी करणी से सुख पावै। रहै अशोक न चिन्ता आवै ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। शुभ करणी करि पाया बासा ॥
दो० ऐसे मानुष देह को, जानहुँ नगर समान।
राजा यामें जीवहै, शुभकरणी परमान ॥
नाहिं तौ चौरासी जङ्गल है। भांति भांतिका जितही भौ है ॥
पशू पशूको जित भषिजावै। नित भयमानि नहीं सुख पावै ॥
बहु दुख पावै खोटी करनी। जैसी करनी तैसी भरनी ॥
शुभकरनी को जो नर धावै। बहुत भांति सुख सुरपुरजावै ॥
दो० भूप उमरअपनी किया, अपना पूरण काम।
ऐसेही शुभ कर्म्म सों, तुमहूँ पावो धाम ॥
अरु इक कथा कहौं अतिनीकी। जा सुनिजाय अविद्या१ जीकी ॥
इक राजा था बहु परबीना। सो वह पुत्र विनाथा हीना ॥
एक समय वहि रोग जुआया। पुत्र बिना बहुतै कलपाया ॥
कौनकाज अब ह्यांको करिहै। जो मेरो देहीं यह मरिहै ॥
यह मन करत सिद्ध इकआया। राजाने सब वाहि सुनाया ॥
सिद्ध कही सुत गोदं घलावो। बेटाकरि तिहिराज बिठावो ॥
राजा कही जु ध्यान लगावो। राज भाग में ताहि बतावो ॥
फिरिउनकही जुखोलि दिखाऊं। साहूकारका पुत्र बताऊं ॥
वाके भाग्य लिखा यह राजा। ताको सुत करि कीजै काजा ॥
फिर उन वाकोगोद जु लीन्हा। ह्यांको रोज काज सब दीन्हा ॥
कोइक दिनमें उन तनत्यागा। पुत्र राज्य करने तब लागा ॥
१ मूर्खता २ बैठालेव ॥

धर्मजहाजवर्णन ४१
राज्य पितासों नीका कीन्हा । प्रजाआदिको सब सुख दीन्हा ॥
दो० राज करत वर्षे भई, सुखले अरु सुख दीन ।
नगर मध्य वाके कोऊ, विना द्रव्य नहिं हीन ॥
एक दिना ऐसो भो काजा । सोवत चौकि उठा वह राजा ॥
भोर भये सब फौज बुलाई । हरिकी आज्ञा सो समुझाई ॥
कहा जहांतक परजा मेरी । ताको लूटो जाय सबेरी ॥
आज्ञा ले सब फौज पधारी । प्रजा लूटि लई तिन सारी ॥
दूजे कही कि हां तुम जावो । लूटे सब ते भवन जलावो ॥
घर परजाके सभी जलाये । नीच ऊंचने बहुदुख पाये ॥
तीजे वचन भूप यों भाखो । कहाफौज सों खोज न राखो ॥
शस्त्र¹ सों बड़े बड़े नर मेलो । लड़के वाले कोल्हू पेलो ॥
यह सुनि सकलप्रजाघिरिआई । राजा पास पुकार सुनाई ॥
बहुतक राजा भये अनूठा² । अपनी प्रजा नहीं कोहुं लूटा ॥
दो० पहिले सबको सुख दिया , अब भे तुम दुखदाय ।
कारण यह कहि दीजिये , सबही को समुझाय ॥
यह कहि साहूकार ने , जो था वाका बाप ।
कुयश चला संसार में , बहुत लगाये पाप ॥
साहुकार पण्डित घने , और बड़ेही लोग ।
कोल्हूकी सुनि कतल³ की, बहुतक माना शोग ॥
आये हैं फरयाद⁴ को , सुने बिगड़ते काज ।
सकल प्रजाको मारिकै , किसकाकरिहौ राज ॥
संकल प्रजा तुव शरणहैं , बकसि देव महराज ।
अपनी अपनी भूमि में , फेरि बसैं सब साज ॥
