भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
मनही मन में भोगै भोग । हाथ न आवै उपजै शोग ॥
कबहुं चितवै वाको मारौं । कबहूं चितवै फांसी डारौं ॥
कबहूं चितवै द्रव्य चुराऊं । वाको धन अपने घर लाऊं ॥
कबहूं चितवै ठगई करौं । माल बिराना छलकरि हरौं ॥
भांति भांति चितवनि उपजावै । बुरे मनोरथ कर्म लगावै ॥
ताते याका करै उपाऊ । होय जो साधू कर्म छुटाऊ ॥
जो चितवै तौ हरि गुरु चरणा । ब्रह्मविचार सदाही करणा ॥
खोटी चितवनि चितवै नाहीं । सदा रहै थिर ताके माहीं ॥
कहि शुकदेव सो हिरदै रहै । इत उतको चित नाहीं बहै ॥
दो० दूजा कर्म जु वैर है, महा पाप की पोट।
सदा हिया जलता रहै, करै खोटही खोट ॥
वैरभाव में अवगुण भारी । तनछूटै जा नरक मंझारी ॥
वैरी याद रहै मन माहीं । हरि सों हेत लगन दे नाहीं ॥
ताते वैरभाव नहिं कीजै । याको कर्म लाग नहिं दीजै ॥
अरु तीजा जानौ अभिमाना । गुरू कृपा सों ताको जाना ॥
हूं हूं हूं हूं करता रहै । नीचा होय तौ अन्तर दहै ॥
कबहूं फूलै मन के माहीं । मो समान कोउ ऊंचा नाहीं ॥
मैंही योंकर योंकर करिया । मो बिन कारज कछू न सरिया ॥
अपने को चतुरा बहु जानै । और सबन को मूरख मानै ॥
अभिमानी ऐसा मन लावै । हरिकेगुण किरिया बिसरावै ॥
गर्व भरा खोंटी वृत्ति धारै । अपने मनमें कबहूँ न हारै ॥
शुकदेव कहै वाहि पहिचानौ । नरकजायगा निश्चय आनौं ॥
रणजीता अभिमान न कीजै । कर्म बचाय परम सुख लीजै ॥
दो० कृत्य घनी बेमुख भवै, गुरु सों विद्या पाय ।
उनको जानै तनकही, आपन को अधिकाय ॥