भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नीकी बुद्धि तेरी गइ खोई । वसी मूर्खता घटमें सोई ॥
मेरा सब उपदेश विसारा । जग मोहनको मन में धारा ॥
दशवीसनको शिष्यकरभूला । गद्दीपर बैठो बहु फूला ॥
शिष्यने कहा और क्या कीया । वही किया आज्ञा तुम दीया ॥
तुमनेही सतसंग बताई । कीजो दीजो जित मनलाई ॥
शिष्य शाखा करि संग बढ़ाई । मेरी तुम्हरी भई बड़ाई ॥
देखि ईर्षा तुमको आई । हमरी देखी बहु अधिकाई ॥
फिरिहँसि गुरु कहि तू अज्ञानी । में कहि संगति तैं नहिंजानी ॥
मैं कही भक्तनका सँग कीजै । सतपुरुषन के चरण गहीजै ॥
दिन दिन ज्ञान होय सरसाई । हरि गुरुमों है प्रीति सवाई ॥
तेरी तौ गति औरै भई । महा अविद्या में मति ठई ॥
दो० झरना मूंदे ज्ञानके, लाय रहा अज्ञान ।
राम रुठावनहीं किया, भई मुक्ति की हान ॥
कहा बात पूजी कहा, इतने में गयो भूलि ।
मति ओछी घट थोथरा, तापर बैठा फूलि ॥
सिद्धी प्रापत जो भवे, देह विसर्जन होय ।
वहभी जो गुरु को तजै, जाय नरक को सोय ॥
कछू तपस्या नाकरी, नाहिं किया कछु योग ।
नाहीं लगी समाधिही, ले बैठा तू भोग ॥
रजगुण तमगुण लेलिया, तजा सतोगुण अङ्ग ।
हरि गुरुको दइ पीठिही, करि विषयिनको सङ्ग ॥
भक्ति भावको छोड़ि कै, करी दम्भकी हाट ।
मुक्त पन्थको तजि दिया, लई नरक की बाट ॥
इन बातन सों क्या सरै, बहुत भया विख्यात ।
१ अरताना २ मूर्खता ॥