राजा कही सु मैं नहिं जानूं । अपने मुख से कहा बखानूं
१ हथियार २ उत्तम ३ मारना ४ गोहारि

४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कहा पुरुष सो इक तुम आनौ । जिनका कहासांच तुममानौ ॥
यह सुनि जवाब सवालहि वारे । आकरि बैठे सबन मँझारे ॥
सो इक नर बहुतै इतबारी । जिनकीसाखिहुतीबहु भारी ॥
तिनको लै राजा के पासा । खड़े किये सब चरणन दासा ॥
राजा उठि उन्हीं के माहीं । मिलि बैठो पुनि वाही ठाहीं ॥
राजा कही जु हरि की ओरैं । ध्यान लगावो मनको मोरैं ॥
घड़ी चारि जब ध्यानलगाया । नभ से शब्द यही जो आया ॥
दो० ढील भूप तैं क्योंकरी , इनकी कीजै जेल ।
बड़े कतलही कीजिये , छोटे कोल्हू पेल ॥
तीनहिं बार लगाया ध्यानी । वारंवार यही भइ बानी ॥
भूप कही कहा दोष हमारा । कोपित भयो जो सिरजनहारा १ ॥
अब तुम परजासों कहि देवो । कतल पेलना कोल्हू लेवो ॥
आय नरनकहि सबमें खोली । सुनि परजा ऐसे उठि बोली ॥
कहन सकल आपस में लागे । हम हैं मूरख बड़े अभागे ॥
हम शुभकर्म कबहुँ नहिं कीन्हे । तिथि पर्वहि केहुदाननदीन्हे ॥
कथा कीर्त्तन में नहिं कहे । कुटुंब जाल में पागे रहे ॥
हरि की भक्ति नहीं चित लाई । ताते अब होतो मुकताई ॥
दो० हरी ही को बिसराइया , पूत महल के काज ।
नाम रहैगो जगत में , सो भी रहा न आज ॥
चले नरक को निश्चय जैहैं । मार यमों की निश्चय खैहैं ॥
कांपत है सब देह हमारी । आपस में भावैं नर नारी ॥
ऐसे ही सब रो रो बोलैं । ब्याकुल भये धरणिमें डोलैं ॥
एक ठाँव ह्वै मता उपाया । सो राजा को जायसुनाया ॥
करजोरे मुख तृण गहिलीन्हे । नखशिखलौं तनदीन जुकीन्हे॥
१ पैदा करनेवाला ॥

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४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकग्रन्थ ।
यह सुनि परजा सब हरषाई । अपने अपने घरको आई ॥
कोउ सिरकी कोउ छप्पर डारा । पका मंदिर नाहिं विचारा ॥
चोरी जारी सबै बिसारी । ढीले भये सभी व्योहारी ॥
अरु साधुनकी वृत्ती धारी । बालक युवा जेंरठ नरनारी ॥
रहे नहीं वै खोटे मनके । भये तपस्वी कृश सब तनके ॥
दो० जो कछु गाड़ो द्रव्य गृह, करी न ताकी आंट ।
राखि लिया षटमास का, अरु सब दीन्हा बांट ॥
जिते धनिक तिन सब यह कीन्हा । हते अनाथ तिनहि दैदीन्हा ॥
कहैं परस्पर धन कहा करिहैं । छठे महीना पीछे मरिहैं ॥
यही समझि उपजा बैरागा । सकलइन्द्रियन का रस त्यागा ॥
फीके लगे भोग सब जगके । सहज काम तब छूटे अघके ॥
सबकी दशा एक जो भई । मौत जानि करि चिन्ता ठई ॥
दिन दिन दुर्बल होते जावैं । हरिहीका जप ध्यान लगावैं ॥
एक एक दिन लागै प्यारा । भजन करैं जगिन्यारा न्यारा ॥
हठ अरु वाद न कोऊ ठानै । इक इक घरी अमोलकि जानै ॥
कहैं कि खोवैं तौ कित पावैं । कथा कीर्तन सों चित लावैं ॥
कथा कीर्तन जित तित होई । साधु समागम ह्वै गये सोई ॥
घरघर शुभ कर्मन व्योहारा । धर्म पकड़ि अधरम सब डारा ॥
ज्यों ज्यों दिवस अवधिके आवैं । घने घने शुभ कर्म कमावैं ॥
दो० जाको होवै मौतभय, जगमें लगै न चित्त ।
झुकै रामकी ओरही, बहुत लगावै हित्त ॥
उन पुरुषनकी यह गति भई । जगकी चाल डारि सब दई ॥
लाड़ चाव व्योहार न कोई । ब्याह सगाई पुत्र न होई ॥
काम क्रोध नहिं उपजै मोहा । लोभ मान नहिं प्रीति न द्रोहा ॥
१ चाल २ वृद्ध ३ प्रेम ४ गुणों का गान करना ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४५
ऐसे रहि शुभ कर्म्म जु करें । सदा मौत से सब जन डरें ॥
सहज सहज फिरि वहदिन आया। डरे नहीं शुभकर्म्म कमाया ॥
आपसमें कहें हमको क्या है। यमकी मार नरक भय नाहै ॥
राजा जान्यो वह दिन आया। अपना सेवक तुरत पठाया ॥
कही कि फौज सबै वनि आवैं । कतल करन परजा को धावैं ॥
फौजें सजिकरि ठाढ़ी भईं । आज्ञा ओर दृष्टि जो दई ॥
राजाके मन ऐसी आई । उन सब पुरुपन लेहुँ बुलाई ॥
सांचे सबही के इतवारी । फेरि बुलावो अवकी वारी ॥
यही शोचि फिरि शीश उठाया। आज्ञाकारी निकट बुलाया ॥
दो० कामदार सों यों कही, वैसो पुरुप बुलाय ।
जिनमें मिलिवैठा प्रथम, हरिसों ध्यान लगाय ॥
फिरि उनहिंन को लियो बुलाई। मिलि बैठा सबका सुखदाई ॥
कहीकि सब मिलि सुरति उठावो। रामओर को ध्यान लगावो ॥
अज्ञा होय सोइ तुम मानौ । मेरा दोप कछू मत जानौ ॥
मोको अज्ञा होय सो करिहौं। अपने हिये नेकनहिं धरिहौं ॥
राजा कहि मिलि ध्यान लगाया। ऐसा शब्द गगनसों आया ॥
राजा मैं अब बकसि दियाहै। सकल प्रजाको शुद्ध हियाहै ॥
जिन पर मोको कोप भया था। तिनके कारण खड्ग लियाथा ॥
सर्व प्रजा सो वातें डारी। करिसुकर्म हरिभक्ति सँभारी ॥
दो० ताते अज्ञा यों दई, रचो कुटुँव घरवार ।
शुभकर्म्मन को कीजिये, खोटे कर्म्म निवार ॥
राजाकही खोलि दृग दीजै। अज्ञाभई सोई अब कीजै ॥
खोलि आँख कर जोरिके भाखे। बकसे गये तुम्हारे राखे ॥
जो तुम कहौ सोई अब करें। बचन तुम्हारे हिरदय धरें ॥
राजा कही यही तुम कीजो। रामनामको संगी लीजो ॥

४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुको ध्यान धरो मनमाहीं । विपति जासुसों आवतनाहीं ॥
अपनी त्रिया त्रियाकरि जानो । परतिरियाको माता मानो ॥
परधन को पाहन १ सम देखो । शुभकर्मनको करो विशेखो ॥
बोलौ सांच झूठको नाखो । निन्दा हिंसा नेक न राखो ॥
है रहियो सबके सुखदाई । करुवा वचन न बोलौ भाई ॥
जो व्यवहार करौ सो सांचा । लोक प्रलोक न आवै आंचा ॥
दो० भाषत श्रीशुकदेवजी, सुनौ चरणही दास ।
राजा ने उपदेश दै, खोई सबकी त्रास ॥
फिरि वै पुरुष बिदा है आये । हरि राजाके वचन सुनाये ॥
जिन बातनसों बकसे सारे । सो रखियो तुम हिये मँझारे ॥
उज्ज्वल कर्म भूलि मति जैयो । हरिकीभक्ति माहिँही रहियो ॥
सुनिकरि आपसमें फैलाई । एक एक ने सुनी सुनाई ॥
सबने मानी निश्चय कीन्ही । प्रकट २ सुअपनी आंखिनं चीन्ही ॥
हाथ कँगनको दर्पण केहा । जैसी करणी भुगतै जेहा ॥
खुशीभये लागे व्यँवहारा । रामभक्तिको लिये सँभारा ॥
कहि शुकदेव चरणहीदासा । सकल प्रजा रहै उमगहुलासा ॥
दो० चरणदास सुनिये श्रवण, मैं उपदेशूं तोहिं ।
जो पहिले हरिको भजै, पाछे दुःख न होहिं ॥
कथा कहौं इक और पुरानी । करणी करै सुसमुझै प्रानी ॥
इन्दुनाम इक ब्राह्मण हुता । जाके दश सुत अरु इक सुता ॥
सुता व्याहि दइ घरकी हुई । जाके पीछे माता मुई ॥
पिता मुवा दश पुत्र रहेथे । आपसमें सब बैठि कहेथे ॥
ऐसी कछू जु करणी कीजै । जगमें ऊंची पदवी लीजै ॥
इकने कही हूजिये भूपा । सुन्दर देही धरौ अनूपा ॥
१ पत्थर २ जाहिर ॥

धर्मजहाजवर्णन । ४७
तेज मुल्कमें होवै भारी । हुकुम जुमानैं नर अरु नारी ॥
और एक ऐसे उठि बोला । सावधान ह्वै अन्तर खोला ॥
दो० राजाही का हुकम तो, थोरेही में जोय ।
ऐसी करणी कीजिये, भूपचक्रवै होय ॥
एकद्वीप नौखण्ड में, जाको पूरो राज ।
एक और उठि बोलिया, यह भी ओछा साज ॥
चक्रवर्त्ति१ में इन्द्र बड़, देवन हूँ को भूप ।
उम्र बड़ी आनंद बड़े, दुख की लगै न धूप ॥
करणी करत इन्द्रही लोगा । होकर राजा कीजै भोगा ॥
जहाँ अप्सरा नृत्य करत हैं । सुन्दर अधिकी रूप धरत हैं ॥
और बड़ा भाई यों भाखा । सुरपतिहूको नाहीं राखा ॥
कहा कि पदवी ब्रह्माकीसी । और न दीखै काहू हीसी ॥
जाके एक दिवसही माहीं । चौदह इन्द्र सर्व ह्वै जाहीं ॥
सब ब्रह्मण्ड आसरे वाके । बिनशिजायँ मिटिजायँ जाके ॥
तीनि लोकका पिता वही है । वेद पुराणन माहँ कही है ॥
करणी करिकरि ब्रह्मा हूजै । ऐसी पदवी क्यों नहिं लीजै ॥
दो० सगरे यों उठि बोलिया, सत्य सत्य यह बात ।
ऐसाही अब कीजिये, ठहराई सब भ्रात ॥
दशहू करन तपंस्या लागे । पारब्रह्मकी ओरी पागे ॥
अधिक तपस्या कीन्ही भारी । मास सूखिगया दीखैं नारी ॥
हाड़ त्वचा२ चिपटी रहगई । लोहू धातु३ कछू ना ठई ॥
सब जन चित्रहिसे रहगये । कठिन तपस्या करते भये ॥
फूलपात जलहू नहिं लीन्हा । ऐसा तप दशहूने कीन्हा ॥
तन त्यागे दूजेही जन्मा । दशहू भ्रात हुये जो ब्रह्मा ॥
१ चारों दिशाओं का राजा २ खाल ३ वीर्य ॥